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________________ २०८ आदिपुराणम् अङ्गसादं' मतिभ्रषं वाचामस्फुटतामपि । जरा सुरा च निर्विष्टा घटयत्याशु देहिनाम् ॥८७॥ कालव्यालगजेनेदमायुरालानकं बलात् । चाल्यते यदलाधानं जीवितालम्बनं नृणाम् ॥८॥ शरीरबलमेतच्च गजकर्णवदस्थिरम् । रोगा खूपहतं चेदं जरदेहकुटीरकम् ॥८९॥ इत्यशाश्वतमप्येतद् राज्यादि भरतेश्वरः । शाश्वतं मन्यते कष्टं मोहोपहतचेतनः ॥१०॥ चिरमाकलयन्नेवमग्रजस्यानुदात्तताम् । ब्याजहारैनमुद्दिश्य गिरः प्रपरुषाक्षराः ॥११॥ शृणु भो नृपशार्दूल क्षणं बैलक्ष्यमुत्सृज । मुह्यतेदं त्वयाऽलम्बि दुरीहमतिसाहसम् ॥१२॥ अभेद्य मम देहादौ त्वया चक्रं नियोजितम् । विद्धयकिंचित्करं वाजे शैले वज्रमिवापतत् ॥१३॥ अन्यत्र भ्रातृमाण्डानि मङ्क्त्वा राज्यं यदीप्सितम् । त्वया धर्मो यशश्चैव तेन ''पेशलमर्जितम् ॥९॥ चक्रभृद्धरतः स्रष्टुः सूनुराद्यस्य योऽग्रणीः । कुलस्योद्धारकः सोऽभूदिती डाऽस्थायि च त्वया ॥१५॥ जितां च भवतैवाद्य यत्पापोपहतामिमाम् । मन्यसेऽनन्यभोगीनां नृपश्रियमनश्वरीम् ॥१६॥ प्रेयसीयं तवैवास्तु राज्यश्रीर्या त्वयाऽहता । नोक्सैिषा ममायुष्मन् बन्धो न हि सतां मुदे ॥१७॥ पटक देता है उसी प्रकार बुढ़ापा भी जबरदस्ती जमीनपर पटक देता है और जिस प्रकार शीतज्वर शरीरमें कम्पन पैदा कर देता है उसी प्रकार बुढ़ापा भी शरीरमें कम्पन पैदा कर देता है ॥८६॥ शरीरमें प्रविष्ट हुई तथा उपभोममें आयी हुई जरा और मदिरा दोनों ही लोगोंके शरीरको शिथिल कर देती हैं, उनकी बुद्धि भ्रष्ट कर देती हैं और वचनोंमें अस्पष्टता ला देती हैं ॥८७॥ जिसके बलका सहारा मनुष्योंके जोक्नका आलम्बन है ऐसा यह आयुरूपी खम्भा कालरूपी दुष्ट हाथीके द्वारा जबरदस्ती उखाड़ दिया जाता है ।।८८॥ यह शरीरका बल हाथीके कानके समान चंचल है और यह जीर्ण-शीर्ण शरीररूपी झोंपड़ा रोगरूपी चूहोंके द्वारा नष्ट किया हुआ है ।।८९।। इस प्रकार यह राज्यादि सब बिनश्वर हैं फिर भी मोहके उदयसे जिसकी चेतना नष्ट हो गयी है ऐसा भरत इन्हें नित्य मानता है यह कितने दुःखकी बात है ? ॥९०॥ इस प्रकार बड़े भाईको नीचताका चिरकाल तक विचार करते हुए बाहुबलीने भरतको उद्देश्य कर नीचे लिखे अनुसार कठोर अक्षरोंवाली वाणी कही ॥९१॥ हे राजाओंमें श्रेष्ठ, क्षण-भरके लिए अपनी लज्जा या झेंप छोड़, मैं कहता हूँ सो सुन । तूने मोहित होकर ही इस न करने योग्य बड़े भारी साहसका सहारा लिया है ॥९२॥ जो कभी भिद नहीं सकता। ऐसे मेरे शरीररूपी पर्वतपर तूने चक्र चलाया है सो तेरा यह चक्र वज्रके बने हुए पर्वतपर पड़ते हुए वज्रके समान व्यर्थ है ऐसा निश्चयसे समझ ॥९॥ दूसरी बात यह है कि जो तूने भाईरूप बरतनोंको तोड़कर राज्य प्राप्त करना चाहा है सो उससे तूने बहुत हो अच्छा धर्म और यशका उपार्जन किया है ॥९४॥ तूने अपनी यह स्तुति भी स्थापित कर दी कि चक्रवर्ती भरत आदिब्रह्मा भगवान् वृषभदेवका ज्येष्ठ पुत्र था तथा वह अपने कुलका उद्धारक हुआ था ॥९५॥ हे भरत, आज तूने जिसे जीता है और जो पापसे भरी हुई है ऐसी इस राज्यलक्ष्मीको तू एक अपने ही द्वारा उपभोग करने योग्य तथा अविनाशी समझता है ।।९६।। जिसका तूने आदर किया है ऐसी यह राज्यलक्ष्मी अब तुझे ही प्रिय रहे, हे आयुष्मन्, अब यह मेरे योग्य नहीं है क्योंकि बन्धन सज्जन पुरुषोंके आनन्दके लिए नहीं होता है । भावार्थ - यह लक्ष्मी स्वयं एक प्रकारका बन्धन है अथवा कर्म बन्धका कारण है इसलिए सज्जन पुरुष इसे १ श्रमम् । २ भ्रंशम् । ३ अनुभुक्ता । ४ मूषिक । ५ जीर्ण । ६ निकृष्टताम् । ७ विस्मयान्वितत्वम् । ८ मुह्य तीति मुह्यन् तेन । ९ न किंचिकृत । किमपि कर्तुमसमर्थ इत्यर्थः । १० राज्याभिलाषेण । ११ प्रशस्तम् । । १२ स्तुति । १३ यस्मात् कारणात् । १४ अनन्यभोगायिताम् । १५ कधकारणपरिग्रहः ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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