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________________ द्वात्रिंशत्तमं पर्व इति दृष्टापदानं तं तुष्टुवुर्नाकिनायकाः । दिष्ट्या स्म वर्धयन्त्येनं साङ्गनाश्व नभश्चराः ॥१६२॥ भूयः प्रोत्साहितो देवैर्जयोद्योगमनूनयन् । गङ्गापातमभीयाय व्याहृत इव तत्स्वनैः ॥१६३॥ गलद्गङ्गाम्बुनिष्टयताः शीकरा मदशीकरः । समूच्र्छर्नृपेभाणां व्यात्युक्षी वा तितांसवः ॥१६॥ पतद्गङ्गाजलावर्न परिवर्द्धितकौतुकः । प्रत्याग्राहि स तत्पात गङ्गादेव्या कृतार्धया ॥१६५॥ सिंहासने निवेश्यनं प्रारखं सुखशीतलैः । सोऽभ्यषिञ्चजलैङ्गैिः शशाङ्ककरहासिभिः ॥१६६॥ कृतमङ्गलसङ्गीतनान्दीतूर्यरवाकुलम् । निर्वयं मजनं जिष्णुभैजे मण्डनमप्यतः ॥१६७॥ अथास्मै व्यत रत् प्रांशु रत्नांशुस्थगिताम्बरम् । सेन्द्रचापमिवादीन्द्र शिखरं हरिविष्टरम् ॥१६८॥ चिरं वर्चस्व वद्धिष्णो जीवतानन्दताद भवान् । इत्यनन्तरमाशास्य तिरोऽभूत् सा विसर्जिता ॥१६॥ अनुगङ्गातट सैन्यैराबजन्विषयाधिपः । सिषेवे पवमानश्च गङ्गाग्बुकणवाहिभिः ॥१७॥ गङ्गातटवनोपान्तनिवेशेषु विशाम्पतिम् । सुखयामासरन्वीपमायाता' वनमारुताः॥१७१॥ उसे लीलामात्रमें ही उल्लंघन कर दिया है और इसकी कीर्ति स्थल-कमलिनीके समान हिमालय पर्वतकी शिखरपर आरूढ़ हो गयी है। इस प्रकार जिनका पराक्रम देख लिया गया है ऐसे उन भरत महाराजको बड़े-बड़े देव भी स्तुति कर रहे थे और अपनी-अपनी स्त्रियोंसे सहित विद्याधर लोग भी भाग्यसे उन्हें बढ़ा रहे थे अर्थात् आशीर्वाद दे रहे थे ॥१६०-१६२॥ तदनन्तर-जिन्हें देवोंने फिर भी उत्साहित किया है ऐसे महाराज भरतने अपने विजयके उद्योगको कम न करते हुए गंगापात ( जहाँ हिमवान् पर्वतसे गंगा नदी पड़ती है उसे गंगापात कहते हैं ) के सम्मुख इस प्रकार गये मानो उसके शब्दोंके द्वारा बुलाये ही गये हों ॥१६३।। ऊपरसे गिरती हुई गंगा नदीके जलके समीपसे उछटे हुए छोटे-छोटे जलकण राजाओंके हाथियोंके मदकी बूंदोंके साथ इस प्रकार मिल रहे थे मानो वे दोनों परस्पर फाग ही खेलना चाहते हों अर्थात् एक दूसरेको सींचना ही चाहते हों ।।१६४॥ पड़ते हुए गंगाजलकी भंवरोंसे जिसका कौतूहल बढ़ रहा है ऐसे भरतका गंगापातके स्थानपर अर्घ धारण करनेवाली गंगादेवीने सामने आकर सत्कार किया ॥१६५।। गंगादेवीने चक्रवर्ती भरतको पूर्व दिशाकी ओर मुख कर सिंहासनपर बैठाया और फिर सुखकारी, शीतल तथा चन्द्रमाकी किरणोंकी हँसी करनेवाले गंगा नदीके जलसे उनका अभिषेक किया ॥१६६॥ जिसमें मंगल संगीत, आशीर्वाद वचन और तुरही आदि बाजोंके शब्द मिले हुए हैं ऐसे अभिषेकको समाप्त कर विजयशील भरतने उसो गंगादेवीसे सब वस्त्राभूषण भी प्राप्त किये ॥१६७॥ तदनन्तर देदीप्यमान रत्नोंकी किरणोंसे जिसने आकाश भी व्याप्त कर लिया है और जो इन्द्रधनुषसहित सुमेरु पर्वतके शिखरके समान जान पड़ता है ऐसा एक सिंहासन गंगादेवीने भरतके लिए समर्पित किया ॥१६८। और फिर 'सदा बढ़नेवाले हे महाराज भरत, आप चिर काल तक बढ़ते रहिए, चिरकाल तक जीवित रहिए और चिरकाल तक आनन्दित रहिए अथवा समृद्धिमान् रहिए इस प्रकार आशीर्वाद देकर महाराज भरतके द्वारा बिदा हो वह गंगादेवो तिरोहित हो गयी ॥१६९।। अथानन्तर-सेनाके साथ-साथ गंगाके किनारे-किनारे जाते हए भरतकी अनेक देशोंके स्वामी-राजाओंने और गंगा नदीके जलकी बूंदोंको धारण करनेवाले वायुने सेवा की थी ॥१७०।। गंगा किनारेके वनोंके समीपवर्ती भागोंमें पीछेसे आता हुआ वनका वायु चक्रवर्ती १ दृष्टसामर्थ्यम् । दृष्टावदानं प०, अ० । दृष्टावदानं ल०। २ सन्तोषेण । ३ अनूनं कुर्वन् संवर्द्धयन्नित्यर्थः । ४ अभिमुखमगच्छत् । ५ प्रसरन्ति स्म । ६ नृपसंबन्धिगजानाम् । ७ परस्परसेचनम् । ८ विस्तारितुमिच्छवः । ९ ददौ । १० उचत । ११ अनुकूलताम् । १२ वनवायवः ल० ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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