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________________ १७६ आदिपुराणम् नृपोपा यनवाजीमलालामदजलाविलम् । कृतच्छटमिवालोक्य सोऽभ्यनन्दन्नपाङ्गणम् ॥४३॥ स. निवेदितवृत्तान्तो महादौवारपालकैः । नृपं नृपासनासीनमुपासी दद् वचोहरः ॥४४॥ पृथुवक्षस्त टं तुङ्गमुकुटोदग्रशृङ्गकम् । जयलक्ष्मीविलासिन्याः क्रीडाशैलमिवैककम् ॥४५॥ ललाटपट्टमारूढपट्टबन्धं सुविस्तृतम् । जयश्रिय इवोद्वाहपर्ट दधतमुच्चकैः ॥४६॥ दधानं तुलिताशेषराजन्यकयशोधनम् । तुलादण्डमिवोदृढभूभारं भुजदण्डकम् ॥४॥ मुखेन पङ्कजच्छायां नेत्राभ्यामुत्पलश्रियम् । दधानमप्यना सन्नविजातिमजलाशयम् ॥४८॥ बिभ्राणमतिविस्तीर्ण मनो वक्षश्च यद्वयम् । वाग्देवीकमलावत्योर्गतं नित्यावकाशताम् ॥४९॥ रक्षावृत्तिपरिक्षेपं गुणग्राम महाफलम् । निवेशयन्तमात्माङ्गे मनःसु च महीयसाम् ॥५०॥ स्फुरदाभरणोद्योतच्छद्मना निखिला दिशः । प्रतापज्वलनेनेव लिम्पन्तमलघीयसा ॥५१॥ मुखेन चन्द्रकान्तेन पद्मरागेण चारुणा । चरणेन विराजन्तं वज्रसारण' वर्मणा ॥५२॥ उल्लंघन कर बाजारके मार्गों को देखता हुआ वह दूत वहाँ इकट्ठी की हुई रत्नोंकी राशियोंको निधियोंके समान मानने लगा ॥४२॥ जो राजाकी भेंटमें आये हुए घोड़े और हाथियोंकी लार तथा मदजलसे कीचड़सहित हो रहा था और उससे ऐसा मालूम होता था मानो उसपर जल ही छींटा गया हो ऐसे राजाके आँगनको देखकर वह दूत बहुत ही प्रसन्न हो रहा था ।।४३।। जिसने मुख्य-मुख्य द्वारपालोंके द्वारा अपना वृत्तान्त कहला भेजा है ऐसा वह दूत राजसिंहासनपर बैठे हुए महाराज बाहुबलीके समीप जा पहुँचा ॥४४।। वहाँ जाकर उसने महाराज बाहुबलीको देखा. उनका वक्षःस्थल किनारेके समान चौड़ा था, वे स्वयं ऊँचे थे और उनका मकूट शिखरके समान उन्नत था इसलिए वे विजयलक्ष्मीरूपी स्त्रीके क्रीड़ा करनेके लिए एक अद्वितीय पर्वतके समान जान पड़ते थे-जिसपर यह बंधा हआ है ऐसे लम्बे-चौड़े ललाटपट्टको धारण करते हए वे ऐसे जान पड़ते थे मानो विजयलक्ष्मीका उत्कृष्ट विवाहपट ही धारण कर रहे हों। वे बाहुबली स्वामी, जिसने समस्त राजाओंका यशरूपी धन तोल लिया है और जिसने समस्त पृथिवीका भार उठा रखा है ऐसे तराजूके दण्डके समान भुजदण्डको धारण कर रहे थे-यद्यपि वे मुखसे कमलकी और नेत्रोंसे उत्पलकी शोभा धारण कर रहे थे तथापि उनके सपीप न तो विजाति अर्थात् पक्षियोंकी जातियाँ थीं और न वे स्वयं जलाशय अर्थात् सरोवर ही थे। भावार्थ-इस श्लोकमें विरोधाभास अलंकार है इसलिए विरोधका परिहार इस प्रकार करना चाहिए कि वे यद्यपि मुख और नेत्रोंसे कमल तथा उत्पलकी शोभा धारण करते थे तथापि उनके पास विजाति अर्थात् वर्णसंकर लोगोंका निवास नहीं था और न वे स्वयं जलाशय अर्थात् जड़ आशयवाले मूर्ख ही थे। वे बाहुबली जिनपर क्रमसे सरस्वती देवी और लक्ष्मीदेवीका निरन्तर निवास रहता था ऐसे अत्यन्त विस्तृत ( उदार और लम्बे चौड़े ) मन और वक्षःस्थलको धारण कर रहे थे-वे, प्रजाकी रक्षाके कारण तथा बड़े-बड़े फल देनेवाले गुणोंके समूहको अपने शरीरमें धारण कर रहे थे और अन्य महापुरुषोंके मनमें धारण कराते थे-वे अपने देदीप्यमान आभूषणोंको कान्तिके छलसे ऐसे जान पड़ते थे मानो अपने विशाल प्रतापरूपी अग्निसे समस्त दिशाओंको लिप्त ही कर रहे हों। वे चन्द्रकान्त मणिके समान मुखसे, पद्मराग मणिके समान सुन्दर चरणोंसे और वज्रके समान सुदृढ़ अपने १.परनृपः प्राभृतीकृत। २ कर्दमितम् । ३ उपागमत् । ४ सानुम् । ५ अनासनहीनजातिम् । पक्ष पक्षिजातिम् । ६ अमन्दबुद्धिम् । ७ सरस्वतीलक्ष्म्योः । ८ गुणसमूहम् । निगम ( गांव ) मिति ध्वनिः । ९ चन्द्रवत् कान्तेन । १० चन्द्रकान्तशिलयेति ध्वनिः । ११ पद्मवदरुणेन । पद्मरागरत्नेनेति ध्वनिः ११ वववत् स्थिरावयवेन । बज्रान्तःसारेणेति ध्वनिः ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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