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________________ ४५८ आदिपुराणम् इत्युक्दा संदमयाह खगाचलसमीपगे । वसन्तौ चारणावद्रो मुनी मलयकाञ्चने ॥१३५॥ पूर्व वननिवेशे तौ भिक्षार्थ समुपागतौ । तव पुत्रसमुत्पत्तिमुपदिश्य गतौ ततः ॥१३६॥ अन्येयुर्वसुधारादिहेतुभूतौ कपोतकौ । दृष्ट्वा सकरुणौ मिक्षामनादाय वनं गतौ ॥१३७॥ गुर्वागुरुत्वं युवयोरुपयातौ तयोरिदम् । उपदेशात् समाकर्ण्य सर्वमुक्तं यथाश्रुतम् ॥१३८॥ इति ते ऽमितमत्युक्तकथावगमतत्पराः । स्वरूपं संसृतेः सम्यक् मुहुर्मुहुरमावयन् ॥१३६॥ एवं प्रयाति कालेऽसौ प्रियदत्ता प्रसंगतः । यशस्वतीगुणवत्यौ युवाभ्यां केन हेतुना ॥१४॥ इयं दीक्षा गृहीतेति पप्रच्छोत्पन्नकौतुका । ते" च तत्कारणं स्पष्टं यथावृत्तमवोचताम्॥१४१॥ ततो धनवती दीक्षा गणिन्याः सन्निधौ ययौ । माता" कुबेरसेना च तयोरार्यिकयोईयोः ॥१४२॥ तावन्येधुः कपोती च ग्रामान्तरमुपाश्रितो । तण्डुलाद्युपयोगाय समवर्तिप्रचोदितो ॥१४३॥ भवदेवचरणानुबद्धवैरेण पापिना । दृष्टमात्रोत्थकोपेन मारितौ पुरुदंशसा ॥१४॥ तद्राष्ट्रविजयाईस्य दक्षिणश्रेणिमाश्रिते । गान्धारविषयोशीरव त्याख्यनगरेऽधिपः ॥१४५॥ स्त्री धारिणी यहाँ तेरे पति कुबेरकान्तके माता-पिता हुए हैं ॥ १३४ ॥ इतना कहकर अमितमति यह भी कहने लगी कि विजयार्ध पर्वतके समीप मलयकांचन नामके पर्वतपर दो मुनिराज रहते थे, जब पूर्वजन्ममें शक्तिषेण सर्पसरोवरके समीप डेरा डालकर वनमें ठहरा हुआ था तब वे भिक्षाके लिए तेरे यहाँ आये थे और तेरे अँगुलियोंके इशारेसे पाँच पुत्र तथा एक पुत्री होगी ऐसा कहकर चले गये थे । तदनन्तर रत्नवृष्टि आदि पंचाश्चर्योंके कारणस्वरूप वे मुनिराज इस जन्ममें भी किसी समय तेरे घर आये थे परन्तु कबूतर-कबूतरीको देखकर दयायुक्त हो बिना भिक्षा लिये ही वनको लौट गये थे। वे ही तेरे पिता और तेरे पतिके गुरु हुए हैं। उन्हीं के उपदेशसे मैंने यह सब सूनकर अनुक्रमसे कहा है ॥ १३५-१३८ । इस प्रकार जो पुरुष अमितमति आर्यिकाके द्वारा कही हुई कथाके सुनने में तल्लीन हो रहे थे वे संसारके सच्चे स्वरूपका बार-बार चिन्तवन करने लगे ॥ १३९ ॥ इस प्रकार कुछ समय व्यतीत होनेपर किसी दिन प्रियदत्ताने प्रसंग पाकर यशस्वती और गुणवतीसे पूछा कि आप लोगोंने यह दीक्षा किस कारण ग्रहण की है ? मुझे यह जाननेका कौतुक हो रहा है । तब उन दोनोंने स्पष्ट रूपसे अपनी दीक्षाका कारण बतला दिया ।। १४०-१४१ ॥ तदनन्तर कुबेरमित्रकी स्त्री धनवतीने संघकी स्वामिनी अमितमतिके पास दीक्षा धारण कर ली और उन दोनों आयिकाओंकी माता कुबेरसेनाने भी अपनी पुत्रीके समीप दीक्षा धारण की ॥ १४२ ।। किसी एक दिन यमराजके द्वारा प्रेरित हुए ही क्या मानो वे दोनों कबूतर-कबूतरी चावल चुगनेके लिए किसी दूसरे गाँव गये। वहाँ एक बिलाव था जो कि भवदेवका जीव था । उस पापीको पूर्व जन्मसे बंधे हुए वैरके कारण कबूतर-कबूतरीको देखते ही पापकी भावना जागृत हो उठी और उसने उन दोनोंको मार डाला ।। १४३--१४४ ॥ उसी पुष्कलावती देशके विजयाध पर्वतकी दक्षिण श्रेणीमें एक गान्धार नामका देश है और उसमें उशीरवती १ अमितमत्यायिका । २ विजयाचपर्वत । ३ निवसन्तौ। ४ शक्तिषणाटवीश्रीभवे। ५ सर्पसरोवरनिवेशे । ६ कुबेरमित्रसमुद्रदत्तयोः । ७ कुबेरकान्तप्रियदत्तयोः गुरुत्वमुपयातो यौ द्वौ तयोरेव चारणयोः । ८ यथाक्रमम् लए । ९ लोकपालादायः । १० परिज्ञाने रताः । ११ यशस्वतीगुणवत्यो । १२ मम मातुलकुबेरदत्ताद् विविधभक्ष्यपूर्वभोजनालाभाज्जातलज्जया तपो गृहीतम् । १३ कुबेरमित्रस्य भार्या । १४ अमितमत्यायिकायाः । १५ जगत्पालचक्रवर्तिपुथ्योरमितमत्यनन्तमत्योर्जननी । १६ जम्बूग्रामम् । १७ भक्षणाय । १८ अन्तकप्रेरितो । १९ पूर्वस्मिन् भवदेवेन । २० पापेन ल० । २१ जम्बूग्रामस्य कदलीवनस्थमार्जारेण ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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