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________________ त्रयस्त्रिंशत्तमं पर्व दिव्यभाषा तवाशेवभाषा भेदानुकारिणी । निरस्यति मनोध्वान्तमत्राचामपि देहिनाम् ॥ १४८ ॥ प्रतिहार्यमयी भूतिरियमष्टतयी प्रभो । महिमानं तयाचष्टे विसष्टं विष्टपातिगम् ॥ १४६ ॥ त्रिमेखलस्य पीठस्य मेरोवि गरीयसः । चूलिकेव विभात्युच्चैः सेव्या गन्धकुटी तव ॥ १५०॥ वन्दारुणां मुनीन्द्राणां स्तोत्रप्रतिरवैर्मुहुः । स्तोतुकामेव भक्त्या त्वां सैषा भात्यतिसंमदात् ॥ १५१ ॥ परार्थ्यरत्ननिर्माणामेनामत्यन्तमास्त्रराम् । स्वामध्यासीनमानम्रा नाकभाजो भजन्त्यमी ॥ १५२॥ शिखामणोऽमीषां नम्राणां भान्ति मौलयः । सदीपा इव रत्नार्घाः स्थापितास्त्वत्पदान्तिके ॥ १५३ ॥ नतानां सुरकोटीनां चकासत्यधिमस्तकम् । प्रसादांशां इवालग्ना युष्मत्पादनखांशवः ॥ १५४ ॥ नखदर्पण संक्रान्तविम्वान्यमरयोषिताम् । दधत्यमूनि वक्त्राणि त्वदुपाङ्ङ्घयम्बुजश्रियम् ॥ १५५॥ वक्त्रेध्वमरनारोणां संधत्ते कुङ्कुमश्रियम् । युष्मत्पादतलच्छाया प्रसरती जयाऽरुणा ॥ १५६॥ Toursषित भूभागमध्यवर्ती त्रिमेखलः । पीठाद्वियमाभाति तत्राविष्कृतमङ्गलः ॥ १५७ ॥ प्रथमोsस्य परिक्षेपो धर्मचक्ररलंकृतः । द्वितीयोऽपि तवामीभिर्दिक्ष्वष्टासु महाध्वजैः ॥ १५८ ॥ श्री मण्डपनिवेशस्ते योजनप्रमितोऽप्ययम् । त्रिजगज्जनताऽजस्त्रप्रावेशोपग्रहक्षमः ॥ १५९ ॥ धूली सालपरिक्षेपो मानस्तम्भाः सरांसि च । खातिका सलिलापूर्णा वल्लीवनपरिच्छदः ॥ १६० ॥ आपके भामण्डलकी प्रभा सभाके चारों ओर फैल रही है || १४७ ।। समस्त भाषाओंके भेदोंका अनुकरण करनेवाली अर्थात् समस्त भाषाओं रूप परिणत होनेवाली आपकी यह दिव्य ध्वनि जो वचन नहीं बोल सकते ऐसे पशु पक्षी आदि तिर्यंचोंके भी हृदयके अन्धकारको दूर कर देती है ॥ १४८ ॥ हे प्रभो, आपकी यह प्रातिहार्यरूप आठ प्रकारकी विभूति आपकी लोकोत्तर महिमाको स्पष्ट रूपसे प्रकट कर रही है || १४९ ।। मेरु पर्वत के समान ऊँचे तीन कटनीदार पीठ पर सबके द्वारा सेवन करने योग्य आपकी यह ऊँची गन्धकुटी मेरुकी चूलिकाके समान सुशोभित हो रही है ।। १५० ।। वन्दना करनेवाले उत्तम मुनियोंके स्तोत्रोंकी प्रतिध्वनिसे यह गन्धकुटी ऐसी जान पड़ती है मानो भक्तिवश हर्षसे आपकी स्तुति ही करना चाहती हो ॥ १५१ ॥ हे प्रभो, जो श्रेष्ठ रत्नोंसे बनी हुई और अतिशय देदीप्यमान इस गन्धकुटीमें विराजमान हैं। ऐसे आपकी, स्वर्ग में रहनेवाले देव नम्र होकर सेवा कर रहे हैं ।। १५२ ।। हे देव, जो अग्रभागमें लगे हुए मणियों सहित हैं ऐसे इन नमस्कार करते हुए देवोंके मुकुट ऐसे जान पड़ते हैं मानो आपके चरणोंके समीप दीपकसहित रत्नोंके अर्घ ही स्थापित किये गये हों ॥। १५३ ॥ नमस्कार करते हुए करोड़ों देवोंके मस्तकोंपर जो आपके चरणोंके नखोंकी किरणें पड़ रही हैं वे ऐसी सुशोभित हो रही हैं मानो उनपर प्रसन्नताके अंश ही लग रहे हों ।। १५४ || आपके नखरूपी दर्पण में जिनका प्रतिबिम्ब पड़ रहा है ऐसे ये देवांगनाओंके मुख आपके चरणों के समीपमें कमलोंकी शोभा धारण कर रहे हैं ॥१५५॥ जवाके फूलके समान लाल वर्ण जो यह आपके पैरों के तलवोंकी कान्ति फैल रही है वह देवांगनाओंके मुखोंपर कुंकुमकी शोभा धारण कर रही है ।। १५६ ।। जो बारह सभाओंसे भरी हुई पृथिवीके मध्यभागमें वर्तमान है और जिसपर अनेक मंगल द्रव्य प्रकट हो रहे हैं ऐसा यह तीन कटनीदार आपका पीठरूपी पर्वत बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहा है ।। १५७।। इस पीठकी पहली परिधि धर्मचक्रोंसे अलंकृत है और दूसरी परिधि भी आठों दिशाओं में फहराती हुई आपकी इन बड़ी-बड़ी ध्वजाओंसे सुशोभित है ।। १५८ ।। यद्यपि आपके श्रीमण्डपकी रचना एक ही योजन लम्बी-चौड़ी है तथापि वह तीनों जगत् के जनसमूह के निरन्तर प्रवेश कराते रहने रूप उपकारमें समर्थ है ।। १५९ ।। हे प्रभो, यह धूलीसालकी परिधि, ये मानस्तम्भ, सरोवर, स्वच्छ जलसे भरी हुई परिखा, लता१ तिरश्चाम् । २ तव पादसमीपे । ३ द्वादशगणस्थित | ४ उपकारदक्षः । त्रिजगज्जनानां स्थानदाने समर्थ इत्यर्थः । १९ १४५
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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