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________________ २६४ आदिपुराणम सैषा निक्रान्तिरस्येष्टा क्रिया राज्याद विरज्यतः । लौकान्तिकामरैर्भूयो बोधितस्य समागतः ॥२६॥ कृतराज्यार्पणो ज्येप्ठे सूनौ' पार्थिवसाक्षिकम् । संतानपालने चास्य करोतीत्यनुशासनम् ॥२६॥ त्वया न्यायधनेनाङ्ग भवितव्यं प्रजातौ । प्रजा कामदुधा धेनुर्मता न्यायेन योजिता ॥२६१॥ राजवृत्तमिदं विन्द्वि यन्न्यायेन धनार्जनम् । वर्धनं रक्षणं चास्य 'तीर्थे च प्रतिपादनम् ॥२७॥ प्रजानां पालनार्थं च मतं मत्यनुपालनम् । मतिर्हिताहितज्ञानमात्रिकामुत्रिकायोः ॥२७१॥ ततः कृतेन्द्रियजयो वृद्धसंयोगसंपदा । धर्मार्थ शास्त्रविज्ञानात् प्रज्ञा संस्कर्तुमर्हसि ॥२७॥ अन्यथा विमतिर्भूपो युक्तायुक्तानभिज्ञकः । अन्यथाऽन्यः प्रणेयः स्यान्मिध्याज्ञानलवोद्धतैः ॥२३॥ कुलानुपालने चायं महान्तं यत्नमाचरेत् । अज्ञातकुलधर्मो हि दुर्वृत्तैर्दूषयेत् कुलम् ॥२७४॥ तथायमात्मरक्षायां सदा यत्नपरो भवेत् । रक्षितं हि भवेत् सर्व नृपणात्मनि रक्षिते ॥२५॥ अपायो हि सपत्नेभ्यो नृपस्यारक्षितात्मनः । आत्मानुजीविवर्गाच्च क्रुद्धलुब्धविमानितात्" ॥२७६॥ "तस्माद रसदतीक्ष्णादीनपायानरियोजितान् । परिहत्य निरिष्टे: स्वं प्रयत्नेन पालयेत् ॥२७॥ स्यात् समञ्जसवृत्तित्वमप्यस्यात्माभिरक्षणे । असमञ्जसवृत्तौ हि निजैरप्यभिभूयते ॥२७८॥ जो राज्यसे विरक्त हो रहे हैं और आये हुए लौकान्तिक देव जिन्हें बार-बार प्रबोधित कर रहे हैं ऐसे उन भगवान्को यह निष्क्रान्त नामकी क्रिया कही जाती है ॥२६७॥ वे समस्त राजाओंकी साक्षीपूर्वक अपने बड़े पुत्रके लिए राज्य सौंप देते हैं और सन्तान-पालन करनेके लिए उसे इस प्रकार शिक्षा देते हैं ॥२६८॥ हे पुत्र, तुझे प्रजाके पालन करनेमें न्यायरूप धनसे मुक्त होना चाहिए अर्थात् तू न्यायको ही धन समझ, क्योंकि न्यायपूर्वक पालन की हुई प्रजा मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली कामधेनु गायके समान मानी गयी है ॥२६९।। हे पुत्र, तू इसे ही राजवृत्त अर्थात् राजाओंका कर्तव्य समझ कि न्यायपूर्वक धन कमाना, उसकी वृद्धि करना, रक्षा करना तथा तीर्थस्थान अथवा योग्य पात्रोंका देना ॥२७०॥ प्रजाका पालन करनेके लिए सबसे अपनी बुद्धिकी रक्षा करनी चाहिए, इस लोक और परलोक दोनों लोकसम्बन्धी पदार्थों के विषयमें हित तथा अहितका ज्ञान होना ही मति कहलाती है ॥२७१। इसलिए वृद्ध मनुष्योंकी संगतिरूपी सम्पदासे इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर तुम धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्रके ज्ञानसे अपनी बुद्धि को सुसंस्कृत बनानेके योग्य हो अर्थात् बुद्धिके अच्छे संस्कार बनाओ ॥२७२॥ यदि राजा इससे विपरीत प्रवृत्ति करेगा तो वह हित तथा अहितका जानकार न होनेसे बुद्धिभ्रष्ट हो जावेगा और ऐसी दशामें वह मिथ्याज्ञानके अंश मात्रसे उद्धत हुए अन्य कुमार्गगामियोंके वश हो जावेगा ॥२७३॥ राजाओंको अपने कुलकी मर्यादा पालन करने के लिए बहुत भारी प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि जिसे अपनी कुलमर्यादाका ज्ञान नहीं है वह अपने दुराचारोंसे कुलको दूषित कर सकता है ॥२७४॥ इसके सिवाय राजाको अपनी रक्षा करनेमें भी सदा यत्न करते रहना चाहिए क्योंकि अपने आपके सुरक्षित रहनेपर हो अन्य सब कुछ सुरक्षित रह सकता है ।।२७५॥ जिसने अपने आपकी रक्षा नहीं की है ऐसे राजाका शत्रुओंसे तथा क्रोधी, लोभी और अपमानित हुए अपने ही सेवकोंसे विनाश हो जाता है ॥२७६।। इसलिए शत्रुओंके द्वारा किये हुए प्रारम्भमें सरल किन्तु फलकालमें कठिन अपायोंका परिहार कर अपने इष्ट वर्गोके द्वारा प्रयत्नपूर्वक अपनी रक्षा करनी चाहिए ॥२७७॥ इसके सिवाय १ प्रजापती निमित्तम् । २ धनस्य । ३ पात्रे। ४ निजबुद्धिरक्षणम् । ५ ततः कारणात् । ६ नीतिशास्त्र । ७ भूयो इ०, ५०, स०। ८ वश्यः । ९ दायादेभ्यः शत्रुभ्यो वा। १० तिरस्कृतात् । ११ तस्मात् कारणात् । १२ रसतामास्वादं कुर्वतामकटुकादीन् रसनकाले अनुभवनकाले स्वादुरसप्रदान् विपाककाले कटुकानित्यर्थः । १३ आत्मरक्षानिमित्तम् । - त्मादिरक्षणे अ०, ५०, द० ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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