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________________ षत्रिंशत्तमं पर्व दूषितां करकोनां फलिनीमपि ते श्रियम् । करेणापि स्पृशेद् धीमान् लतां कण्टकिनी च कः ॥९॥ विषक एकजालीव त्याज्यैषा सर्वथाऽपि नः । निष्कण्टकां तपोलक्ष्मी स्वाधीनां कर्तुमिच्छताम् ॥१९॥ मृष्यतां च तदस्माभिः कृतमागो यदीदृशम् । प्रच्युतो विनयात् सोऽहं स्वं चापलमदीदृशम् ॥१०॥ इत्युच्चरद् गिरामोधो मुखाद् बाहुबलीशितुः । ध्वनिरब्दादिवाऽऽततं "जिष्णोरालादयन्मनः ॥१०१॥ हा दुष्टं कृतमित्युच्चैरात्मानं स विगर्हयन् । अन्ववातप्त पापेन कर्मणा स्वेन चक्रराट् ॥१०२॥ प्रयुक्तानुनयं भूयो मनुमन्त्यं स धीरयन् । न्यवृतन्न स्वसंकल्पाद हो स्थैर्य मनस्विनाम् ॥१०३॥ महाबलिनि निक्षिप्तराज्यर्द्धिः स स्वनन्दने । दीक्षामुपादधे जैनी गुरोराराधयन् पदम् ॥१०॥ दीक्षावल्ल्या परिष्वक्त स्त्यकाशेषपरिच्छदः । स रेजे सलतः पत्रमोक्षक्षाम° इव द्रुमः ॥१०५॥ गुरोरनुमतेऽधीती' दधदेकविहारिताम् । प्रतिमायोगमावर्ष मातस्थे किल संवृतः ॥१०६॥ सशंसितव्रतोऽनाश्वान् वनवल्लीततान्तिकः । वल्मीकरन्ध्रनिःसर्पत् सरासीद् मयानकः ॥१०७॥ १ श्वसदाविर्भवद्भोग भुजङ्गशिशुजृम्मितैः । विषाङ्कुरैरिवोपाङ्घ्रि स रेजे वेष्टितोऽमितः ॥१०८॥ कभी नहीं चाहते ॥९७॥ यद्यपि यह तेरी लक्ष्मी फलवती है तथापि अनेक प्रकारके काँटोंसे - विपत्तियोंसे दूषित है। भला, ऐसा कौन बुद्धिमान् होगा जो काँटेवाली लताको हाथसे छुयेगा भी ॥९८॥ अब हम कण्टकरहित तपरूपी लक्ष्मीको अपने अधीन करना चाहते हैं इसलिए यह राज्यलक्ष्मी हम लोगोंके लिए विषके काँटोंकी श्रेणीके समान सर्वथा त्याज्य है ॥९९।। अतएव जो मैंने यह ऐसा अपराध किया है उसे क्षमा कर दीजिए। मैं विनयसे च्युत हो गया था अर्थात् मैंने आपकी विनय नहीं की सो इसे मैं अपनी चंचलता ही समझता हूँ ॥१००॥ जिस प्रकार मेघसे निकलती हुई गर्जना सन्तप्त मनुष्योंको आनन्दित कर देती है उसी प्रकार महाराज बाहुबलीके मुखसे निकलते हुए वाणीके समूहने चक्रवर्ती भरतके सन्तप्त मनको कुछ-कुछ आनन्दित कर दिया था ॥१०१॥ 'हा मैंने बहत ही दृष्टताका कार्य किया है। इस प्रकार जोर-जोरसे अपनी निन्दा करता हुआ चक्रवर्ती अपने पाप कर्मसे बहुत ही सन्तप्त हुआ ॥१०२।। जिसमें अनेक प्रकारके अनुनय-विनयका प्रयोग किया गया है इस रीतिसे अन्तिम कुलकर महाराज भरतको बार-बार प्रसन्न करता हुआ बाहुबली अपने संकल्पसे पीछे नहीं हटा सो ठीक ही है क्योंकि तेजस्वी पुरुषोंकी स्थिरता भी आश्चर्यजनक होती है ॥१०३॥ उसने अपने पुत्र महाबलीको राज्यलक्ष्मी सौंप दी और स्वयं गुरुदेवके चरणोंकी आराधना करते हुए जैनी दीक्षा धारण कर ली ॥१०४॥ जिसने समस्त परिग्रह छोड़ दिया है तथा जो दीक्षा रूपी लतासे आलिंगित हो रहा है ऐसा वह बाहुबली उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो पत्तोंके गिर जानेसे कृश लतायुक्त कोई वृक्ष ही हो ॥१०५॥ गुरुकी आज्ञामें रहकर शास्त्रोंका अध्ययन करनेमें कुशल तथा एक विहारीपन धारण करनेवाले जितेन्द्रिय बाहुबलीने एक वर्ष तक प्रतिमा योग धारण किया अर्थात् एक ही जगह एक ही आसनसे खड़े रहनेका नियम लिया ॥१०६॥ जिन्होंने प्रशंसनीय व्रत धारण किये हैं, जो कभी भोजन नहीं करते, और जिनके समीपका प्रदेश वनकी लताओंसे व्याप्त हो रहा है ऐसे वे बाहुबली वामीके छिद्रोंसे निकलते हुए सोसे बहुत ही भयानक हो रहे थे ॥१०७॥ जिनके फणा प्रकट हो रहे हैं ऐसे फुकारते हुए सर्पके बच्चोंकी उछल-कूदसे चारों ओरसे घिरे हुए वे बाहुबली ऐसे सुशोभित १ क्षम्यताम् । २ अपराधः । ३ भृशमपश्यम् । ४ प्रवाहः । ५ भरतस्य । ६ दुष्ठु ट० । निन्दा । 'निन्दायों दुष्ठु सुष्ठ प्रशंसने ।' इत्यभिधानात् । ७ निजवैराग्यादित्यर्थः। ८ आलिङ्गितः । ९ लतया सहितः । १० पर्णमोचनकृशः । ११ अधीतवान् । १२ वर्षावधि । १३ निभृतः । १४ स्तुत ।१५ उपवासी। १६ भयंकरः । १७.उच्छ्व सत् । १८ फण । १९ अङिघ्रसमीपे । २७
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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