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________________ ३२६ आदिपुराणम् जिनानुस्मरणे तस्य समाधानमुपेयुषः । शैथिल्या गात्रबन्धस्य स्रस्तान्याभरणान्यहो ॥११३॥ तथापि बहुचिन्तस्य धर्मचिन्ताऽभवद् दृढा । धर्मेहि चिन्तिते सर्व चिन्त्यं स्यादनुचिन्तितम् ।।१२४॥ तस्याखिलाः क्रियारम्भा धर्मचिन्तापुरस्सराः। जाता जातमहोदकपुण्यपाकोत्थसंपदः ॥११५॥ प्रातरुन्मीलिताक्षः सन् सन्ध्यारागारुणा दिशः । स मेनेऽहत्पदाम्भोजरागेणेवानुरञ्जिताः ॥११६।। प्रातरुद्यन्तमुद्धतनैशान्धतमसं रविम् । भगवत्केवलार्कस्य प्रतिबिम्बममस्त सः ॥११७॥ प्रभातमरुतोद्धतप्रबुद्ध कमलाकरात् । हृदि सोऽधाजिनालापकलापानिव शीतलान् ।।११८।। धार्मिकस्यास्य कामार्थचिन्ताऽभूदानुषङ्गिकी । तात्पर्य त्वभवद्धमें कृत्स्नश्रेयोऽनुबन्धिनि ॥ ११९॥ प्रातरुत्थाय धर्मस्थैः कृतधर्मानुचिन्तनः । ततोऽर्थकामसंपत्तिं सहामात्यैयरूपयत् ॥१२०॥ तल्पादुत्थितमात्रोऽसौ संपूज्य गुरुदैवतम् । कृतमङ्गलनेपथ्यौ धर्मासनमधिष्ठितः ॥१२१॥ प्रजानां सदसद्वृत्तचिन्तनैः क्षणमासितः । तत आयुक्तकान् स्वेषु नियोगेष्वन्धशाद् विभुः ॥१२२॥ नृपासनमथाध्यास्य महादर्शनमध्यगः । नृपान् संभावयामास सेवावसरकाक्षिणः ॥१२३॥ कांश्चिदालोकनैः कांश्चिस्मितैराभाषणैः परान् । कांश्चित्समानदानाद्येस्तर्पयामास पार्थिवान् ॥१२॥ हुए जिनमन्दिरमें ही रहते थे और उस समय ठीक मुनियोंका आचरण धारण करते थे ॥११२॥ जिनेन्द्रदेवका स्मरण करने में वे समाधानको प्राप्त हो रहे थे - उनका चित्त स्थिर हो रहा था और आश्चर्य है कि शरीरके बन्धन शिथिल होनेसे उनके आभूषण भी निकल पड़े थे ॥११३।। यद्यपि उन्हें बहुत पदार्थों की चिन्ता करनी पड़ती थी तथापि उनके . धर्मकी चिन्ता अत्यन्त दृढ़ थी सो ठीक ही है क्योंकि धर्मकी चिन्ता करनेपर चिन्ता करने योग्य समस्त पदार्थोंका चिन्तवन अपने आप हो जाता है ॥११४॥ बड़े भारी फल देनेवाले पुण्यकर्मके उदयसे जिन्हें अनेक सम्पदाएँ प्राप्त हुई हैं ऐसे भरतकी समस्त क्रियाओंका प्रारम्भ धर्मके चिन्तवनपूर्वक ही होता था अर्थात् महाराज भरत समस्त कार्योंके प्रारम्भमें धर्मका चिन्तवन करते थे ॥११५॥ वे प्रातःकाल आँख खोलकर जब समस्त दिशाओंको सबेरेकी लालिमासे लाल-लाल देखते थे तब ऐसा मानते थे मानो ये दिशाएँ जिनेन्द्रदेवके चरणकमलोंकी लालिमासे ही लाल-लाल हो गयो हैं ॥११६॥ जिसने रात्रिका गाढ़ अन्धकार नष्ट कर दिया है ऐसे सूर्यको प्रातःकालके समय उदय होता हुआ देखकर वे ऐसा समझकर उठते थे मानो यह भगवान्के केवलज्ञानका प्रतिबिम्ब ही हो ॥११७॥ प्रातःकालकी वायुके चलनेसे खिले हुए कमलोंके समूहको वे अपने हृदयमें जिनेन्द्र भगवान्की दिव्यध्वनिके समूहके समान शीतल समझते थे ॥११८॥ वे बहुत ही धर्मात्मा थे, उनके काम और अर्थको चिन्ता गौण रहती थी तथा उनका मुख्य तात्पर्य सब प्रकारका कल्याण करनेवाले धर्म में ही रहता था ॥११९॥ वे सबेरे उठकर पहले धर्मात्मा पुरुषोंके साथ धर्मका चिन्तवन करते थे और फिर मन्त्रियोंके साथ अर्थ तथा कामरूप सम्पदाओंका विचार करते थे ॥१२०॥ वे शय्यासे उठते ही देव और गुरुओंकी पूजा करते थे और फिर मांगलिक वेष धारण कर धर्मासनपर आरूढ़ होते थे ॥१२१॥ वहाँ प्रजाके सदाचार और असदाचारका विचार -करते हए वे क्षण-भर ठहरते थे तदनन्तर अधिकारियोंको अपने-अपने कामपर नियुक्त करते थे अर्थात् अपना-अपना कार्य करनेकी आज्ञा देते थे ॥१२२।। इसके बाद सभाभवनके बीचमें जाकर राजसिंहासनपर विराजमान होते तथा सेवाके लिए अवसर चाहनेवाले राजाओंका सन्मान करते थे ॥ १२३ ॥ वे कितने ही राजाओंको दर्शनसे, कितनों ही को मुसकानसे, १ गलितानि। २ निशासंबन्धि । ३ विकसित । ४ अमुख्या। ५ धर्मस्थैः सह । ६ विजारमकरोत् । .७ मङ्गलालंकारः। ८ आसनमण्डलविशेषम् । ९ तत्परान् । १० सभादर्शन-अ०, स० । सभासदन-प०, ल०, म० । महदर्शनं येषां ते महादर्शनास्तेषां मध्यगः । सभ्यजनमध्यवर्ती सन्नित्यर्थः ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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