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________________ ६०० आदिपुराणम् नखांशवस्तवाताम्राः प्रसरन्तिदिशास्त्रमी । स्वदविकल्पवृक्षापात् प्रारोहा इव निःसृताः ॥६॥ शिरस्सु नः स्पृशन्स्येते प्रसादस्येव तेऽशकाः । स्वत्पादनखशीतांशुकराः प्राहादिताखिलाः ॥६२॥ त्वत्पादाम्बुरुहच्छायासरसीमवगाहते । दिव्यश्री कलहंसीयं नखरोचिर्पणालिकाम् ॥६३।। मोहारिदिनालग्नशोणिताच्छटामिव । तलच्छायामिदं धत्ते स्वत्पदाम्बुरुहद्वयम् ॥६॥ स्वस्पादनखभाभार सरसि प्रतिविम्बिताः । सुराजनाननच्छायास्तन्वते पङ्कजश्रियम् ॥६५॥ स्वयंभुवे नमस्तुभ्यमुत्पांचास्मानमात्मनि । स्वास्मनैव तथोद्भूतवृत्तयेऽविन्स्यवृत्तये ॥१६॥ नमस्ते जगतां पत्ये लक्ष्मीमो नमोऽस्तु ते । विदांवर नमस्तुभ्यं नमस्ते वदतां वर ॥६॥ कर्मशत्रुहणं देवमामनन्ति मनीषिणः । स्वामानम स्सुरेग्मौलिमामाला यर्चितक्रमम् ॥६॥ ध्यानद्धनिर्मिन्नघनघातिमहातरुः । अनन्तभवसन्तानजयादासीदनन्तजित् ॥६९॥ त्रैलोक्यनिर्जयावातदुर्दमतिदुर्जयम् । मृत्युराजं विजित्यासीज्जिनमृत्युञ्जयो भवान् ॥७॥ विधुताशेषसंसारबन्धनो मध्यबान्धवः । त्रिपुरारिस्स्वमीशासि जन्ममृत्युजरान्तकृत् ॥७॥ शोभा दिखलाता रहता है ॥६०॥ हे देव, आपके नखोंकी ये कुछ-कुछ लाल किरणें दिशाओंमें इस प्रकार फैल रही हैं मानो आपके चरणरूपी कल्पवृक्षोंके अग्रभागसे अंकूरे ही निकल रहे हों॥६१॥ सब जीवोंको आह्लादित करनेवाली आपके चरणोंके नखरूपी चन्द्रमाको ये किरणे हम लोगोंके सिरका इस प्रकार स्पर्श कर रही हैं मानो आपके प्रसादके अंश ही हो ॥२॥ हे भगवन् , यह दिव्य लक्ष्मीरूपी मनोहर हँसी नखोंको कान्तिरूपी मृणालसे सुशोभित आपके चरणकमलोंकी छायारूपी सरोवरीमें अवगाहन करती है ॥६३॥ हे विभो, आपके ये दोनों चरणकमलोंकी जिस कान्तिको धारण कर रहे हैं वह ऐसी जान पड़ती है मानो मोहरूपी शत्रुको नष्ट करते समय लगी हुई उसके गीले रक्तकी छटा ही हो ॥६४॥ हे देव, आपके चरणोंके नखको कान्तिरूप जलके सरोवरमें प्रतिबिम्बित हुई देवांगनाओंके मुखकी छाया कमलोंकी शोभा बढ़ा रही है ।।६५।। हे नाथ, आप अपने आत्मामें अपने ही आत्माके द्वारा अपने आत्माको उत्पन्न कर प्रकट हुए हैं, इसलिए आप स्वयंभू अर्थात् अपने-आप उत्पन्न हुए कहलाते हैं। इसके सिवाय आपका माहात्म्य भी अचिन्त्य है अतः आपके लिए नमस्कार हो ॥६६|| आप तीनों लोकोंके स्वामी हैं इसलिए आपको नमस्कार हो, आप लक्ष्मीके भर्ता हैं इसलिए आपको नमस्कार हो, आप विद्वानोंमें श्रेष्ठ हैं इसलिए आपको नमस्कार हो और आप वक्ताओंमें श्रेष्ठ हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ॥६७॥ हे देव, बुद्धिमान लोग आपको कामरूपी शत्रुको नष्ट करनेवाला मानते हैं, और आपके चरणकमल इन्द्रोंके मुकुटोंकी कान्ति के समूहसे पूजित हैं इसलिए हम लोग आपको नमस्कार करते हैं।६८॥ अपने ध्यानरूपी कुठारसे अतिशय मजबूत घातियाकर्मरूपी बड़े भारी वृक्षको काट डाला है तथा अनन्त संसारकी सन्ततिको भी आपने जीत लिया है इसलिए आप अनन्तजित् कहलाते हैं ॥६९।। हे जिनेन्द्र, तीनों लोकोंको जीत लेनेसे जिसे भारी अहंकार उत्पन्न हुआ है और जो अत्यन्त दुर्जय हैं ऐसे मृत्युराजको भी आपने जीत लिया है इसीलिए आप मृत्युंजय कहलाते है ॥७०॥ आपने संसाररूपी समस्त बन्धन नष्ट कर दिये हैं, आप भव्य जीवोंके बन्धु हैं और आप जन्म, मरण तथा बुढ़ापा इन तीनोंका नाश १. -भानीर. ल. । २. संपाद्य । ३. कामारिघ्नम्। ४. त्वामानुमः सुरेण्मौलिभामाला. ल.। ल्वामानुमः- सुरेग्मोलिनग्माला-द० । ५. मुद्गर । ६. दुर्दम्य- ल०। ७. -स्त्वमेवासि- ल० ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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