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________________ ५०५ सप्तचत्वारिंशत्तमं पवे मिथ्यात्वं नवधा 'साष्टशतं चाऽविरतिर्मता । प्रमादाः पञ्चदश च कषायास्ते चतुर्विधाः ॥३१०॥ योगाः पञ्चदश ज्ञेयाः सम्यग्ज्ञानविलोचनैः । समृलोत्तरभेदेन कर्माण्युक्तानि कोविदः ॥३११॥ बन्धश्चतुर्विधो ज्ञेयः प्रकृत्यादिविकल्पितः । कर्माण्युदयसंप्राप्त्या हेतवः फलबन्धयोः ॥३१२॥ तय्यं संसृतेहेतुं परित्यज्य गृहाश्रमम् । दोषदुःखजरामृत्युपापप्रायं भयावहम् ॥३१३॥ शक्तिमन्तस्समासन्नविनेया विदितागमाः । गुप्त्यादिषड्विधं सम्यगनुगत्य यथोचितम् ॥३१॥ प्रोक्तोपेक्षादिभेदेषु वीतरागादिकेषु च । पुलाकादिप्रकारेषु व्यपंतागारकादिषु ॥३१५॥ प्रमत्तादिगुणस्थानविशेषेषु च सुस्थिताः । निश्चयव्यवहारोक्तमुपाध्वं मोक्षमुत्तमम् ॥३१६॥ तथा गृहाश्रमस्थाश्च सम्यग्दर्शनपूर्वकम् । दानशीलोपवासार्हदादिपूजोपलक्षिताः ॥३१७॥ आश्रितैकादशोपासकव्रताः सुशुभाशयाः । संप्राप्तपरमस्थानसप्तकाः सन्तु धीधनाः ॥३१८॥ इति सत्तत्त्वसंदर्भगर्भवाग्विभवात्प्रमोः । ससभो भरताधीशः सर्वमेवममन्यत ॥३१९॥ त्रिज्ञाननेत्रसम्यक्त्वशुद्धिमाग देशसंयतः । स्रष्टारमभिवन्द्यायात् कैलासान्नगरोत्तमम् ॥३२०॥ जगस्त्रितयनाथोऽपि धर्मक्षेत्रेवनारतम् । उध्वा सद्धर्मबीजानि न्यषिञ्चद्धर्मवृष्टिभिः ॥३२॥ मिथ्यात्व पाँच तरहका है, अविरति एक सौ आठ प्रकारकी है, प्रमाद पन्द्रह है, कषायके चार भेद हैं, और सम्यग्ज्ञानरूपी नेत्रको धारण करनेवाले लोगोंको योगके पन्द्रह भेद जानना चाहिए। विद्वानोंने कर्मोका निरूपण मूल और उत्तरभेदके द्वारा किया है - कर्मोके मूल भेद आठ हैं और उत्तरभेद एक सौ अड़तालीस हैं ॥३१०-३११॥ प्रकृति आदिके भेदसे बन्ध चार प्रकारका जानना चाहिए तथा कर्म उदयमें आकर ही फल और बन्धके करण होते हैं। भावार्थ - पहलेके बंधे हुए कर्मोका उदय आनेपर ही उनका सुख-दुःख आदि फल मिलता है तथा नवीन कर्मोका बन्ध होता है ॥३१२॥ तुम लोग भक्तिमान् हो, निकटभव्य हो और आगमको जाननेवाले हो, इसलिए संसारके कारण स्वरूप – दोष, दुःख, बुढ़ापा और मृत्यु आदि पापोंसे भरे हुए इस भयंकर गृहस्थाश्रमको छोड़कर गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परिषहजय और चारित्र इन छहोंका अच्छी तरह अभ्यास करो तथा जिनके उपेक्षा आदि भेद कहे गये हैं ऐसे वीतरागादि मुनियोंमें, जिनके पुलाक आदि भेद हैं ऐसे अनगारादि मुनियोंमें अथवा प्रमत्तसंयतको आदि लेकर उत्कृष्ट गुण-स्थानोंमें रहनेवाले प्रमत्तविरत आदि मुनियोंमें-से किसी एकको अवस्था धारण कर निश्चय और व्यवहार दोनों प्रकारके उत्तम मोक्षकी उपासना करो ॥३१३-३१६॥ इसी प्रकार गृहस्थाश्रममें रहनेवाले बुद्धिमान् पुरुष सम्यग्दर्शन पूर्वक दान, शील, उपवास तथा अरहन्त आदि परमेष्ठियोंकी पूजा करें, शुभ परिणामोंसे श्रावकोंकी ग्यारह प्रतिमाओंका पालन करें और यथायोग्य सज्जाति आदि सात परमस्थानोंको प्राप्त हों ॥३१७३१८॥ इस प्रकार भरतेश्वरने समीचीन तत्त्वोंकी रचनासे भरी हुई भगवान्की वचनरूप विभूति सुनकर सब सभाके साथ-साथ कही हुई सब बातोंको ज्योंकी त्यों माना अर्थात् उनका ठीक-ठीक श्रद्धान किया ॥३१६॥ मति, श्रुत, अवधि - इन तीनों ज्ञानरूपी नेत्रों और सम्यग्दर्शनकी विशुद्धिको धारण करनेवाला देशसंयमी भरत भगवान् वृषभदेवकी वन्दना कर कैलास पर्वतसे अपने उत्तम नगर अयोध्याको आया ॥३२०॥ इधर तीनों लोकोंके स्वामी भगवान् आदिनाथने भी धर्मके योग्य क्षेत्रोंमें समीचीन धर्मका बीज बोकर उसे धर्मवृष्टि के १ चाष्टशतधाविरति -ल०, ५०, अ०, स०, इ० । २ तत् कारणात् । ३ भक्ति-ल०, ५०, इ०, अ०, स० । ४ अत्यासन्नभव्याः । ५ गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरीषहजयचारित्रभेदैः । ६ सुष्टु शोभनपरिणामाः । ७ पूर्वोत्तरतत्त्व । ८ पुरोस्सकाशात् । विभो ल०।९ सभासहितः ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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