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________________ एकोनत्रिंशत्तम पर्व आलानिता वनतरुवतिमात्रमुच्चस्कन्धेषु सिन्धुरवराश्च तथोच्चकैर्यत् । तन्ननमाश्रयणमिष्टमुदात्तमेव संधारणाय महतामहतात्मसारम् ॥१५०॥ इत्यं नियन्तृभिरनेकपवृन्दमुच्चैरालानितं तरुषु सामि निमीलिताक्षम् । तस्थौ मुखं विचतुरेण कृताङ्गहारं लीलोपयुक्तकवलं स्फुटकर्णतालम् ॥१५१॥ उत्तारिताखिलपरिच्छदलाघवेन प्रव्यञ्जितद्रुतगतिक मलक्ष्यवेगाः । आपातुमम्बुसरसा परितः प्रसस्रुरुच्छृङ्खलै रनुगताः कलभैः करिण्यः ॥१५२॥ प्राक्पीतमम्बु सरसां कृतमौष्ट्रकेण स्वोद्गाल दूषितमुपात्ततदङ्गगन्धम् । नापातुमैच्छदुदिदन्य"षितोऽपि वर्कः सर्वो हि वाञ्छति जनो विषयं मनोज्ञम् ॥१५३॥ पीतं पुरा गजतया सलिल मदाम्बु संवासितं सरसिजाकरमेत्य तूर्णम् । प्रीत्या पपुः कलभकाश्च करणवश्च संभोगहेतुरुदितो हि सगन्ध भावः ॥१५४॥ प्रहर्षिणी पीत्वाऽम्भो व्यपगमितान्तरङ्गतापाः संतापं बहिरुदितं सरोवगाहैः । नीत्वान्तं गजकलभैः समं करिण्यः संभोक्तुं सपदि वनदुमान् विचेरुः ॥१५५॥ सब जगह बन्धनोंसे युक्त किये गये थे और जो हाथी किसीका घात नहीं करते थे वे बन्धनसे युक्त नहीं किये गये थे इससे यह सिद्ध होता है कि जो अविरत अर्थात् हिंसा आदि पापोंके त्यागसे रहित हैं उन्हींके कर्मबन्धन सुदृढ़ रूपसे होता है और जो विरत अर्थात् हिंसा आदि पापोंके त्यागसे सहित हैं उनके कर्मका बन्ध नहीं होता ॥१४९।। जिनके स्कन्ध बहुत ऊंचे गये हैं ऐसे वनके वृक्षोंमें ही सेनाके ऊँचे-ऊँचे हाथी बाँधे गये थे सो ठीक ही है क्योंकि महापुरुषोंको धारण करनेके लिए जिसकी स्वशक्ति नष्ट नहीं हुई है ऐसा बहुत बड़ा ही आश्रय चाहिए ॥१५०॥ इस प्रकार महावतोंके द्वारा ऊँचे वृक्षोंमें बाँधा हुआ वह हाथियोंका समूह अपनी आधी आँखें बन्द किये हए सूखसे खड़ा था, उस समय वह अपना सब शरीर हिला रहा था, लीलापूर्वक ग्रास ले रहा था और कान फडफडा रहा था ॥१५।। पलान आदि सब सामान उतार लेनेसे हलकी होकर जिन्होंने जल्दी-जल्दी चलकर अपनी शीघ्र गति प्रकट की है. तः चंचल बच्चे जिनके पीछे-पीछे आ रहे हैं ऐसी हथिनियाँ तालाबोंका पानी पीनेके लिए चारों ओर जा रही थीं ॥१५॥ तालाबोंके जिस पानीको पहले ऊंटोंके समह पी चके थे. जो ऊँटोंके उगालसे दूषित हो गया था और जिसमें ऊँटोंके शरीरकी गन्ध आने लगी थी ऐसे पानीको हाथीका बच्चा प्यासा होनेपर भी नहीं पीना चाहता था, सो ठीक ही है क्योंकि सभी कोई अपने मन के विषयभूत पदार्थके अच्छे होनेकी चाह रखते हैं ॥१५३॥ जिसे पहले हाथियों के समूह पी चुके थे और जिसमें उनके मद जलकी गन्ध आ रही है ऐसे पानीको हथिनियाँ तथा उनके बच्चे बहुत शो तालाबपर जाकर बड़े प्रेमसे पी रहे थे सो ठीक ही है क्योंकि समानता ही साथसाथ खाने-पीने आदि सम्भोगका कारण होती है ॥१५४॥ जिन्होंने जल पीकर अन्तरंगका सन्ताप दूर किया है और तालाबमें घुसकर बाहरी सन्ताप नष्ट किया है ऐसी हथिनियाँ अपने १ आधोरणः । २ यस्मात् कारणात् । ३ अर्धं । ४ विदृश्यानि विगतानि चत्वारि यस्य तेन । ५ अङ्गविक्षेपम् । ६ पाद । ७.स्वच्छन्दवृत्तिभिः । ८ सम्पूर्णम् । ९ उष्ट्रसमूहेण । १० निजोद्गार । ११ उष्ट्रशरीरगन्धम् । १२ भृशं तृषितः । १३ तरुणगजः । विक्कः अ० । १४ उक्तः । १५ परिमलत्वं मित्रत्वं च । १६ नाशम् ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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