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________________ पञ्चचत्वारिंशत्तमं पर्व तूर्यमङ्गलनिर्घोषैः पुरन्दर इवापरः । सुलोचनामित्रान्यां स्वां प्रविश्य नगरीं जयः ॥ १७७॥ राजगेहं महानन्दविधायि विविधर्द्धिभिः । 'आवसत् कान्तया सार्द्धं नगर्या हृदयं मुद्रा ॥ १७८ ॥ तिथ्यादिपञ्चभिः शुद्धैः शुद्ध े लग्ने महोत्सवम् । सर्वसंतोषणं कृत्वा जिनपूजापुरःसरम् ॥ १७९॥ विश्वमङ्गलसंपत्या स्त्रोचितासनसुस्थिताम् । हेमाङ्गदा दिसांनिध्ये राजा जातमहोदयः ॥ १८० ॥ सुलोचनां महादेवीं पट्टवन्धं "व्यधान्मुदा । स्त्रीषु संचितपुण्यासु पत्युरेतावती रतिः ॥ १८६१ ॥ हेमाङ्गदं ससोदर्यमुपचर्य ससंभ्रमम् । पुरोभूय स्वयं सर्वैर्भोग्यैः प्राघूर्ण कोचितैः ॥ १८२ ॥ नृत्यगीतसुखालापैर्वारणारोहणादिभिः । वनवापीसरः क्रीडाकन्दुकादिविनोदनैः ॥ १८३॥ अहानि स्थापयित्वैवं सुखेन कतिचित्कृती । तदीप्सितगजाश्वास्त्र गणिकाभूषणादिकम् ॥ १८४ ॥ प्रदाय परिवारं च तोषयित्वा यथोचितम् । चतुर्विधेन कोशेन "तरपुरी "तमजीगमत् ॥१८५॥ सुखप्रमाणैः संप्राप्य दृष्ट्वा भूपं ससुप्रभम् । प्रणम्याह्लादयन्नस्थात् स वधूवरवार्तया ॥ १८६॥ सुखं काले गलत्येवम कम्पनमहीपतिः । तदा संचिन्तयामास विरक्तः कामभोगयोः ॥ १८७॥ अहो मया प्रमत्तेन विषयान्धेन नेक्षिता । कष्टं शरीरसंसारभोगनिस्सारता चिरम् ॥ १८८ ॥ 3 ४ ४४१ वाले पुरोहित, सौभाग्यवतो स्त्रियाँ, मन्त्री और प्रसिद्ध प्रसिद्ध सेठ लोग सामने खड़े होकर शब्दोंके साथ-साथ विभूतियों से बहुत समान अपने राजभवन में प्रिया सुलोचनाके जिसे शेषाक्षत दे रहे हैं ऐसे उस जयकुमारने तुरही आदि मांगलिक बाजों के दूसरे इन्द्रके समान अपनी उस हस्तिनागपुरी में प्रवेश कर अनेक प्रकारकी भारी आनन्द देनेवाले तथा उस नगरीके हृदयके साथ-साथ बड़े आनन्दसे निवास किया ।। १६९-१७८॥ तदनन्तर बड़े भारी अभ्युदयको धारण करनेवाले महाराज जयकुमारने शुद्ध तिथि, शुद्ध नक्षत्र आदि पांचों बातोंसे निर्दोष लग्न में बड़ा भारी उत्सव कराकर सबको सन्तुष्ट किया और फिर जिनपूजापूर्वक सब मंगल- सम्पदाओंके साथ-साथ हेमांगद आदि भाइयोंके सामने ही अपने योग्य आसनपर बैठी हुई सुलोचनाको बड़े हर्षसे पट्टबन्ध बाँधा अर्थात् पट्टरानी बनाया सो ठीक ही है क्योंकि पुण्यसंचय करनेवाली स्त्रियोंमें पतिका ऐसा ही प्रेम होता है ।।१७९१८१ ।। उसके बाद कुशल जयकुमारने स्वयं आगे होकर पाहुनोंके योग्य सब प्रकारके भोगोपभोगों, नृत्य, गीत और सुख देनेवाले वचनों से, हाथी आदिकी सवारीसे, वन, वापिका, तालाब आदिकी क्रीड़ाओंसे और गेंद आदिके खेलोंसे प्रसन्नतापूर्वक हेमांगद और उनके भाइयों की सेवा की, कुछ दिन तक उन्हें बड़े सुखसे रखा और फिर उनको अच्छे लगनेवाले हाथी, घोड़े, अस्त्र, गणिका तथा आभूषण आदि देकर उनके परिवार के लोगोंको यथायोग्य सन्तुष्ट किया और फिर रत्न, सोना, चाँदी तथा रुपये-पैसे आदि चारों प्रकारका खजाना साथ देकर उन्हें उनके नगर बनारसको विदा किया । ।।१८२ - १८५॥ सुखपूर्वक कितने ही पड़ाव चलकर मांगद आदि बनारस पहुँचे और माता सुप्रभाके साथ राजा अकम्पनके दर्शन कर उन्हें प्रणाम किया और जयकुमार तथा सुलोचनाकी बातचीतसे माता-पिताको आनन्दित करते हुए रहने लगे ॥१८६॥ इस प्रकार सुपूर्वक बहुत-सा समय व्यतीत होनेपर एक दिन महाराज अकम्पन कामभोगों से विरक्त होकर इस प्रकार सोचने लगे ॥ १८७॥ कि मुझ प्रमादीने विषयोंसे अन्धा १ निवसति स्म । २ नगरीजनचित्ते इत्यर्थः । ३ तिथिग्रहनक्षत्रयोगकरणैः । तिथिनक्षत्रहोरावारमुहूर्तेर्वा । ४ महोत्सवे ल० । ५ चकार । ६ ससानुजम् । ७ अग्रे भूत्वा । पुरस्कृत्य वा । ८ अतिथि । ९ दिनानि । १० रत्नसुवर्ण रजतव्यवहारयोग्यनाणकम् इति चतुविधेत ११ वाराणसीम् । १२ हेमांगदम् । १३ गमयति स्म । १४ अकम्पनम् । १५ सुप्रभादेवीसहितम् । ५६
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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