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________________ २६२ आदिपुराणम् विलसद्बह्मसूत्रेण प्रविभक्ततनून्नतिः । तटनिर्झरसंपातरम्यमूर्तिरिवाद्रिपः ॥२४५॥ सदनकटकं प्रोच्चैः शिखरं भुजयोयुगम् । द्वाधिमश्लाघि बिभ्राणः' कुलक्ष्माध्रद्वयायितम् ॥२४६॥ कटिमण्डलसंसक्तलसत्काञ्चीपरिच्छदः । महाद्वीप इवोपान्तरत्रवेदीपरिष्कृतः ॥२४॥ मन्दारकुसुमामोदलग्नालिकुलझंकृतः । किमप्यारब्धसंगीतमित्र शेखरमुद्वहन् ॥२४८॥ तत्कालोचितमन्यच्च दधन्मङ्गलभूषणम् । स तदा लक्ष्यते साक्षालक्ष्म्याः पुञ्ज इवोच्छिखः ॥ ४९॥ प्रीताश्चाभिष्टुवन्त्येनं तदामी नृपसत्तमाः। विश्वंजयो दिशां जेता दिव्यमूर्तिमवानिति ॥२५०॥ पौराः प्रकृतिमुख्याश्च कृतपादाभिषेचनाः । तत्क्रमार्चनमादाय कुर्वन्ति स्वशिरोधतम् ॥२५१॥ श्रीदेव्यश्च सरिदेव्यो देव्यो विश्वेश्वरा अपि । समुपेत्य नियोगः स्वैस्तदनं पर्युपासते ॥२५२॥ इति चक्राभिषेकः । चक्राभिषेक इत्येकः समाख्यातः क्रियाविधिः । तदनन्तरमस्य स्यात् साम्राज्याख्यं क्रियान्तरम् ॥२५३॥ अपरेर्दिनारम्भे त पुण्यप्रसाधनः । मध्ये महानृपसमं नृपासनमधिष्टितः ॥२५॥ दीप्रैः प्रकीर्णकवातैः स्वधुनीसीकरोज्ज्वलैः । वारनारीकराधूतैर्वीज्यमानः समन्ततः ॥२५५॥ सेवागतैः पृथिव्यादिदेवतांशः परिष्कृतः । तिप्रशान्तदीप्त्योजी निर्मलत्वोपमा दिभिः ॥२५६॥ पंक्तिके समान चंचल तथा बड़े-बड़े मोतियोंसे युक्त हार धारण किये हुए हैं, शोभायमान यज्ञोपवीतसे जिनके शरीरकी उच्चता प्रकट हो रही है और इसी कारण जो तटपर पड़ते हुए निर्झरनोंसे सुन्दर आकारवाले सुमेरु पर्वतके समान जान पड़ते हैं, जो रत्नोंके कटक अर्थात् कड़ों ( पक्षमें रत्नमय मध्यभागों ) से सहित, ऊँचे-ऊँचे शिखरों अर्थात् कन्धों ( पक्षमें चोटियों ) से युक्त, लम्बाईसे सुशोभित और इसलिए ही दो कुलाचलोंके समान आचरण करनेवाली दो भुजाओंको धारण कर रहे हैं, जिनकी कमरपर देदीप्यमान करधनी सटी हुई है और उससे जो ऐसे जान पड़ते हैं मानो चारों ओरसे रत्नमयी वेदीके द्वारा घिरा हुआ कोई महाद्वीप ही हो, जो मन्दार वृक्षके फूलोंकी सुगन्धिके कारण आकर लगे हुए भ्रमरोंके समूहकी झंकारोंसे कुछ गाते हएके समान सुशोभित होनेवाले शेखरको धारण कर रहे हैं तथा उस कालके योग्य अन्य-अन्य मांगलिक आभूषण धारण किये हुए हैं ऐसे वे भगवान् उस समय ऐसे जान पड़ते हैं मानो जिसकी शिखा ऊँची उठ रही है ऐसा साक्षात् लक्ष्मीका पुंज ही हो ॥२४१-२४९॥ उस समय अन्य उत्तम-उत्तम राजा लोग सन्तष्ट होकर उनको इस प्रकार स्तति करते हैं कि आपने समस्त संसारको जीत लिया है, आप दिशाओंको जीतनेवाले हैं और दिव्यमूर्ति हैं ॥२५०॥ नगरनिवासी लोग तथा मन्त्री आदि मुख्य-मुख्य पुरुष उनके चरणोके अभिषेक करते हैं और उनका चरणोदक लेकर अपने-अपने मस्तकपर धारण करते हैं ॥२५१॥ श्री ह्री आदि देवियाँ, गंगा सिन्धु आदि देवियाँ तथा विश्वेश्वरा आदि देवियाँ अपने-अपने नियोगोंके अनुसार आकर उस समय उनकी उपासना करती हैं ॥२५२॥ यह चक्राभिषेक नामकी छियालीसवीं क्रिया है। इस प्रकार उनकी यह एक चक्राभिषेक नामकी क्रिया कही। अब इसके बाद साम्राज्य नामकी दूसरी क्रिया कहते हैं ।।२५३।। दूसरे दिन प्रातःकालके समय जिन्होंने पवित्र आभूषण धारण किये हैं, जो बड़े-बड़े राजाओंकी सभाके बीचमें राजसिंहासनपर विराजमान हैं, जिनपर देदीप्यमान गंगा नदीके जलके छींटोंके समान उज्ज्वल और गणिकाओंके हाथसे हिलाये हुए चमर चारों ओरसे ढुलाये जा रहे हैं, जो धृति, शान्ति, दीप्ति, ओज और निर्मलताको उत्पन्न करनेवाले १ दैर्घन श्लाघि । २ परिवेष्टितः । ३ ईषद् । ४ गङ्गादेव्यादयः । ५ पवित्रालंकारः । ६ महानृपसभायाः मध्ये । ७ पृथिव्यप्तेजोवायुगगनाधिदेवताविक्रियाशरीरैः इत्यर्थः । ८ भूषितः । ९ बलम् । 'ओजो दीप्ती बले' इत्यभिधानात् । १० उत्पादकैः ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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