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________________ २६१ आदिपुराणम् 'विश्वेश्वरा जगन्माता महादेवी महासती । पूज्या सुमङ्गला चेति धत्ते रूढिं जिनाम्बिका ॥२२५॥ कुलादिनिलया देव्यः श्रीहीधीतिकीर्तयः । समं लक्ष्म्या षडेताश्च संमता जिनमातृकाः ॥२२६॥ जन्मानन्तरमायातैः सुरेन्द्र मरुमूर्द्धनि । योऽभिषेकविधिः क्षीरपयोधेः शुचिभिर्जलैः ॥२२७॥ मन्दरेन्द्राभिषेकोऽसौ क्रियाऽस्य परमेष्टिनः । सा पुनः सुप्रतीतत्वाद् भूयो नेह प्रतन्यते ॥२२८॥ इति मन्दरेन्द्राभिषेकः । ततो विद्योपदेशोऽस्य स्वतन्त्रस्य स्वयंभुवः । शिष्यभावग्यतिक्रान्ति गुरुपूजोपलम्भनम् ॥२२९॥ तदेन्द्राः पूजयन्त्येनं त्रातारं त्रिजगद्गुरुम् । अशिक्षितोऽपि देवत्वं संमतोऽसीति विस्मिताः ॥२३०॥ इति गुरुपूजनम् । ततः कुमारकालेऽस्य यौवराज्योपलम्भनम् । पबन्धोऽभिषेकश्च तदास्य स्यान्महौजसः ॥२३॥ इति यौवराज्यम् । स्वराज्यमधि राज्येऽभिषिक्तस्यास्य क्षितीश्वरैः । शासतः सार्णवामेनां क्षितिमप्रतिशासनाम् ॥२३२॥ इति स्वराज्यम् । चक्रलामो भवेदस्य निधिरत्नसमुद्भवे । निजप्रकृतिभिः पूजा सामिषेकाऽधिराडिति ॥२३३॥ इति चक्रलाभः। अर्थात् सुवर्णकी वर्षासे जन्मकी उत्कृष्टता सूचित होनेके कारण हिरण्योत्कृष्ट जन्म इस सार्थक नामको धारण करनेवाली क्रियाको धारण करते हैं ॥२२४।। यह उनतालीसवीं हिरण्योत्कृष्टजन्मता क्रिया है। उस समय वह भगवान्की माता विश्वेश्वरी, जगन्माता, महादेवी, महासती, पूज्या और सुमंगला इत्यादि नामोंको धारण करती है ॥२२५॥ कुलाचलोंपर रहनेवाली श्री, ह्री, बुद्धि, धृति, कीर्ति और लक्ष्मी ये छह देवियाँ जिनमातृका अर्थात् जिनमाताकी सेवा करनेवाली कहलाती हैं ॥२२६॥ जन्मके अनन्तर आये हुए इन्द्रोंके द्वारा मेरु पर्वतके मस्तक पर क्षीरसागरके पवित्र जलसे भगवान्का जो अभिषेक किया जाता है वह उन परमेष्ठीकी मन्दराभिषेक किया है। वह किया अत्यन्त प्रसिद्ध है इसलिए यहाँ उसका फिरसे विस्तार नहीं किया जाता है ॥२२७-२२८॥ यह चालीसवीं मन्दराभिषेक किया है। तदनन्तर स्वतन्त्र और स्वयम्भू रहनेवाले भगवान्के विद्याओंको उपदेश होता है । वे शिष्यभावके बिना ही गुरुकी पूजाको प्राप्त होते हैं अर्थात् किसीके शिष्य हुए बिना ही सबके गुरु कहलाने लगते हैं ॥२२९। उस समय इन्द्र लोग आकर हे देव, आप अशिक्षित होनेपर भी सबको मान्य हैं इस प्रकार आश्चर्यको प्राप्त होते हुए सबकी रक्षा करनेवाले और तीनों जगत्के गुरु भगवान्की पूजा करते हैं ।।२३०॥ यह इकतालीसवीं गुरुपूजन किया है। तदनन्तर कुमारकाल आनेपर उन्हें युवराजपदकी प्राप्ति होती है, उस समय महाप्रतापवान् उन भगवान्के राज्यपट्ट बाँधा जाता है और अभिषेक किया जाता है ॥२३१॥ यह बयालीसवीं यौवराज्य किया है। । तत्पश्चात् समस्त राजाओंने राजाधिराज (सम्राट) के पदपर जिनका अभिषेक किया है और जो दूसरेके शासनसे रहित इस समुद्र पर्यन्तकी पृथिवीका शासन करते हैं ऐसे उन भगवान्के स्वराज्यकी प्राप्ति होती है ॥२३२॥ यह तैतालीसवीं स्वराज्य किया है। इसके बाद निधियों और रत्नोंकी प्राप्ति होनेपर उन्हें चकको प्राप्ति होती है उस समय १ विश्वेश्वरी ल० । २ शिष्यत्वाभावः । ३ गुरुपूजाप्राप्तिः । स्वस्य स्वयमेव गुरुरिति भावः । ४ पूजयन्त्येतं ल०, द०। ५ रक्षतः । ६ आत्मीयप्रजापरिवारैः ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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