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________________ अष्टत्रिंशत्तमं पर्व अवतारक्रियाऽस्य:न्या ततः संपरिवर्तते । कृतार्हत्यू जनस्यान्ते स्वर्गादवतरिष्यतः ॥ २१४॥ 'सोऽयं नृजन्मसंप्राप्त्या सिद्धि द्रागभिलाषुकः । चेतः सिद्धनमस्यायां समाधत्ते सुराधिराट् ॥ २१५॥ - शुभैः षोडशभिः स्वनैः संसूचितमहोदयः । तदा स्वर्गावताराख्यां कल्याणीमश्नुते क्रियाम् ॥ २१६ ॥ इति इन्द्रावतारः । 19 ર ततोऽवतीर्णो गर्भेऽसौ रत्नगर्भगृहोपमे । जनयित्र्या महादेव्या श्रीदेवीभिर्विशोधिते ॥२१७॥ हिरण्यवृष्टिं धनदे प्राक् षण्मासान् प्रवर्षति । 'अन्वायान्यामिवानन्दात् स्वर्गसंपदि भूतलम् ॥२१८॥ अमृतश्वसने मन्दमावाति व्याप्तसौरभ" । भूदेव्या इव निःश्वासे प्रक्लृप्ते पवनामरैः ॥२१९॥ दुन्दुभिध्वनि मन्द्रमुत्थिते पथि वार्मुचाम् । अकालस्तनिताशङ्कामातन्वति शिखण्डिनाम् ॥ २२० ॥ मन्दारत्रजमम्लानिमामोदाहृतषट्पदाम् । मुञ्चत्सु गुह्यकाख्येषु निकायेष्वमृताशिनाम् ॥ २२१ ॥ देवीपूपचरन्तीषु देवीं भुवनमातरम् । लक्ष्म्या समं समागत्य श्रीहीधीष्टतिकीर्तिषु ॥ २२२ ॥ कस्मिंश्चित् सुकृतावासे” पुण्ये राजर्षिमन्विरे । हिरण्यगर्भो धत्तेऽसौ हिरण्योत्कृष्टजन्मताम् ॥२२३॥ हिरण्यसूचितोत्कृष्टजन्यत्वात् स तथा श्रुतिम् " । विभ्राणां तां क्रियां धत्ते गर्भस्थोऽपि त्रिबोधभृत् ॥ २२४॥ इति हिरण्यजन्मता । 13 -२५९ आश्चर्यकी बात है कि धीरवीर पुरुष स्वर्गके वैसे ऐश्वर्यको भी बिना किसी कष्ट छोड़ देते हैं ||२१३ || इस प्रकार यह सैंतीसवीं इन्द्रत्याग क्रिया है । तदनन्तर-जो इन्द्र आयुके अन्त में अरहन्तदेवका पूजन कर स्वर्गसे अवतार लेना चाहता मैं मनुष्य जन्म पाकर बहुत अपना चित्त सिद्ध भगवान्को है उसके आगेकी अवतार नामकी क्रिया होती है || २१४ || शीघ्र मोक्ष प्राप्त किया चाहता हूँ यही विचार कर वह इन्द्र नमस्कार करनेमें लगाता है || २१५ || शुभ सोलह स्वप्नोंके द्वारा जिसने अभ्युदय माहात्म्य सूचित किया है ऐसा वह इन्द्र उस समय कल्याण करनेवाली स्वर्गावतार नामकी क्रियाको प्राप्त होता है || २१६ ॥ | यह अड़तीसवीं इन्द्रावतार क्रिया है । अपना बड़ा भारी तदनन्तर वे माता महादेवीके श्री आदि देवियोंके द्वारा शुद्ध किये हुए रत्नमय गर्भागार के समान गर्भ में अवतार लेते हैं ॥ २१७ || गर्भ में आनेके छह महीने पहलेसे जब कुबेर घरपर रत्नोंकी वर्षा करने लगता है और वह रत्नोंकी वर्षा ऐसी जान पड़ती है मानो आनन्दसे स्वर्गकी सम्पदा ही भगवान् के साथ-साथ पृथिवीतलपर आ रही हो, जब अमृत समान सुख देनेवाली वायु मन्द मन्द बहकर सब दिशाओं में फैल रही हो तथा ऐसी जान पड़ती हो मानो पत्रनकुमार देवोंके द्वारा निर्माण किया हुआ पृथिवीरूपी देवीका निःश्वास ही हो, जब आकाशमें उठी हुई - फैली हुई दुन्दुभि बाजोंकी गम्भीर आवाज मयूरोंको असमय में होनेवाली मेघगर्जनाकी शंका उत्पन्न कर रही हो, जब गुह्यक नामके देवोंके समूह कभी म्लान न होनेवाली और सुगन्धिके कारण भ्रमरोंको अपनी ओर खींचनेवाली कल्पवृक्ष के फूलोंकी मालाओं को बरसा रहे हों। और जब श्री, ह्री, बुद्धि, धृति और कीर्ति नामकी देवियाँ लक्ष्मीके साथ आकर स्वयं जगन्माता महादेवीकी सेवा कर रही हों उस समय पुण्यके निवासभूत किसी पवित्र राजमन्दिर में वे हिरण्यगर्भ भगवान् हिरण्योत्कृष्ट जन्म धारण करते हैं ||२१८२२३॥ जो गर्भमें स्थित रहते हुए भी तीन ज्ञानको धारण करनेवाले हैं ऐसे भगवान्, हिरण्य - १ सोऽहं ल० । २ झटिति । ३ नमस्कारे । ४ समाहितं प्रसूर्माता जननी' इत्यभिधानात् । ७ श्रीह्रोधृत्यादिभिः । १० व्याप्तमारुते ल० । ११ वायुकुमारैः । १३ देवभेदेषु त्कृष्टजन्मताभिधानम् । । कुरुते । ५ गच्छति । ६ जनन्याः । ' जनयित्री ८ सहागच्छन्त्याम् । ९ अमृतवदाह्लादकर मारुते । १३ स्वयं ल० । १४ पुण्यस्थाने । १५ हिरण्यो
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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