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________________ पञ्चविंशतितमं पर्व ६०३ नमः सुगतये तुभ्यं शोभनां गतिमीयुषे । नमस्तेऽतीन्द्रियज्ञानसुखायानिन्द्रियात्मने ॥१०॥ कायबन्धननिर्मोक्षादकायाय नमोऽस्तु ते । नमस्तुभ्यमयोगाय योगिनामधियोगिने ॥११॥ अवेदाय नमस्तुभ्यमकषायाय ते नमः । नमः परमयोगोन्द्र वन्दिताघ्रिद्वयाय ते ॥९२।। नमः परमविज्ञान नमः परमसंयम । नमः परमहरदृष्टपरमार्थाय तायिने' ॥१३॥ नमस्तुभ्यमलेश्याय शुद्धलेश्यांशकस्पृशे । नमो मध्यतरावस्थाम्यतीताय विमोक्षिणे ॥९॥ संश्यसंज्ञिद्वयावस्थाम्यतिरिक्तामलात्मने । नमस्ते वीतसंज्ञाय नमः क्षायिकदृष्ये ॥१५॥ अनाहाराय तृप्ताब नमः परममाजुषे । व्यतीताशेषदोषाय भवाब्धेः पारमायुपे ॥१६॥ अजराय नमस्तुभ्यं नमस्ते स्तादजन्मने । अमृत्यवे नमस्तुभ्यमचलायाक्षरात्मने ॥१७॥ अलमास्तां गुणस्तोत्रमनन्तास्तावका गुणाः । त्वां नामस्मृतिमात्रेण पर्युपासिसिषामहं ॥९॥ प्रसिद्धाष्ट सहनेडलक्षणं त्वां गिरां पतिम् । 'नाम्नामष्टसहस्रेण' तोष्टुमोऽभीष्टसिद्धये ॥९९।। और आपके समस्त राग आदि दोष नष्ट हो गये हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ॥८॥ ओप मोक्षरूपी उत्तम गतिको प्राप्त होनेवाले हैं इसलिए सुगति हैं अतः आपको नमस्कार हो, आप अतीन्द्रियज्ञान और सुखसे सहित हैं तथा इन्द्रियोंसे रहित अथवा इन्द्रियोंके अगोचर हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ॥१०॥ आप शरीररूपी बन्धनके नष्ट हो जानेसे अकाय कहलाते हैं इसलिए आपको नमस्कार हो, आप योगरहित हैं और योगियों अर्थात् मुनियों में सबसे उत्कृष्ट हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ।शा आप वेदरहित हैं, कषायरहित हैं, और बड़ेबड़े योगिराज भी आपके चरणयुगलकी वन्दना करते हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ॥९२।। हे परमविज्ञान, अर्थात् उत्कृष्ट-केवलज्ञानको धारण करनेवाले, आपको नमस्कार हो, हे परम संयम, अर्थात् उत्कृष्ट-यथाख्यात चारित्रको धारण करनेवाले, आपको नमस्कार हो । हे भगवन, आपने उत्कृष्ट केवलदर्शनके द्वारा परमार्थको देख लिया है तथा आप सबकी रक्षा करनेवाले हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ॥१३॥ आप यद्यपि लेश्याओंसे रहित हैं तथापि उपचारसे शुद्ध-शुक्ललेश्याके अंशांका स्पर्श करनेवाले है, भव्य तथा अभव्य दोनों ही अवस्थाऑसे रहित हैं और मोक्षरूप हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ॥९४|| आप संज्ञी और असंज्ञी दोनों अवस्थाजोंसे रहित निर्मल आत्माको धारण करनेवाले हैं, आपकी आहार, भय, मैथुन और परिग्रह ये चारों संज्ञाएँ नष्ट हो गयी हैं तथा क्षायिकसम्यग्दर्शनको धारण कर रहे हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ।९५|| आप आहाररहित होकर भी सदा तृप्त रहते हैं, परम दीप्तिको प्राप्त हैं, आपके समस्त दोष नष्ट हो गये हैं और आप संसाररूपो समुद्रके पारको प्राप्त हुए हैं इसलिए आपको नमस्कार हो॥१६॥ आप बुढापारहित हैं, जन्मरहित हैं, मृत्युरहित हैं, अचलरूप हैं और अविनाशी हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ॥९७॥ हे भगवन् , आपके गुणोंका स्तवन दूर रहे, क्योंकि आपके अनन्त गुण हैं उन सबका स्तवन होना कठिन है इसलिए केवल आपके नामोंका स्मरण करके ही हम लोग आपकी उपासना करना चाहते हैं ॥९८|| आपके देदीप्यमान एक हजार आठ लक्षण अतिशय प्रसिद्ध हैं और आप समस्त वाणियोंके स्वामी हैं इसलिए हम लोग अपनी अभीष्टसिद्धिके लिए एक हजार आठ नामोंसे आपकी स्तुति करते हैं ।।१९।। आप अनन्तचतुष्टयरूप अन्तरङ्गलक्ष्मी और अष्ट प्रातिहार्यरूप १. पालकाय । २. शुक्ललेश्यां मुक्त्वा इतरपञ्चलेश्यारहिताय । ३. संज्ञा-संशि- ल । ४. विशेषेण प्राप्तसज्ज्ञानाय । ५. -मीयुषे-ल०। ६. अविनश्वरस्वरूपाय । ७. उपासनं कर्तुमिच्छामः । ८. अष्टोत्तरसहस्र । ९. अष्टोत्तरसहस्रेण । १०. स्तुति कुर्मः।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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