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________________ चतुश्चत्वारिंशत्तमं पर्व ३६५ रथाः प्रागिव' पर्याप्ताः पूर्णसर्वायुधायुधः । महावाहसमायुक्ताः प्रनृत्यत्केतुबाहवः ॥९८॥ योषितोऽप्यभटायन्त पाय्वात् संयुगं प्रति । ततः प्रतिबलात्तत्र भूयांसो वा पदातयः ॥९॥ वर्द्धमानो ध्वनिस्तूर्य रणरङ्गे भविष्यतः । वीरलक्ष्मीप्रवृत्तस्य प्रोद्ययौ गुणयन्निव ॥१०॥ बनान्वयं वयश्शिक्षालक्षणैर्वीक्ष्य विग्रहम्'।'सुवर्माणं सुधर्माण कामवन्तं क्षरम्मदम् ॥१०१॥ सामजं विजया ख्यं विजयाईमिवापरम् । बहुशो दृष्टसंग्राम' गजवजविराजितम् ॥१०२॥ अधिष्ठाय जयः सर्वसाधनेन सहानुजः । निर्जगाम युगप्रान्तकाललीलां विलयन् ॥१०३॥ कुर्वन्ती शान्तिपूजां त्वं तिष्ठ मात्रेति सादरम् । प्रवेश्य चैत्यधामाग्रयं सुतां नित्यमनोहरम् ॥१०॥ समग्रबलसंपत्त्या चचाल चलयन्निलाम् । अझम्पः कम्पिताराति: "साकम्पनिरकम्पनः ॥१०॥ सुकेतुः सूर्यमित्राख्यः श्रीधरो जयवर्मणा । देवकीर्तिजयं जग्मुरिति भूपाः ससाधनाः ॥१०६।। इमे मुकुटबद्धषु पञ्च विख्यातकीर्तयः । परे च शूरा नाथेन्दुवंशगृह्याः 'समाययुः ।।१०७।। मंघप्रभश्च चण्डासिप्रभाव्याप्तवियत्तलः । विद्याबलोद्धतः सार्द्धमर्दू विद्याधरैरगात् ॥१०८॥ वही था ॥९६-९७॥ जो सब प्रकारके शस्त्रोंसे पूर्ण हैं, जिनमें बड़े-बड़े घोड़े जुते हुए हैं, और जिनकी ध्वजारूपी भुजाएं नृत्य कर रही हैं ऐसे युद्धके रथ पहलेके समान ही सब ओर फैल रहे थे ॥९८॥ जयकुमारकी सेनामें युद्ध में चतुर होनेके कारण स्त्रियाँ भी योद्धाओंके समान आचरण करती थीं इसलिए अन्य राजाओंकी अपेक्षा उसकी पैदल सेनाकी संख्या अधिक थी ||१९|| उस समय जो बाजोंका शब्द बढ़ रहा था वह ऐसा जान पड़ता था मानो रणके मैदानमें जो वीरलक्ष्मीका उत्तम नृत्य होनेवाला है उसे कई गुना करता हुआ ही बढ़ रहा हो ॥१०॥ तदनन्तर-जो वनमें उत्पन्न हुआ है, वय, शिक्षा और अच्छे-अच्छे लक्षणोंसे जिसका शरीर देखने योग्य है, जिसका स्वभाव अच्छा है, शरीर अच्छा है, जो कामवान् है, जिसके मद झर रहा है, जिसने अनेक बार युद्ध देखे हैं, जो हाथीके चिह्नवाली ध्वजाओंसे सुशोभित है और दूसरे विजयाध पर्वतके समान जान पड़ता है ऐसे विजयार्ध नामके हाथीपर सवार होकर वह जयकुमार सब सेना और सब छोटे भाइयोंके साथ-साथ युगके अन्त कालकी लीलाको उल्लंघन करता हुआ निकला ॥१०१-१०३॥ इधर शत्रुओंको कम्पित करनेवाले और स्वयं अकम्प ( निश्चल ) रहनेवाले महाराज अकम्पनने भी 'तू अपनी माताके साथ आदरपूर्वक शान्तिपूजा करती हुई बैठ' इस प्रकार कहकर पुत्री सुलोचनाको नित्यमनोहर नामके उत्तम चैत्यालयमें पहुँचाया और स्वयं अपने पुत्रोंको साथ लेकर समस्त सेनारूपी सम्पत्तिके द्वारा पृथिवीको कॅपाते हुए निकले ।।१०४-१०५।। सुकेतु, सूर्यमित्र, श्रीधर, जयवर्मा और देवकीर्ति ये सब राजा अपनी-अपनी सेनाओंके साथ जयकुमारसे जा मिले ॥ १०६ ॥ मुकुटबद्ध राजाओंमें जिनकी कीति अत्यन्त प्रसिद्ध है ऐसे ऊपर कहे हुए सुकेतु आदि पाँच राजा तथा नाथवंश और सोमवंशके आश्रित रहनेवाले अन्य शूरवीर लोग, सभी जयकुमारसे आ मिले ॥१०७॥ जिसने अपनी तीक्ष्ण तलवारकी प्रभासे आकाशतलको व्याप्त कर लिया है और जो विद्याके बलसे १ दिग्विजये यथा । २ समन्तात् प्राप्ताः । पर्यस्ताः ल०। ३ रणस्य । पूर्णसर्वायुधायुध इति समस्तपदपक्षे पूर्णसर्वायुधानि च भटाश्च येषु ते । ४ भटा इवाचरिताः । ५ युद्ध प्रति । ६ ततः कारणात् । ७ प्रतिबले विलोक्यमाने सतीत्यर्थः । ८ जयकुमारबले । ९ इव । १० अतिशयं कुर्वन्निव । ११ दर्शनीयमूर्तिम् । १२ सुवर्माणं सुवणिं अ०, ५०, स०, इ० । सुधर्माणं सुवर्माणं ल० । १३ शोभनस्वभावम् । १४ आरोहकस्य वशवतिगमनवन्तम् । १५ गजरूपध्वज । १६ आरुह्य । १७ जनन्या सह । १८ श्रेष्टम् । १९ भूमिम् । २० अफम्पनस्यापत्यानि आकम्पनयस्तैः सहितः । २१ नाथवंशसोमवंशश्रिताः ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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