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________________ पञ्चविंशतितमं पर्व ६३१ मेरुशृङ्गसमुत्तुङ्गसिंहविष्टरनायकः । सच्छायसफलाशोकप्रकटीकृतचेष्टितः ॥२३६॥ धूलिसालवृतास्थानजगतीपरिमण्डलः । मानस्तम्भनिरुद्धान्यकुदृष्टिमदविभ्रमः ॥२३७॥ स्वच्छाम्मःखातिकाभ्यर्ण व्रततीवनवेष्टिताम् । सभाभूमिमलं कुर्वन्नपूर्वविमवोदयाम् ॥२३८॥ समग्रगोपुरोदग्रैः प्राकारवलयस्त्रिमिः । परायरचनोपेतैराविष्कृतमहोदयः ॥२३९॥ अशोकादिवनश्रेणीकृतच्छायसभावनिः । स्रग्वस्त्रादिध्वजोल्लाससमाहूतजगज्जनः ॥२०॥ 'कल्पद्मवनच्छायाविश्रान्तामरपूजितः। प्रासादरुद्धभूमिष्ठकिन्नरोद्गीतसद्यशाः ॥२४१॥ ज्वलन्महोदयस्तूपप्रकटीकृतवैभवः । नाव्यशालाद्वयेद्धर्द्धिसंवर्धितजनोत्सवः ॥२५२॥ धूपामोदितदिग्मागमहागन्धकुटीश्वरः । त्रिविष्टप पतिप्राज्यपूजाहः परमेश्वरः ॥२४३॥ त्रिजगवल्लभः श्रीमान् भगवानादिपूरुषः । प्रचक्रे विजयोद्योगं धर्मचक्राधिनायकः ॥२४॥ ततो भगवदुद्योगसमये समुपेयुषि । प्रचेलुः प्रचलन्मौलिकोटयः सुरकोटयः ॥२५॥ तदा संभ्रान्तनाकीन्द्रतिरीटोच्चलिता ध्र वम् । जगशीराजयामासुः मणयो दिग्जये विभोः ॥२४६॥ जयत्युच्चैगिरो देवाः प्रोणुवानां नमोऽङ्गणम् । दिशां मुखानि तेजोभिर्योतयन्तः प्रतस्थिरे ॥२४७॥ जिनोद्योगमहावास्या क्षुमिता देवनायकाः । चतुर्निकायाश्चत्वारो महाब्धय इवामवन् ॥४८॥ प्रतस्थे भगवानित्थमनुयातः सुरासुरैः । अनिच्छापूर्विका वृत्तिमास्कन्दन् भानुमानिव ॥२४९॥ शान्त चेष्टाएँ प्रकट हो रही हैं, जिनके समवसरणकी पृथिवीका घेरा धूली-साल नामक कोटसे घिरा हुआ है, जिन्होंने मानस्तम्भोंके द्वारा अन्य मिथ्यादृष्टियोंके अहंकार तथा सन्देहको नष्ट कर दिया है, जो स्वच्छ जलसे भरी हुई परिखाके समीपवर्ती लतावनोंसे घिरी हुई और अपूर्व वैभवसे सम्पन्न सभाभूमिको अलंकृत कर रहे हैं, समस्त गोपुरद्वारोंसे उन्नत और उत्कृष्ट रचनासे सहित तीन कोटोंसे जिनका बड़ा भारी माहात्म्य प्रकट हो रहा है, जिनकी सभाभूमिमें अशोकादि वनसमूहसे सघन छाया हो रही है, जो माला वस्त्र आदिसे चिह्नित ध्वजाओंकी फड़कनसे जगत्के समस्त जीवोंको बुलाते हुए-से जान पड़ते हैं, कल्पवृक्षोंके वनकी छायामें विश्राम करनेवाले देव लोग सदा जिनकी पूजा किया करते हैं, बड़े-बड़े महलोंसे घिरी हुई भूमिमें स्थित किन्नरदेव जोर-जोरसे जिनका यश गा रहे हैं, प्रकाशमान और बडी भारी विभूतिको धारण करनेवाले स्तूपोंसे जिनका वैभव प्रकट हो रहा है, दोनों नाट्यशालाओंकी बढ़ी हुई ऋद्धियोंसे जो मनुष्योंका उत्सव बढ़ा रहे हैं, जो धूपकी सुगन्धिसे दशों दिशाओंको सुगन्धित करनेवाली बड़ी भारी गन्धकुटीके स्वामी हैं, जो इन्द्रोंके द्वारा की हुई बड़ी भारी पूजाके योग्य हैं, तीनों जगत्के स्वामी हैं और धर्मके अधिपति हैं, ऐसे श्रीमान् आदिपुरुष भगवान् वृषभदेवने विजय करनेका उद्योग किया-विहार करना प्रारम्भ किया ॥२३३-२४४॥ तदनन्तर भगवान के विहारका समय आनेपर जिनके मुकुटोंके अग्रभाग हिल रहे हैं ऐसे करोड़ों देव लोग इधर-उधर चलने लगे ॥२४॥ भगवान्के उस दिग्विजयके समय घबराये हुए इन्द्रोंके मुकुटोंसे विचलित हुए मणि ऐसे जान पड़ते थे मानो जगत्की आरती ही कर रहे हों ।।२४६॥ उस समय जय-जय इस प्रकार जोर-जोरसे शब्द करते हुए, आकाशरूपी आँगनको व्याप्त करते हुए और अपने तेजसे दिशाओंके मुखको प्रकाशित करते हुए देव लोग चल रहे थे ॥२४७|| उस समय इन्द्रोंसहित चारों निकायके देव जिनेन्द्र भगवान्के विहाररूपी महावायुसे क्षोभको प्राप्त हुए चार महासागर के समान जान पड़ते थे ।।२४८। इस प्रकार सुर और असुरोंसे सहित भगवान्ने सूर्यके समान इच्छा १. लतावन । २. वृक्ष-ल.। ३. इन्द्रादिकृतादभ्रः । ४. आच्छादयन्तः । ५. महावायुभमूहः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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