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________________ पञ्चविंशतितमं पर्व त्रिकालदर्शी लोकेशी लोकधाता दृढव्रतः । सर्वलोकानिगः पूज्यः सर्वलोकैक सारथिः ॥ १९३॥ पुराणः पुरुषः पूर्वः कृतपूर्वाङ्गविस्तरः । श्रादिदेवः पुराणाद्यः पुरुदेवोऽधिदेवता ॥ १६२ ॥ युगमुख्यां युगज्येष्टी युगादिस्थितिदेशकः । कल्याणवर्णः कल्याणः कल्यः कल्याणलक्षणः ॥ १९३॥ कल्याण कल्याणामा विकल्मषः । विकलङ्कः कलातीतः कलिलग्नः कलाधरः ॥१९४॥ देवदेवो जगन्नाथो जगदबन्धुर्जगद्विभुः । जगद्वितैषी लोकज्ञः सर्वगो' जगदुग्रगः ॥ १९५॥ ६२५ गुरुगादात्मा गृह गोचरः । मत्रीजातः प्रकाशात्मा ज्वलज्ज्वलनसप्रभः ॥५९६॥ पदार्थों को देखनेवाले हैं इसलिए त्रिकालदर्शी ०१, लोकोंके स्वामी होने से लोकेश २०२, समस्त लोगोंक पोषक या रक्षक होनेसे लोकधाता ८०३ त्रतोंको स्थिर रखनेसे हम ८०४, सच लोकांसे श्रेष्ट होनेके कारण सर्व लोकातिग ८०५, पूजाके योग्य होनेसे पूज्य ८०६ और सब लोगों को मुख्यरूप से अभीष्ट स्थान तक पहुँचाने में समर्थ होनेसे सर्वलोकैकसारथि ८०७ कहलाते हैं ।।१९१।। सबसे प्राचीन होनेसे पुराण, आत्माके श्रेष्ठ गुणों को प्राप्त होनेसे पुरुष ८०९, सर्व प्रथम होने से पूर्व ८१०, अंग और पूर्वीका विस्तार करनेसे कृतपूर्वाविस्तर ८११, सब देवों में मुख्य होनेसे आदिदेव ८१२, पुराणोंमें प्रथम होनेसे पुराणाद्य ८१३, महान् अथवा प्रथम तीर्थंकर होनेसे पुरुदेव ८१४ और देवोंके भी देव होनेसे अधिदेवता ८१५, कहलाते हैं ।। १९२।। इस अवसर्पिणी युग के मुख्य पुरुष होनेसे युगमुख्य ८१६, इसी युगमें सबसे बड़े होने से युगज्येष्ठ ८१७, कर्मभूमिरूप युगके प्रारम्भमें तत्कालोचित मर्यादा के उपदेशक होनेसे युगादिस्थितिदेशक ८१८, कल्याण अर्थात् सुवर्णके समान कान्तिके धारक होनेसे कल्याणवर्ण ८१९, कल्याणरूप होने से कल्याण ८२०, मोक्ष प्राप्त करने में सज्ज अर्थात् तत्पर अथवा निरामयनीरोग होने से कल्य ८२१ और कल्याणकारी लक्षणोंसे युक्त होनेके कारण कल्याणलक्षण ८२२ कहलाते हैं || १९३ || आपका स्वभाव कल्याणरूप है इसलिए आप कल्याण प्रकृति ८२३ कहलाते हैं, आपकी आत्मा देदीप्यमान सुवर्णके समान निर्मल है इसलिए आप दीप्रकल्याणात्मा ८२४ कहे जाते हैं, कर्मकालिमासे रहित हैं इसलिए विकल्प ८२५ कहलाते हैं, कलंकरहित हैं इसलिए विकलंक ८२६ कहे जाते हैं, शरीररहित हैं इसलिए कलातीत ८२७ कहलाते हैं, पापोंको न करनेवाले हैं इसलिए कलिलघ्न ८२८ कहे जाते हैं, और अनेक कलाओंको धारण करनेवाले हैं इसलिए कलाधर ८२९ माने जाते हैं || १९४|| देवोंके देव होनेसे देवदेव ८३०, जगत् के स्वामी होनेसे जगन्नाथ ८२१, जगत्के भाई होनेसे जगबन्धु ८३२, जगत् के स्वामी होने से जगद्विभु ३३, जगत्का हित चाहनेवाले होनेसे जगद्धितैषी ८३४, लोकको जाननेसे लोकज्ञ ८३५, सब जगह व्याप्त होनेसे सर्वग ८३६ और जगत् में सबमें ज्येष्ठ होने के कारण जगदग्रज८३७ कहलाते हैं । १९५|| चर, स्थावर सभीके गुरु होनेसे चराचरगुरु ८३८, बड़ी सावधानीके साथ हृदयमें सुरक्षित रखने से गोप्य ८३९, गूढ़ स्वरूपके धारक होनेसे गूढात्मा ८४०, अत्यन्त गूढ़ विषयोंको जाननेसे गूढगोचर ८४१, तत्काल में उत्पन्न हुए के समान निर्विकार होनेसे सद्योजात ८४२, प्रकाशस्त्ररूप होनेसे प्रकाशात्मा ८४३ और जलती हुई अग्नि के समान शरीरकी १. सर्वलोकस्य एक एव नेता । २. प्रशस्तः । ३. दीप्तकल्याणात्मा ल० । ४ सर्वेशो इ० । जगदग्रजः ल०, ६०, इ० । ५. गूढेन्द्रियः । ७९
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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