SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 270
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आदिपुराणम् धनमेतदुपादाय स्थित्वाऽस्मिन् स्वगृहे पृथक् । गृहिधर्मस्त्वया धार्यः कृत्स्नो दानादिलक्षणः ॥ १३९॥ यथाऽस्मत्पितृदत्तेन धनेनास्माभिरर्जितम् । यशो धर्मश्च तद्वत्वं यशोधर्मानुपार्जय ॥ १४०॥ इत्येवमनुशिष्यैनं' वर्णलाभे नियोजयेत् । सदारः सोऽपि तं धर्मं तथानुष्ठातुमर्हति ॥ १४१ ॥ इति वर्णलाभक्रिया । लब्धवर्णस्य तस्येति कुलचर्याऽनुकीर्त्यते । सा विज्यादत्तिवार्तादिलक्षणा प्राक् प्रपञ्चिता ॥ १४२ ॥ विशुद्धा वृत्तिरस्यार्यषट्कर्मानुप्रवर्तनम् । गृहिणां कुलचर्येष्टा कुलधर्मोऽप्यसौ मतः ॥ १४३॥ इति कुलचर्याक्रिया । २५२ कुलचर्यामनुप्राप्तो धर्मे दाढर्थमथोद्वहन् । गृहस्थाचार्यभावेन संश्रयेत् स गृही शिनाम् ॥ १४४॥ ततो वर्णोत्तमत्वेन स्थापयेत् स्वां गृहीशिताम् । शुभवृत्ति क्रियामन्त्र विवाहैः सोत्तरक्रियैः ॥ १४५ ॥ अनन्यसदृशैरेभिः श्रुतवृत्तिक्रियादिभिः । स्वमुन्नतिं नयन्नेष तदाऽर्हति गृहीशिताम् ॥१४६॥ वर्णोत्तमो महादेवः सुश्रुतो द्विजसत्तमः । निस्तारको ग्रामयतिः मानार्हश्चेति मानितः ॥ १४७ ॥ ' इति गृहीशिता । सोऽनुरूपं ततो लब्ध्वा सूनुमात्मभरक्षमम् । तत्रारोपितगार्हस्थ्यः सन् प्रशान्तिमतः श्रयेत् ॥ ११८ ॥ कर पिता अन्य मुख्य श्रावकोंको साक्षी कर उनके सामने पुत्रको धन अर्पण करे तथा यह कहे कि यह धन लेकर तुम इस अपने घरमें पृथक् रूपसे रहो । तुम्हें दान पूजा आदि समस्त गृहस्थधर्म पालन करते रहना चाहिए। जिस प्रकार हमारे पिताके द्वारा दिये हुए धनसे मैंने यश और धर्मका अर्जन किया है उसी प्रकार तुम भी यश और धर्मका अर्जन करो। इस • प्रकार पुत्र को समझाकर पिता उसे वर्णलाभमें नियुक्त करे और सदाचारका पालन करता हुआ वह पुत्र भी पिताके धर्मका पालन करनेके लिए समर्थ होता है || १३८ - १४१ ॥ यह अठारहवीं वर्णलाभ क्रिया है । जिसे वर्णलाभ प्राप्त हो चुका है ऐसे पुत्रके लिए कुलचर्या किया कही जाती है और पूजा, दत्ति तथा आजीविका करना आदि सब जिसके लक्षण हैं ऐसी कुलचर्या क्रियाका पहले विस्तार के साथ वर्णन कर चुके हैं || १४२ ॥ निर्दोषरूपसे आजीविका करना तथा आर्य पुरुषोंके करने योग्य देवपूजा आदि छह कार्य करना यही गृहस्थोंकी कुलचर्या कहलाती है और यही उनका कुलधर्म माना जाता है || १४३|| यह उन्नीसवीं कुलचर्या किया है । तदनन्तर कुलचर्याको प्राप्त हुआ वह पुरुष धर्ममें दृढ़ताको धारण करता हुआ गृहस्थाचार्यरूपसे गृहीशिताको स्वीकार करे अर्थात् गृहस्थोंका स्वामी बने । १४४ || फिर उसे आपको उत्तम वर्ण मानकर आपमें गृहीशिता स्थापित करनी चाहिए । जो दूसरे गृहस्थों में न पायी जावे ऐसी शुभ वृत्ति, किया, मन्त्र, विवाह तथा आगे कही जानेवाली क्रियाएँ, शास्त्रज्ञान और चारित्र आदिकी क्रियाओंसे अपने-आपको उन्नत करता हुआ वह गृहीश अर्थात् गृहस्थोंके स्वामी होनेके योग्य होता है ।। १४५ - १४६ ॥ । उस समय वर्णोत्तम, महीदेव, सुश्रुत, द्विजसत्तम, निस्तारक, ग्रामपति और मानार्ह इत्यादि कहकर लोगोंको उसका सत्कार करन । चाहिए || १४७ || यह बीसवीं गृहीशिता किया है । तदनन्तर वह गृहस्थाचार्य अपना भार सँभालने में समर्थ योग्य पुत्रको पाकर उसे अपनी १ उपशिष्य । २ सदाचारः स तद्धमं ल० द० । ३ गृहस्थाचार्यरूपेण । ४ ग्रामपतिः प०, ल० ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy