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________________ ३४० आदिपुराणम् बहिरन्तर्मलापायादगर्भवसतिर्मता । कर्मनोकर्मविश्लेषात् स्यादगौरवलाघवम् ॥१०॥ तादवस्थ्यं गुणैरुदै रक्षोभ्य त्वमतो भवेत् । अविलीनत्वमात्मीयैर्गुणैरप्यवपृकता ॥१०॥ प्राग्देहाकारमूर्तित्वं यदस्याहेयमक्षरम् । साऽभीष्टा परमा काष्टा योगरूपत्वमात्मनः ॥१०६॥ लोकापवासस्त्रैलोक्यशिखरे शाश्वती स्थितिः । अशेषपुरुषार्थानां निष्टा परमसिद्धता ॥१०७॥ यः समग्रैर्गुणैरेमिर्ज्ञानादिमिरलंकृतः । किं तस्य कृतकृत्यस्य परद्रव्योपसर्पणैः ॥१०॥ एष संसारिदृष्टान्तो व्यतिरेकेण साधयेत् । परमात्मानमात्मानं प्रभुमप्रतिशासनम् ॥१०९॥ त्रिभिनिदर्शनैरेमिराविष्कृतमहोदयः । स आप्तस्तन्मते धीरैराधेया मतिरात्मनः ॥११०॥ "एवं हि क्षत्रियश्रेष्ठो भवेद् दृष्टपरम्परः । मतान्तरेषु दौःस्थित्यं भावयन्नपपत्तिभिः ॥१११॥ दिगन्तरेभ्यो ब्यावर्त्य प्रबुद्धां मतिमात्मनः । सन्मार्ग स्थापयन्नेवं कुर्यान्मत्यनुपालनम् ॥११२॥ आत्रिकामुत्रिकापायात् परिरक्षणमात्मनः । आत्मानुपालनं नाम तदिदानी विवृण्महे ॥११३॥ आधिकापायसंरक्षा सुप्रतीतैव धीमताम् । विषशस्त्राद्यपायानां परिरक्षणलक्षणा ॥११॥ कभी क्षरण अर्थात् विनाश नहीं होता इसलिए इसमें अक्षरता अर्थात् अविनाशीपन है और आत्मासे उत्पन्न हुए श्रेष्ठ युगोंसे इसका प्रमाण नहीं किया जा सकता इसलिए इसमें अप्रमेयपना है ॥१०३॥ बहिरंग और अन्तरंग मलका नाश हो जानेसे इसका गर्भावास नहीं माना जाता है और कर्म तथा नोकर्मका नाश हो जानेसे इसमें गुरुता और लघुता भी नहीं होती है ॥१०४॥ यह आत्मासे उत्पन्न हुए प्रशंसनीय गुणोंसे अपने स्वरूप में अवस्थित रहता है इसलिए इसमें अक्षोम्यपना है और आत्माके गुणोंसे कभी रहित नहीं होता इसलिए अविलीनपना है ॥१०५॥ जो कभी न छूटने योग्य और कभी न नष्ट होने योग्य पहलेके शरीरके आकार इसकी मूर्ति रहती है वही इसकी परम हद्द है और वही इसकी योगरूपता है ॥१०६॥ तीनों लोकोंके शिखरपर जो इसकी सदा रहनेवाली स्थिति है वही इसका लोकाग्रवास गुण है और जो समस्त पुरुषार्थोकी पूर्णता है वही इसकी परमसिद्धता है ॥१०७॥ इस प्रकार जो इन ज्ञान आदि समस्त गुणोंसे अलंकृत है उस कृतकृत्य हुए मुक्त जीवको अन्य द्रव्योंकी प्राप्तिसे क्या प्रयोजन है ? अर्थात् कुछ नहीं ॥१०८॥ यह संसारो जीवका दृष्टान्न व्यतिरेक रूपसे आत्माको, जिसपर किसीका शासन नहीं है और जो प्रभुरूप है ऐसा परमात्मा सिद्ध करता है । भावार्थइस संसारी जीवके उदाहरणसे यह सिद्ध होता है कि यह आत्मा ही परमात्मा हो जाता है ॥१०९।। इस प्रकार इन तीन उदाहरणोंसे जिसका महोदय प्रकट हो रहा है वही आप्त है, उसी आप्तके मतमें धीर-वीर पुरुषोंको अपनी बुद्धि लगानी चाहिए ॥११०॥ इस तरह जिसने सब परम्परा देख ली है, और जो अन्य मतोंमें युक्तियोंसे दुष्टताका चिन्तवन करता है वही सब क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ कहलाता है ॥१११॥ क्षत्रियको चाहिए कि वह अपनी जागृत बुद्धिको अन्य दिशाओं अर्थात् मतोंसे हटाकर समीचीन मार्गमें लगाता हुआ उसकी रक्षा करे ॥११२॥ इस लोक तथा परलोक सम्बन्धी अपायोंसे आत्माकी रक्षा करना आत्माका पालन करना कहलाता है । अब आगे इसी आत्माके पालनका वर्णन करते हैं ॥११३॥ विष शस्त्र आदि अपायोंसे अपनी रक्षा करना ही जिसका लक्षण है ऐसी इस लोकसम्बन्धी अपायोंसे १ अगुरुलघुत्वम् । २ स्वरूपावस्थानम् । ३ न केवलं देहादिभिः । ज्ञानादिगुणैरपि । ४ अत्यक्तता। -रप्यपवृत्तता। 'अपवृत्तता' इति पाठे अपवर्तनत्वं गुणगुणीभावरहित्यम् । ५ निष्पत्तिः । परिसमाप्तिरित्यर्थः । ६ व्यतिरेकिदृष्टान्तेन । ७ एवं कृते सति । ८-न्नेव इ०, ल०, म० ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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