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________________ २८० आदिपुराणम् तवाहती विधा मिना शक्ति चैगुण्यसंश्रिताम् । स्वसास्कृत्य समुद्धता वयं संस्कारजन्मना ॥११५॥ अयोनिसंभवास्तेन देवा एव न मानुषाः । वयं वयमिवान्येऽपि सन्ति चेद् ब्रूहि तद्विधान् ॥११६॥ स्वायम्भुवान्मुखाजातास्ततो देवद्विजा वयम् । व्रतचिह्नं च नः सूत्रं पवित्रं सूत्रदर्शितम् ॥११७॥ पापसूत्रानुगा यूयं न द्विजा सूत्रकण्ठकाः । सन्मार्गकण्टकास्तीक्ष्णाः केवलं मलदूषिताः ॥११८॥ शरीरजन्म संस्कारजन्म चेति द्विधा मतम् । जन्माङ्गिनां मृतिश्चैवं द्विधाम्नाता जिनागमे ॥११९॥ देहान्तरपरिप्राप्तिः पूर्वदेहपरिक्षयात् । शरीरजन्म विज्ञेयं देहभाजां भवान्तरे ॥१२०॥ तथालब्धात्मलामस्य पुनः संस्कारयोगतः । द्विजन्मतापरिप्राप्तिर्जन्म संस्कारजं स्मृतम् ॥१२१॥ शरीरमरणं स्वायुरन्ते देह विसर्जनम् । संस्कारमरणं प्राप्तव्रतस्यागःसमुज्झनम् ॥१२२॥ "यतोऽयं लब्धसंस्कारो विजहाति प्रगेतनम् । मिथ्यादर्शनपर्यायं ततस्तेन मृतो भवेत् ॥१२३॥ तत्र संस्कारजन्मेदमपापोपहतं परम् । जातं नो' गुर्वनुज्ञानादतो देवद्विजा वयम् ॥१२॥ इत्यात्मनो गुणोत्कर्ष ख्यापयन्न्यायवर्त्मना । गृहमेधी भवेत् प्राप्य सद्गृहित्वमनुत्तरम् ॥१२५॥ भूयोऽपि संप्रवक्ष्यामि ब्राह्मणान् सक्रियोचितान् । जातिवादावलेपस्य "निरासार्थमतः परम् ॥१२६॥ ज्ञान ही अत्यन्त निर्मल गर्भ है ।।११४॥ उस गर्भ में उपलब्धि, उपयोग और संस्कार इन तीन गुणोंके आश्रित रहनेवाली जो अरहन्तदेवसम्बन्धिनी सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र ये तीन भिन्न-भिन्न शक्तियाँ हैं उन्हें अपने अधीन कर हम संस्काररूपी जन्मसे उत्पन्न हुए हैं ॥११५॥ हम लोग बिना योनिसे उत्पन्न हुए हैं इसलिए देव ही हैं मनुष्य नहीं हैं, हमारे समान जो और भी हैं उन्हें भी तू देवब्राह्मण कह ॥११६।। हम लोग स्वयम्भूके मुखसे उत्पन्न हुए हैं इसलिए देवब्राह्मण हैं और हमारे व्रतोंका चिह्न शास्त्रोंमें कहा यह पवित्र सूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत है ॥११७॥ आप लोग तो गलेमें सूत्र धारण कर समीचीन मार्गमें तीक्ष्ण कण्टक बनते हुए पापरूप सूत्रके अनुसार चलनेवाले हैं, केवल मलसे दूषित हैं, द्विज नहीं हैं ॥११८॥ जीवोंका जन्म दो प्रकारका है एक तो शरीरजन्म और दूसरा संस्कार-जन्म । इसी प्रकार जैनशास्त्रोंमें जीवोंका मरण भी दो प्रकारका माना गया है ॥११९।। पहले शरीरका क्षय हो जानेसे दूसरी पर्यायमें जो दूसरे शरीरकी प्राप्ति होती है उसे जीवोंका शरीरजन्म जानना चाहिए। ॥१२०॥ इसी प्रकार संस्कारयोगसे जिसे पुनः आत्मलाभ प्राप्त हुआ है ऐसे पुरुषको जो द्विजपनेकी प्राप्ति होना है वह संस्कारज अर्थात् संस्कारसे उत्पन्न हुआ जन्म कहलाता है ॥१२१॥ अपनी आयुके अन्तमें शरीरका परित्याग करना शरीरमरण है तथा व्रती पुरुषका पापोंका परित्याग करना संस्कारमरण है ।।१२२॥ इस प्रकार जिसे सब संस्कार प्राप्त हुए हैं ऐसा जोव मिथ्यादर्शनरूप पहलेके पर्यायको छोड़ देता है इसलिए वह एक तरहसे मरा हुआ ही कहलाता है ॥१२३॥ उन दोनों जन्मोंमें-से जो पापसे दूषित नहीं है ऐसा संस्कारसे उत्पन्न हुआ यह उत्कृष्ट जन्म गुरुकी आज्ञानुसार मुझे प्राप्त हुआ है इसलिए मैं देवद्विज या देवब्राह्मण कहलाता हूँ ॥१२४। इस प्रकार न्यायमार्गसे अपने आत्माके गुणोंका उत्कर्ष प्रकट करता हुआ बह पुरुष सर्वश्रेष्ठ सद्गृहित्व अवस्थाको पाकर सद्गृहस्थ होता है ।।१२५।। उत्तम कियाओंके करने योग्य ब्राह्मणोंसे उनके जातिवादका अहंकार दूर करनेके लिए इसके १ ज्ञानगर्थे। २ सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणीति त्रिप्रकारैः । ३ उपलब्ध्युपयोगसंस्कारात्मतां गताम् । ४ अयोनिसंभवप्रकारान् । अयोनिसंभवसदृशानित्यर्थः । ५ आगमप्रोक्तम् । ६ सूत्रमात्रमेव कण्ठे येषां ते । ७ यस्मात् कारणात् । ८ प्राक्तनम् । ९ मिथ्यादर्शनत्यजनरूपेणेत्यर्थः । १० शरीरजन्मसंस्कारजन्मनोः । ११ अस्माकम् । १२ गुरोरनुज्ञायाः। १३ गर्वस्य । १४ निराकरणाय ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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