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________________ द्विचत्वारिंशत्तमं पर्व ३४५ पोषयत्यतियनेन तया भूपोऽप्यविप्लवे । देशे स्वानुगतं लोकं स्थापयित्वाऽमिरक्षतु ॥१६॥ राज्यादिपरिवर्तेपु जनोऽयं पीड्यतेऽन्यथा । चौरैडमिरकैरन्यैरपि प्रत्यन्तनायकैः ॥१६३॥ "प्रसह्य च तथाभूतान् वृत्तिच्छेदेन योजयेत् । कण्टकोद्धरणेनैव प्रजानां क्षेमधारणम् ॥१६॥ यथैव गोपः संजातं वत्सं मात्रासहामुकम्(नुगम् ) । दिनमैकमवस्थाप्य ततोऽन्येद्यर्दयाईधीः ॥१६॥ विधाय चरणे तस्य शनैर्बन्धनसन्निधिम् । नामिनालं पुनर्गर्भनाले नापास्य यत्नतः ॥१६६॥ जन्तुसंभवशङ्कायां प्रतीकारं विधाय च । क्षीरोपयोगदानाद्यर्वईयेत् प्रतिवासरम् ॥१६७।। भूपोऽप्येवमुपासन्नं वृत्तये स्वमुपासितुम्' । यथाऽनुरूपैः संमानैः स्वीकुर्यादनुजीविनम् ॥१६८।। स्वीकृतस्य च तस्योद्धजीवनादिप्रचिन्तया । योगक्षेमं प्रयुञ्जीत कृतक्लेशस्य सादरम् ।।१६९॥ यथैव खलु गोपालः पशून् क्रेतुं समुद्यतः । क्षीरावलोकनाद्यैस्तान् परीक्ष्य गुणवत्तमान् ॥१७॥ क्रीणाति शकुनादीनामवधारणतत्परः । कुलपुत्रान्नपोऽप्येवं क्रीणीयात् सुपरीक्षितान् ॥११॥ क्रीतांश्च वृत्तिमूल्येन तान् यथावसरं प्रभुः । कृत्येषु विनियुञ्जीत भृत्यैः साध्यं फलं हि तत् ॥१७२॥ "यद्वच्च प्रतिभूः कश्चिद् यो क्रये प्रतिगृह्यते । बलवान् प्रतिभूस्त द्वग्राह्यो भृत्योपसंग्रहे ॥१७३॥ "याममात्रावशिष्टायां रात्रावुत्थाय यत्नतः । चारयित्वोचिते देशे गाः प्रभूततृणोदके ॥१७॥ पोषण करता है उसी प्रकार राजाको भी अपने सेवक लोगोंको किसी उपद्रवहीन स्थान में रखकर उनकी रक्षा करनी चाहिए ।।१६१-१६२॥ यदि वह ऐसा नहीं करेगा तो राज्य आदिका परिवर्तन होनेपर चोर, डाकू तथा समीपवर्ती अन्य राजा लोग उसके इन सेवकों को पीड़ा देने लगेंगे ॥१६३।। राजाको चाहिए कि वह ऐसे चोर डाकू आदिकी आजीविका जबरन नष्ट कर दे क्योंकि काँटोंको दूर कर देनेसे ही प्रजाका कल्याण हो सकता है ।।१६४।। जिस प्रकार ग्वाला हालके उत्पन्न हुए बच्चेको एक दिन तक माताके साथ रखता है, दूसरे दिन दयाबुद्धिसे मुक्त हो उसके पैर में धीरेसे रस्सी बाँधकर खूटीसे बाँधता है, उसकी जरायु तथा नाभिके नालको बड़े यत्नसे दूर करता है, कीड़े उत्पन्न होनेकी शंका होनेपर उसका प्रतीकार करता है, और दूध पिलाना आदि उपायोंसे उसे प्रतिदिन बढ़ाता है ॥१६५-१६७।। उसी प्रकार राजाको भी चाहिए कि वह आजीविकाके अर्थ अपनी सेवा करनेके लिए आये हुए सेवकको उसके योग्य आदर सन्मानसे स्वीकृत करे और जिन्हें स्वीकृत कर लिया है तथा जो अपने लिए क्लेश सहन करते हैं ऐसे उन सेवकोंकी प्रशस्त आजीविका आदिका विचार कर उनके साथ योग और क्षेमका प्रयोग करना चाहिए अर्थात् जो वस्तु उनके पास नहीं है वह उन्हें देनी चाहिए और जो वस्तु उनके पास है उसकी रक्षा करनी चाहिए ॥१६८-१६९।। जिस प्रकार शकुन आदि के निश्चय करने में तत्पर रहनेवाला ग्वाला जब पशुओंको खरीदनेके लिए तैयार होता है तब वह दूध देखना आदि उपायोंसे परीक्षा कर उनमें-से अत्यन्त गुणी पशुओंको खरीदता है उसी प्रकार राजाको भी परीक्षा किये हुए उच्चकुलीन पुत्रोंको खरीदना चाहिए ॥१७०-१७१॥ और आजीविकाके मूल्यसे खरीदे हुए उन सेवकोंको समयानुसार योग्य कार्य में लगा देना चाहिए क्योंकि वह कार्यरूपी फल सेवकोंके द्वारा ही सिद्ध किया जा सकता है ॥१७२॥ जिस प्रकार पशुओंके खरीदने में किसीको जामिनदार बनाया जाता है उसी प्रकार सेवकोंका संग्रह करने में भी किसी बलवान् पुरुषको जामिनदार बनाना चाहिए ॥१७३।। जिस प्रकार ग्वाला रात्रिके १ मूलबलम् । २-रक्षयेत् ल०, म० । ३ परिवर्तेऽस्य ल०, म० । राज्यादि मुक्त्वा राज्यान्तरप्राप्तिष । ४ अरक्षणप्रकारेण । ५ घाटोकारैः युद्धकारिभिर्वा । ६ म्लेच्छनायकैः । ७ हठात्कारेण । ८ वत्सस्य । ९ जरायुना। १० जोवनाय । ११ सेवां कर्तुम् । १२ क्रयणाय । १३ अतिशयेन गुणवतः । १४ कार्येषु । १५ यथैव ल०, म० । १६ घरकः । १७ प्रहर । १८ भक्षयित्वा ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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