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________________ सप्तविंशतितमं पर्व २३. इतीदं वनमत्यन्तरमणीयैः परिच्छदैः । स्वर्गाद्यानगतां प्रीतिं जनयेत् स्वःसदा सदा ॥५७॥ बहिस्तटवनादतद् दृश्यते काननं महत् । नानाद्रुमलतागुल्मवीमिरतिदुर्गमम् ॥५८॥ दृष्टीनामप्यगम्येऽस्मिन् वने मृगकदम्बकम् । नानाजातीयमुभ्रान्तं सैन्यक्षोभात् प्रधावति ॥५॥ इदमस्मबलक्षोभादुत्त्रस्तमृगसंकुलम् । वनमाकुलितप्राणमिवाभात्यन्धकारितम् ॥६॥ गजयूथमित: कच्छादन्धकारमिवामितः । विश्लिष्टं' बलसंशोभादपसर्पत्यतिद्वतम् ॥६१॥ शनैः प्रयाति संजिघ्रन्" दिशः प्रोक्षिप्तपुष्करः । स महाहिरिवादीन्द्रो भद्रोऽयं गजयूथपः ॥६॥ महाहिरयमायाम मिमान इव भूरुहाम् । ३वसन्नायच्छते' कच्छादृत्वाकृतशरीरकः ॥६३॥ 'शयपोता निकुन्जेषु पुजीभूता वसन्त्यमी। "वनस्पेवान्त्रसंतानाश्वमूक्षोभाद्विनिःसृताः ॥६॥ अयमेकचरः'' पोत्रसमुल्खातान्तिकस्थलः । रुणद्धि वर्त्म सैन्यस्य वराहस्तीवरोषणः ॥६॥ सैनिकरर्यमारुद्ध पाषाणलकटादिभिः । व्याकुलीकुरुते सैन्यं गण्डो गण्ड' इव स्फटम ॥६॥ प्राणा इव वनादस्माद् विनिष्कामन्ति सन्तताः । सिंहा बहुदवज्वाला धुन्वाना केसरच्छटाः ॥६॥ हई हैं और जो देवोंके उपभोग करने योग्य हैं ऐसे लतागृह बने हुए हैं ॥५६।। इस प्रकार यह वन अत्यन्त रमणीय सामग्रीसे देवोंके सदा नन्दन वनको प्रीतिको उत्पन्न करता रहता है ।। ५७ ।। इधर किनारेके वनके बाहर भी एक बड़ा भारी वन दिखाई दे रहा है जो कि अनेक प्रकारके वृक्षों, लताओं, छोटे-छोटे पौधों और झाड़ियोंसे अत्यन्त दुर्गम है ॥ ५८ ।। जिसमें दृष्टि भी नहीं जा सकती ऐसे इस वनमें सेनाके क्षोभसे घबड़ाया हुआ यह अनेक जातिके मृगोंका समूह बड़े जोरसे दौड़ा जा रहा है ।।५९|| जो हमारी सेनाके क्षोभसे भयभीत हए हरिणोंसे व्याप्त है तथा जिसमें जीवोंके प्राण आकूल हो रहे हैं ऐसा यह वन अन्धकारसे व्याप्त हएके समान जान पड़ता है । ६० ॥ इधर सेनाके क्षोभसे अलग-अलग हुआ यह हाथियोंका झुण्ड गंगा किनारेके जलवाले प्रदेशसे अन्धकारके समान चारों ओर बड़े वेगसे भागा रहा है ॥ ६१ ॥ हाथियोंके झुण्डकी रक्षा करनेवाला यह भद्र गजराज सूंडको अँचा उठाता हुआ तथा दिशाओंको सूघता हुआ धीरे-धीरे ऐसा जा रहा है मानो शेषनागसहित सुमेरु पर्वत ही जा रहा हो ।। ६२ ॥ जिसने अपने शरीरके ऊर्ध्वभागको ऊँचा उठा रखा है ऐसा यह बड़ा भारी सर्प जलवाले प्रदेशसे साँस लेता हुआ इस प्रकार आ रहा है मानो वृक्षोंकी लम्बाईको नापता हुआ ही आ रहा हो ॥६३।। इधर इस लतागृहमें इकट्ठे हुए ये अजगरके बच्चे इस प्रकार श्वास ले रहे हैं मानो सेनाके क्षोभसे वनकी अंतड़ियोंके समूह ही निकल आये हों ॥६४|| जो अकेला ही फिरा करता है, जिसने अपनी नाकसे समीपके स्थल खोद डाले हैं, और जो अत्यन्त क्रोधी है ऐसा यह शूकर सेनाका मार्ग रोक रहा है ॥६५॥ सेनाके लोगोंने जिसे पत्थर लकड़ी आदिसे रोक रखा है ऐसा यह गण्ड अर्थात् छोटे पर्वतके समान दिखनेवाला गैंडा हाथी स्पष्ट रूपसे सेनाको व्याकुल कर रहा है ॥६६॥ जो दावानलकी ज्वालाके समान पीले और विस्तृत गरदनपर-के बालोंके समूहोंको हिला रहे हैं ऐसे ये सिंह इस वनसे इस प्रकार १ नाकिनाम् । २ प्रतानिनीलताभिः । 'लता प्रतानिनी वीरुत् गुल्मिन्युपलमित्यपि' इत्यभिधानात् । ३ बहुजलप्रदेशात् । 'जलप्रायमनूपं स्यात् पुंसि कच्छस्तथाविधः ।' इत्यभिधानात् । ४ विभक्तम् । ५ आघ्राणयन् । ६ प्रमिति कुर्वन्निव । ७ दीर्धीभवति । यमुनः स्वेऽङ्गे चाजाः” इत्यात्मनेपदी। -नागच्छते ल०, इ०। ८ अजगरशिशवः । ९ निकुञ्जऽस्मिन् ल०, द०, इ०। १० पुरीतत् । ११ एकाको । १२ मुखाग्र । 'मुखाग्रे क्रोडहलयोः पोत्रम्' इत्यभिधानात् । 'योत्रप्पोहलक्रोडमुखे त्रट्' इति सूत्रेण सिद्धिः । १३ वेष्टितः । १४ आकुली-ल०। १५ खड्गीमृगः । १६ गण्डशल इव। १७ दवज्वालसदृशाः ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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