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________________ २३८ आदिपुराणम् शार्दूलविक्रीडितम् इत्याविष्कृतसंपदो विजयिनस्तस्याखिलक्ष्माभृतां स्फीतामप्रतिशासनां प्रथयतः षटखण्डराज्यश्रियम् । कालोऽनल्पतरोऽप्यगात आण इव प्राक पुण्यकर्मोदया __दुद्भूतैः प्रमदावहैः षट्टतुजै गैरतिस्वादुभिः ॥२०१॥ नानारत्न निधानदेशविलसत्संपत्तिगुर्वीमिमा साम्राज्यश्रियमेकमोगनियतां कृत्वाऽखिलां पालयन् । योऽभूत्व किलाकुलः कुलवधूमेकामिवाङ्कस्थितां . सोऽयं चक्रधरोऽभुनक भुवममूमेकातपत्रां चिरम् ॥२०२॥ यन्नाम्ना भरतावनित्वमगमत् षटखण्डभूषा मही येना सेतुहिमाद्विरक्षितमिदं क्षेत्रं कृतारिक्षयम् । यस्याविनिधिरत्नसंपदुचिता लक्ष्मीरुरःशायिनी स श्रीमान् भरतेश्वरो निधिभुजामग्रेसरोऽभूत् प्रभुः ॥२०३॥ यः स्तुत्यो जगतां त्रयस्य न पुनः स्तोता स्वयं कस्यचिद् ध्येयो योगिजनस्य यश्च न तरां ध्याता स्वयं कस्यचित् । यो नन्तनपि नेतुमुन्नतिमलं नन्तव्यपः स्थितः स श्रीमान् जयताजगत्त्रयगुरुर्देवः पुरुः पावनः ॥२०४॥ है ॥१९१-२००। इस प्रकार जिसने सम्पदाएं प्रकट की हैं, जिसने समस्त राजाओंको जीत लिया है, और जो दसरेके शासनसे रहित अपने छह खण्डकी विस्तत राज्यलक्ष्मीको निरन्तर फैलाता रहता है ऐसे उस चक्रवर्ती भरतका बड़ा भारी समय पर्व पण्यकर्मके उदयसे उत्पन्न हुए, सब तरहका आनन्द देनेवाले और अत्यन्त स्वादिष्ट छहों ऋतुओंके भोगोंके द्वारा क्षणभरके समान व्यतीत हो गया था ॥२०१।। अनेकों रत्नों, निधियों और देशोंसे सुशोभित हुई सम्पत्तिके द्वारा जो भारी गौरवको प्राप्त हो रही है ऐसी इस समस्त साम्राज्यलक्ष्मीको एक अपने ही उपभोग करनेके योग्य बनाकर उसका पालन करता हुआ जो चक्रवर्ती गोदमें बैठी हुई कुलवधूकी रक्षा करते हुएके समान कभी व्याकुल नहीं हुआ वह भरत एक छत्रवाली इस पृथिवीका चिरकाल तक पालन करता रहा था ।।२०२॥ छह खण्डोंसे विभूषित पृथिवी जिसके नामसे भरतभूमि नामको प्राप्त हुई, जिसने दक्षिण समुद्रसे लेकर हिमवान् पर्वत तकके इस क्षेत्र में शत्रुओंका क्षय कर उसकी रक्षा की, तथा प्रकट हुई निधि और रत्न आदि सम्पदाओंसे योग्य लक्ष्मी जिसके वक्षःस्थलपर शयन करती थी वह प्रभु - श्रीमान् भरतेश्वर निधियों के स्वामी अर्थात् चक्रवतियोंमें प्रथम और मुख्य चक्रवर्ती हुआ था ।२०३॥ जो तीनों जगत्के जीवोंके द्वारा स्तुति करनेके योग्य हैं परन्तु जो स्वयं किसीकी स्तुति नहीं करते, बड़े-बड़े योगी लोग जिनका ध्यान करते हैं परन्तु जो किसीका ध्यान नहीं करते, जो नमस्कार करनेवालोंको भी उन्नत स्थानपर ले जानेके लिए समर्थ हैं परन्तु स्वयं नमस्कार करने योग्य पक्षमें स्थित हैं अर्थात् किसोको नमस्कार नहीं करते, वे तीनों जगत्के गुरु अत्यन्त पवित्र श्रीमान् भगवान् १ निधि । २ आत्मनः एकस्यैव भोगनियताम् । ३ पालयति स्म । ४ षट्खण्डालंकारा। ५ दक्षिणसमुद्रात् प्रारभ्य हिमवगिरिपर्यन्तम् । ६ नमनशीलान् । ७ समर्थः । ८ नमनयोग्यपक्षे । स्वयं कस्यापि नन्ता नेत्यर्थः ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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