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________________ १४६ आदिपुराणम् सालत्रितयमुत्तङ्गचतुर्गोपुरमण्डितम् । मङ्गलद्रव्यसंदोहो निधयस्तोरणानि च ॥१६॥ नाट्यशालाद्वयं दीप्तं लसद्धपघटीद्वयम् । वनराजिपरिक्षेपश्चैत्यद्रुमपरिष्कृतः ॥१६२॥ वनवेदीद्वयं प्रोच्चैर्ध्वजमालाततावनिः । कल्पद्रुमवनाम.गाः स्तूपहावलीत्यपि ॥१३॥ सदोऽवनि रियं देव नृसुरासुरपावनी । त्रिजगत्सारसंदोह इवैकत्र निवेशितः ॥१६॥ बहिर्विभूतिरित्युच्चैराविकृतमहोदयाः । लक्ष्मीमाध्यात्मिकी व्यक्तं व्यनकि जिन तावकीम् ॥१६५॥ सभापरिच्छदः सोऽयं सुरैस्तव विनिर्मितः । वैराग्यातिशयं नाथ नोपहन्त्य प्रतर्कितः ॥१६६॥ इत्यद्भतमाहात्म्यास्त्रिजगदल्लभो भवान् । । स्तुत्योपतिष्टमानं मां पुनीतात्पूतशासनः ॥१६॥ अलं स्तुतिप्रपञ्चेन तवाचिन्त्यतमा गुणाः । जयेशान नमस्तुभ्यमिति संक्षेपतः स्तुवे ॥१६॥ जयेश जय निर्दग्धकर्मेन्धनजयाजर । जय लोकगुरो सार्व जयताजय जित्वरं ॥१६९॥ जय लक्ष्मीपते जिष्णो जयानन्तगुणोज्ज्वल । जय विश्वजगद्वन्धो जय विश्वजगद्धित ॥१७॥ जयाखिलजगद्वेदिन् जयाखिलसुखोदय । जयाखिलजगज्ज्येष्ठ जयाखिलजगद्गुरो ॥१७१॥ , जय निर्जितमोहारे जय तर्जितमन्मथ । जय जन्मजरातङ्कविजयिन् विजितान्तक ॥१७॥ वनोंका समूह - ऊँचे-ऊँचे चार गोपुर दरवाजोंसे सुशोभित तीन कोट, मंगल द्रव्योंका समूह, निधियाँ, तोरण - दो-दो नाट्यशालाएं, दो-दो सुन्दर धूप घट, चैत्यवृक्षोंसे सुशोभित वन पंक्तियोंकी परिधि - दो वनवेदो, ऊँची-ऊँची ध्वजाओंकी पंक्तिसे भरी हुई पृथिवी, कल्पवृक्षोंके वनका विस्तार, स्तूप और मकानोंकी पंक्ति - इस प्रकार मनुष्य देव और धरणेन्द्रोंको पवित्र करनेवाली आपकी यह सभाभूमि ऐसी जान पड़ती है मानो तीनों जगत्की अच्छीअच्छी वस्तुओंका समूह ही एक जगह इकट्ठा किया गया हो ॥१६०-१६४॥ हे जिनेन्द्र, जिससे आपका महान् अभ्युदय या ऐश्वर्य प्रकट हो रहा है ऐसी यह आपकी अतिशय उत्कृष्ट बाह्य विभूति आपकी अन्तरंग लक्ष्मीको स्पष्ट रूपसे प्रकट कर रही है ॥१६५।। हे नाथ, जिसके विषयमें कोई तर्क-वितर्क नहीं कर सकता ऐसी यह देवोंके द्वारा रची हुई आपके सभवसरणको विभूति आपके वैराग्यके अतिशयको नष्ट नहीं कर सकती है। भावार्थ - समवसरण सभाको अनुपम विभूति देखकर आपके हृदयमें कुछ भी रागभाव उत्पन्न नहीं होता है ॥१६६॥ इस प्रकार जिनकी अद्भुत महिमा है, जो तीनों लोकोंके स्वामी हैं, और जिनका शासन अतिशय पवित्र है ऐसे आप स्तुतिके द्वारा उपस्थान ( पूजा ) करनेवाले मुझे पवित्र कीजिए ॥१६७॥ हे भगवन्, आपकी स्तुतिका प्रपंच करना व्यर्थ है क्योंकि आपके गुण अत्यन्त अचिन्त्य हैं इसलिए मैं संक्षेपसे इतनी ही स्तुति करता हूँ कि हे ईशान, आपको जय हो और आपको नमस्कार हो ॥१६८॥ हे ईश, आपकी जय हो, हे कर्मरूप इधनको जलानेवाले, आपकी जय हो, हे जरारहित, आपको जय हो, हे लोकोंके गुरु, आपकी जय हो, हे सबका हित करनेवाले, आपकी जय हो, और हे जयशील, आपकी जय हो ॥१६९।। हे अनन्तचतुष्टयरूप लक्ष्मीके स्वामी जयनशील, आपकी जय हो। हे अनन्तगुणोंसे उज्ज्वल, आपकी जय हो । हे समस्त जगत्के बन्धु, आपकी जय हो । हे समस्त जगत्का हित करनेवाले, आपकी जय हो ॥१७०॥ हे समस्त जगत्को जाननेवाले, आपकी जय हो। हे समस्त सुखोंको प्राप्त करनेवाले, आपकी जय हो। हे समस्त जगत्में श्रेष्ठ, आपकी जय हो। हे समस्त जगत्के गुरु, आपकी जय हो ॥१७१।। हे मोहरूपी शत्रुको जीतनेवाले, आपकी जय हो। हे कामदेवको भर्त्सना करने १ अलंकृतः 'परिष्कारो विभूषणम्' इत्यभिधानात् । २ नवाभोगः द०, इ०, । ३ समवसरणभूमिः । ४ न नाशयति । ५ ऊहातीतः ऊहितुमशक्य इत्यर्थः । ६ स्तोत्रेणार्चयनम् । ७ पवित्रं कुरु । ८ जयशील ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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