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________________ आदिपुराणम् खमुन्मणितिरीटांशुरचितेन्द्रशरासनम् । क्षणेनोल्लङ्घय संप्रापत् तं देशं यत्र चक्रभूत् ॥१५८॥ पुरोधार्य शरं रत्नपटले सुनिवेशितम् । मागधः प्रभुमानसी दार्य स्वीकुरु मामिति ॥१५९॥ चक्रोत्पत्तिक्षणे भद्र यन्नायामोऽनभिज्ञकाः । महान्तमपराधं नस्वं क्षमस्वार्थितो मुहुः॥१६॥ युष्मत्पादरजःस्पर्शाद् वार्धिरेव न केवलम् । पूता वयमपि श्रीमन् त्वत्पादाम्बुजसेवया ॥१६१॥ रत्नान्यमून्यनर्धाणि स्वर्गेऽप्यसुलभानि च । अधों" निधीनामाधातुं सोपयोगानि सन्तु ते ॥१६॥ हारोऽयमतिरोचिष्णुरवाराह रशुक्तिजैः । अवेणुद्विपसंभूतैः दृब्धो मुक्ताफलैर्युजैः ॥१६३॥ तव वक्षःस्थलाश्लेषा दुपेया दुपहारताम् । स्फुरन्ती' कुण्डले चामू कर्णासङ्गात् पवित्रताम् ॥१६४॥ इत्यस्मै कुण्डले दिव्ये हारं च विततार सः । त्रैलोक्यसारसंदोह मिवैकध्यमुपागतम् ॥१६५॥ रत्नैश्चाभ्यर्च्य रत्नेशं मागधः प्रीतमानसः । प्रभोरवाप्तसत्कारः तन्मतात् स्वमगात् पदम् ॥१६६॥ अथ तत्रस्थ एवाब्धि सान्तीपं विलोकयन् । प्रभुर्विसिस्मये किंचिद् बह्वाश्चर्यो हि वारिधिः ॥१६७॥ ततः कुतूहलाद वाधि पश्यन्तं धूर्गतः पतिम् । तमित्युवाच दन्तांशुसुमनोमारीः किरन् ॥१६८॥ पृथ्वीवृत्तम् अयं जलधिरुच्चलत्तरलवीचिबाहूद्धतस्फुरन्मणिगणार्चनो ध्वनदसङ्ख्यशङ्खाकुलः । तवार्षमिव संविधित्सुरनुवेलमुच्चै दन् मरुद्भुतजलानको दिशतु शश्वदानन्दथुम् ॥१६९॥ जा रहे थे ॥१५७॥ देदीप्यमान मणियोंसे जड़े हुए मुकुटकी किरणोंसे जिसमें इन्द्रधनुष बन रहा है ऐसे आकाशको क्षण-भरमें उल्लंघन कर वह मागध देव जहाँ चक्रवर्ती था उस स्थानपर जा पहुँचा ॥१५८॥ रत्नके पिटारेमें रखे हुए बाणको सामने रखकर मागध देवने भरतके लिए नमस्कार किया और कहा कि हे आर्य, मुझे स्वीकार कीजिए-अपना ही समझिए ॥१५९।। हे भद्र, हम अज्ञानी लोग चक्र उत्पन्न होनेके समय ही नहीं आये सो आप हमारे इस भारी अपराधको क्षमा कर दीजिए, हम बार-बार प्रार्थना करते हैं ॥१६०॥ हे श्रीमन्, आपके चरणोंकी धलिके स्पर्शसे केवल यह समद्र ही पवित्र नहीं हुआ है किन्त आपके चरणकमलोंकी सेवा करनेसे हम लोग भी पवित्र हो गये हैं ॥१६१॥ हे प्रभो, यद्यपि ये रत्न अमूल्य हैं और स्वर्गमें भी दुर्लभ हैं तथापि आपकी निधियोंके नीचे रखनेके काम आवें ॥१६२।। यह अतिशय देदीप्यमान तथा सूअर, सीप, बाँस और हाथीमें उत्पन्न न होनेवाले दिव्य मोतियोंसे गुथा हुआ हार आपके वक्षःस्थलके आलिंगनसे पूज्यताको प्राप्त हो तथा ये देदीप्यमान-चमकते हुए दोनों कुण्डल आपके कानोंकी संगतिसे पवित्रताको प्राप्त हों ॥१६३-१६४॥ इस प्रकार उस मागध देवने एकरूपताको प्राप्त हुए तीनों लोकोंकी सार वस्तुओंके समुदायके समान सुशोभित होनेवाला हार और दोनों दिव्य कुण्डल भरतके लिए समर्पित किये ।।१६५॥ तदनन्तर जिसका चित्त अत्यन्त प्रसन्न हो रहा है ऐसे मागध देवने अनेक प्रकारके रत्नोंसे रत्नोंके स्वामी भरत चक्रवर्तीकी पूजा की और फिर उनसे आदर-सत्कार पाकर उन्हींकी सम्मतिसे वह अपने स्थानपर चला गया ॥१६६॥ अथानन्तर-वहाँ खड़े रहकर ही अन्तर्वीपोंसहित समुद्रको देखते हुए महाराज भरतको कुछ आश्चर्य हुआ सो ठीक ही है क्योंकि वह लवणसमुद्र अनेक आश्चर्योंसे सहित था ॥१६७॥ तदनन्तर दाँतोंकी किरणेंरूपी पुष्पमंजरीको बिखेरता हुआ सारथि कौतूहलसे समुद्रको देखनेवाले भरतसें इस प्रकार कहने लगा ॥१६८॥ कि, उछलती. हुई चंचल लहरों १ अग्रे कृत्वा। २ नमस्करोति स्म। ३ आगताः । ४ प्राथितः । ५ निधि प्रयत्नेन स्थापयितुमधः शिलाकर्तुं सप्रयोजनानि भवन्त्विति भावः। ६ न सूकरजैः । ७ इक्षुजैः । ८ संगात् । ९ उपगच्छत् । १० पूज्यताम् । ११ स्फुरती कुण्डले चेमे ल० । १२ एकप्रकारम् । १३ विस्मितवान् । १४ यानमुखं गतः । सारथिरित्यर्थः । १५ आनन्दम् । १० पूज्यताम् । ११त्वात भावः। ६ न सकरातः । ५ निधि प्रयत्नेन स्थान
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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