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________________ ,६२८ आदिपुराणम् प्रवक्ता वचसामीशो मारजिविश्व गाववित् । सुतनुस्तनुनिर्मुक्तः सुगतो हतदुर्नयः ॥२१॥ श्रीशः श्रीश्रितपादाब्जो वीतभीरमयङ्करः । उत्सम दोषो निर्विघ्नो निश्चलो लोकवस्सलः ॥२१॥ लोकोत्तरी लोकपतिर्लोकचक्षुरपारधीः । धीरधीर्बुद्धसन्मार्गः शुद्धः सूनृतपूतवाक् ॥२१२॥ प्रज्ञापारमितः प्राज्ञो यतिनियमितेन्द्रियः । मदन्तो भद्रक गद्रः कल्पवृक्षो वरप्रदः ॥२३॥ समुन्मीलितकर्मारिः कर्मकाष्ठाशु शुक्षणिः । कर्मण्यः कर्मठ प्रांशु हेंयादेय विचक्षणः ॥२१४॥ अनन्तशक्तिरच्छेयस्त्रिपुरारि स्त्रिलोचनः । त्रिनेत्रत्र्यम्बकस्यक्षः केवलज्ञानवीक्षणः ॥२१५॥ प्रवक्ता ६४७, वचनोंके स्वामी होनेसे वचसामीश ६४८, कामदेवको जीतनेके कारण मारजित् ६४६, संसारके समस्त पदार्थों को जाननेसे विश्वभाववित् ६५०, उत्तम शरीरसे युक्त होनेके 'कारण सुतनु ६५१, शीघ्र ही शरीर बन्धनसे रहित हो मोक्षकी प्राप्ति होनेसे तनुनिर्मुक्त ६५२, प्रशस्त विहायोगति नामकर्मके उदयसे आकाशमें उत्तम गमन करने, आत्मस्वरूपमें तल्लीन होने अथवा उत्तमज्ञानमय होनेसे सुगत १५३ और मिथ्यानयोंको नष्ट करनेसे हतदुर्नय ६५४ कहलाते हैं ।।२१०।। लक्ष्मीके ईश्वर होनेसे श्रोश ६५५ कहलाते हैं, लक्ष्मी आपके चरणकमलोंकी सेवा करती है इसलिए श्रीश्रितपादाज ६५६ कहे जाते हैं, भयरहित हैं इसलिए वीतभी १५७ कहलाते हैं, दूसरोंका भय नष्ट करनेवाले हैं इसलिए अभयंकर ६५८ माने जाते हैं, समस्त दोषोंको नष्ट कर दिया है इसलिए उत्सन्नदोष ६५६ कहलाते हैं, विघ्न रहित होनेसे निर्विघ्न ९६०, स्थिर होनेसे निश्चल ९६१ और लोगोंके स्नेहपात्र होनेसे लोक-वत्सल ९६२ कहलाते हैं ।।२१।। समस्त लोगों में उत्कृष्ट होनेसे लोकोत्तर ९६३, तीनों लोकोंके स्वामी होनेसे लोकपति ९६४, समस्त पुरुषोंके नेत्रस्वरूप होनेसे लोकचक्षु ९६५, अपरिमित बुद्धिके धारक होनेसे अपारधी ९६६, सदा स्थिर बुद्धिके धारक होनेसे धीरधी ९६७, समीचीन मार्गको जान लेनेसे बुद्धसन्मार्ग ९६८, कर्ममलसे रहित होनेके कारण शुद्ध ९६९ और सत्य तथा पवित्र वचन बोलनेसे सत्यसूनृतवाक् ६७० कहलाते हैं ॥२१॥ बुद्धिको पराकाष्ठाको प्राप्त होनेसे प्रज्ञापारमित ९७१, अतिशय बुद्धिमान होनेसे प्राज्ञ ६७२, विषय कषायोंसे उपरत होनेके कारण 'यति ६७३, इन्द्रियोंको वश करनेसे नियमितेन्द्रिय ६७४, पूज्य होनेसे भदन्त ६७५,सब जीवोंका भला करनेसे भद्रकृत् १७६, कल्याणरूप होनेसे भद्र ६७७, मनचाही वस्तुओंका दाता होनेसे कल्पवृक्ष १७८ और इच्छिन वर प्रदान करनेसे वरप्रद ६७६ कहलाते हैं ॥२१३।। कर्मरूप शत्रुओंको उखाड़ देनेसे समुन्मूलितकर्मारि ६८०, कर्मरूप ईंधनको. जलानेके लिए अग्निके समान होनेसे कर्मकाष्ठाशुशुक्षणि ६८१, कार्य करनेमें निपुण होनेसे कर्मण्य ६८२, समर्थ होनेसे कर्मठ ६८३, उत्कृष्ट अथवा उन्नत होनेसे प्रांशु ६८४ और छोड़ने तथा ग्रहण करने योग्य पदार्थोंके जानने में विद्वान् होनेसे हेयादेयविचक्षण ६८५ कहलाते हैं ॥२१४|| अनन्तशक्ति धारक होनेसे अनन्तशक्ति ६८६, किसीके द्वारा छिन्न-भिन्न करने योग्य न होनेसे अच्छेद्य १८७, जन्म, जरा और मरण इन तीनोंका नाश करनेसे त्रिपुरारि ६८८, त्रिकालवर्ती पदार्थोके जाननेसे त्रिलोचन ६८६, त्रिनेत्र ६६०, त्र्यम्बक ६६१ और व्यक्ष ६६२ तथा केवलज्ञानरूप नेत्रसे सहित होनेके कारण केवलज्ञानवीक्षण ६६३ कहलाते हैं ।।२१५।। १. निरस्तदोषः । २. पूज्यः । ३. सुखकरः । ४. शोभनः । ५. कर्मेन्धनकृशानुः । ६. कर्मणि साधुः । ७. कर्मशूरः । ८. उन्नतः । ९. जन्मजरामरणत्रिपुरहरः । १०. त्रिकालविषयावबोधात् त्रिलोचनः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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