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________________ १३७ शतपर्व ४ मन्दारकुसुमोद्गन्धिरान्दोलितलतावनः । पवनस्तमभीयाय प्रत्युद्यन्निव पावनः ॥ ६८ ॥ सुमनोवृष्टिरापतदापूरितनभोङ्गणा । विरजीकृत भूलोकैः समं शीतैरपां कणैः ॥ ६९ ॥ शुश्रुवे ध्वनिरामन्द्रो दुन्दुभीनां नमोऽङ्गणे । श्रुतः केकिमिरुग्रीवैर्धनस्तनितशङ्किमिः ॥७०॥ गुल्फदन प्रसूनौघसंमर्दमृदुना पथा" । तमद्विशेषमश्रान्तः प्रययौ स नृपाग्रणीः ॥७१॥ aaisa तं शैलमपश्यत् सोऽस्य मूर्धनि । प्रागुक्तवर्णनोपेतं जैनमास्थानमण्डलम् ॥७२॥ समेत्य वसरावेक्षास्तिष्ठन्त्यस्मिन् सुरासुराः । इति तज्ज्ञैर्निरुकं तत्सरणं समवादिकम् ॥७३॥ आखण्डलधनुर्लेखामखण्डपरिमण्डलाम् । जनयन्तं निजोद्योतैर्धूली सालमथासदत् ॥७४॥ हेमस्तम्माग्रविन्यस्तरत्त्रतोरणभासुरम् । धूली सालमतीत्यासौ मानस्तम्भमपूजयत् ॥ ७५ ॥ मानस्तम्भस्य पर्यन्ते सरसीः ससरोरुहाः । जैनीस्वि श्रुती: स्वच्छशीतलापो' 3 ददर्श सः ॥७६॥ धूली सालपरिक्षेपस्यान्तर्भागे समन्ततः । वीथ्यन्तरेषु सोऽपश्यद् देवावासोचिता भुवः ॥७७॥ अतीत्य परतः किंचिद् ददर्श जलखातिकाम् । सुप्रसन्नामगाधां च मनोवृत्तिं सतामिव ॥ ७८ ॥ वल्लीवनं ततोऽद्राक्षी नानापुष्पलताततम् । पुष्पासवरसामत्तभ्रममरसंकुलम् ॥७९॥ लिया था कि त्रिलोकीनाथ जिनेन्द्रदेव समीप ही विराजमान हैं ॥ ६७ ॥ मन्दार वृक्षोंके फूलोंसे सुगन्धित और लताओंके वनको कम्पित करनेवाला वायु उनके सामने इस प्रकार आया था मानो उनकी अगवानी ही कर रहा हो ||६८ || जिन्होंने पृथ्वीको धूलिरहित कर दिया है ऐसी जलकी शीतल बूँदोंके साथ-साथ आकाशरूपी आँगनको भरती हुई फूलों की वर्षा पड़ रही थी || ६९ || जिन्हें मेघोंकी गर्जना समझनेवाले मयूर, अपनी गरदन ऊँची कर सुन रहे हैं। ऐसे आकाशरूपी आँगन में होनेवाले दुन्दुभि बाजोंके गम्भीर शब्द भी महाराज भरतने सुने थे ॥७०॥ राजाओंमें श्रेष्ठ महाराज भरत, पैरकी गाँठों तक ऊँचे फैले हुए फूलोंके सम्मर्दसे जो अत्यन्त कोमल हो गया है ऐसे मार्गके द्वारा बिना किसी परिश्रमके बाकी बचे हुए उस पर्वतपर चढ़ गये थे ।।७१।। तदनन्तर उस पर्वतपर चढ़कर भरतने उसके मस्तकपर पहले कही हुई रचना सहित जिनेन्द्रदेवका समवसरण मण्डल देखा || ७२ || इसमें समस्त सुर और असुर आकर दिव्य ध्वनिके अवसरकी प्रतीक्षा करते हुए बैठते हैं इसलिए जानकार गणधरादि देवोंने इसका समवसरण ऐसा सार्थक नाम कहा है ॥७३॥ अथानन्तर - महाराज भरत, जो अपने प्रकाशसे अखण्ड मण्डलवाले इन्द्रधनुषकी रेखाको प्रकट कर रहा है ऐसे धूलिसालके समीप जा पहुँचे ||७४ || सुवर्णके खम्भोंके अग्रभागपर लगे हुए रत्नोंके तोरणोंसे जो अत्यन्त देदीप्यमान हो रहा है ऐसे धूलिसालको उल्लंघन कर उन्होंने मानस्तम्भकी पूजा की ॥ ७५ ॥ जिनमें स्वच्छ और शीतल जल भरा हुआ है और कमल फूल रहे हैं ऐसी जिनेन्द्र भगवान्‌की वाणीके समान - मानस्तम्भके चारों ओरकी बावड़ियाँ भी महाराज भरत ने देखीं ॥७६॥ धूलिसालकी परिधिके भीतर चारों ओरसे गलियोंके बीचबीचमें उन्होंने देवोंके निवास करने योग्य पृथ्वी भी देखी ॥ ७७ ॥ कुछ और आगे चलकर उन्होंने जलसे भरी हुई परिखा देखी। वह परिखा सज्जन पुरुषोंके चित्तकी वृत्तिके समान स्वच्छ और गम्भीर थी ॥७८॥ तदनन्तर जो अनेक प्रकारके फूलोंकी लताओंसे व्यस्प्त हो रहा है और जो फूलों के आसवरूपी रससे मत्त होकर फिरते हुए भ्रमरोंसे व्याप्त है ऐसा लता । ४ घुण्टिकप्रमाण | 'तद्ग्रन्थी घुण्टिके गुल्फी' -१ अभिमुखं जगाम । २ जलानाम् । ३ भरतेन श्रूयते स्म इत्यभिधानात् । ५ मार्गेण । ६ श्रमरहितः । ७ कैलासस्य । ८ समागत्य । ९ प्रभोरवसरमालोकयन्तः । १० समवसरणम् । ११ आगमत् । १२ पर्यन्तसरसी ल० । १३ शैत्यजलाः, पक्षे शान्तिजलाः । १४ देवप्रासादभूमीः । १८
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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