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________________ २५४ आदिपुराणम् अशक्यधारणं चेदं जन्तूनां कातरात्मनाम् । जैनं निस्संगतामुख्यं रूपं धीरनिपेव्यते ॥१६॥ इति जिनरूपता ।। कृतदीक्षोपवासस्य प्रवृत्तः पारणाविधौ । मौनाध्ययनवृत्तत्वमिष्टमाश्रतनिष्टितेः ॥१६१॥ वाचंयमो विनीतात्मा विशुद्धकरणत्रयः । सोऽधीयीत श्रुतं कृत्स्नमामूला गुरुसन्निधौ ॥१६२।। श्रुतं हि विधिनानेन भव्यात्मभिरुपासितम् । योग्यतामिह पुष्णाति परत्रापि प्रसीदति ॥१६३।। इति मौनाध्ययनवृत्तत्वम् । ततोऽधीताखिलाचारः शास्त्रादिश्रुतविस्तरः । विशुद्धाचरणोऽभ्यस्येत् तीर्थकृत्त्वस्य भावनाम् ॥१६॥ सा तु षोडशधाऽऽन्नाता महाभ्युदयसाधिनी । सम्यग्दर्शनशुद्धयादिलक्षणा प्राक्प्रपञ्चिता ।।१६५।। इति तीर्थकृद्भावना । ततोऽस्य विदिताशेषवेद्यस्य विजितात्मनः । गुरुस्थानाभ्युपगमः मतो गुर्वनुग्रहात् ।।१६६॥ ज्ञानविज्ञानसंपन्नः स्वगुरोरभिसंमतः । विनीतो धर्मशीलश्च यः सोऽर्हति गुरोः पदम् ।।१६७॥ गुरुस्थानाभ्युपगमः ।। ततः सुविहित युक्तस्य गणपोषणः । गणोपग्रहणं नाम प्रियाम्नाता महर्षिभिः ।।१६८।। जिनका आत्मा कातर है ऐसे पुरुषोंको जिनरूप ( दिगम्बररूप ) का धारण करना कठिन है इसलिए जिसमें परिग्रह त्यागकी मुख्यता है ऐसा यह जिनेन्द्रदेवका रूप धीरवीर मनुष्योंके द्वारा ही धारण किया जाता है ॥१६०|| यह चौबीसवीं जिनरूपता किया है। जिसने दीक्षा लेकर उपवास किया है और जो पारणकी विधिमें अर्थात् विधिपूर्वक आहार लेनेमें प्रवृत्त होता है ऐसे साधुका शास्त्रकी समाप्ति पर्यन्त जो मौन रहकर अध्ययन करने में प्रवृत्ति होती है उसे मौनाध्ययनवृत्तत्व कहते हैं ॥१६१॥ जिसने मौन धारण किया है, जिसका आत्मा विनय युक्त है, और मन, वचन, काय शुद्ध हैं ऐसे साधुको गुरुके समीपमें प्रारम्भसे लेकर समस्त शास्त्रोंका अध्ययन करना चाहिए ॥१६२॥ क्योंकि इस विधिसे भव्यजीवोंके द्वारा उपासना किया हुआ शास्त्र इस लोकमें उनकी योग्यता बढ़ाता है और परलोकमें प्रसन्न रखता है ।।१६३।। यह पच्चीसवीं मौनाध्ययनवृत्तित्व किया है। तदनन्तर जिसने समस्त आचार शास्त्रका अध्ययन किया है तथा अन्य शास्त्रोके अध्ययनसे जिसने समस्त श्रुतज्ञानका विस्तार प्राप्त किया है और जिसका आचरण विशुद्ध है ऐसा साधु तीर्थकर पदकी भावनाओंका अभ्यास करे ॥१६४॥ सम्यग्दर्शनकी विशुद्धि रखना आदि जिसके लक्षण हैं, जो महान् ऐश्वर्यको देनेवाली हैं तथा पहले जिनका विस्तारके साथ वर्णन किया जा चुका है ऐसी भावनाएँ सोलह मानी गयी हैं ॥१६५॥ यह छब्बीसवीं तीर्थकृद्धावना नामकी क्रिया है। ___ तदनन्तर जिसने समस्त विद्याएं जान ली हैं और जिसने अपने अन्तःकरणको वश कर लिया है ऐसे साधुका गुरुके अनुग्रहसे गुरुका स्थान स्वीकार करना शास्त्रसम्मत है ॥१६६।। जो ज्ञान विज्ञान करके सम्पन्न है, अपने गुरुको इष्ट है अर्थात् जिसे गुरु अपना पद प्रदान करना योग्य समझते हैं, जो विनयवान् और धर्मात्मा है वह साधु गुरुका पद प्राप्त करनेके योग्य है ।।१६७। यह सत्ताईसवीं गुरुस्थानाभ्युपगम क्रिया है ॥ तदनन्तर जो सदाचारका पालन करता है गण अर्थात् समस्त मुनिसंघके पोषण १ श्रुतसमाप्तिपर्यन्तम् । २ मौनी । ३ अध्ययनं कुर्यात् । लिङ् । ४ -विद्यस्य ल०, द०, ५० । ५ ज्ञान मोक्षशास्त्र । विज्ञान शिल्पशास्त्र । ६ सदाचारस्य ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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