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________________ ५९६ आदिपुराणम् तवेदमागनं धत्ते प्रफुल्लकमलश्रियम् । स्वकान्तिज्योत्स्नया विश्वमाक्रामच्छरबिन्दुवत् ॥३२॥ श्रन्द्रहासहुंकारमदष्टोष्ठपुटं मुखम् । जिनाख्याति सुमेधोभ्यस्तावकी वीतरागताम् ॥२३॥ त्वन्मुखादुयती दीप्तिः पावनीव सरस्वती । विधुन्वती तमो भाति जितबालातपद्युतिः ॥२४॥ स्वन्मुखाम्बुरुहालग्ना सुराणां नयनावलिः । भातीयमलिमालेव'तदामोदानुपातिनी ॥२५॥ मकरन्दमिवापीय त्वद्वक्त्राजोद्गतं वचः । अनाशिमियं भव्यभ्रमरा यान्स्यमी मुदम् ॥२६॥ एकतोऽभिमुखोऽपि त्वं लक्ष्यसे विश्वतोमुखः । तेजोगुणस्य माहात्म्यमिदं नूनं तवाद्भुतम् ॥२७॥ "विश्वदिक्षु विसर्पन्ति तावका वागमीषवः । तिरश्चामपि हृवान्तमुद्धन्वन्तो जिनांशुमान् ॥२८॥ तव वागमृतं पीत्वा वयमद्यामराः स्फुटम् । पीयूषमिदमिष्टं नो देव सर्वरुजाहरम् ॥२९॥ जिनेन्द्र तव वक्त्राब्जं प्रक्षरद्वचनामृतम् । भन्यानां प्रीणनं भाति धर्मस्येव निधानकम् ॥३०॥ मुखेन्दुमण्डलाइव तव वाक्किरणा इमे । विनिर्यान्तो हतध्वान्ताः समामाहादयन्यलम् ॥३१॥ चित्रं वाचा विचित्राणामक्रमः प्रभवः प्रभो । अथवा तीर्थकृत्वस्य देव वैमवमीशम् ॥३२॥ निर्मल दीप्ति पुण्यधाराके समान हम लोगोंको पवित्र कर रही है ।।२१॥ हे भगवन् , शरद् ऋतुके चन्द्रमाके समान अपनी कान्तिरूपी चाँदनीसे समस्त जगत्को व्याप्त करता हुआ आपका यह मुख फूले हुए कमलकी शोभा धारण कर रहा है ॥२२॥ हे जिन, आपका मुख न तो अट्टहाससे सहित है, न हुंकारसे युक्त है और न ओठोंको ही दबाये हैं इसलिए वह बुद्धिमान् लोगोंको आपकी वीतरागता प्रकट कर रहा है ॥२३॥ हे देव, जो अन्धकारको नष्ट कर रही है और जिसने प्रातःकालके सूर्यकी प्रभाको जीत लिया है ऐसी आपकी मुखसे निकलती हुई पवित्र कान्ति सरस्वतीके समान सुशोभित हो रही है ॥२४॥ हे भगवन् , आपके मुखरूपी कमलपर लगी हुई यह देवोंके नेत्रोंकी पंक्ति ऐसी जान पड़ती है मानो उसकी मुगन्धिके कारण चारों ओरसे झपटती हई भ्रमरोंकी पंक्ति ही हो ॥२५॥ हे नाथ, जिनसे कभी तृप्ति न हो ऐसे आपके मुखरूपी कमलसे निकले हुए आपके वचनरूपी मकरन्दका पान कर ये भव्य जीवरूपी भ्रमर आनन्दको प्राप्त हो रहे हैं ॥२६।। हे भगवन् , यद्यपि आप एक ओर मुख किये हुए विराजमान हैं तथापि ऐसे दिखाई देते हैं जैसे आपके मुख चारों ओर हों । हे देव, निश्चय ही यह आपके तपश्चरणरूपी गुणका आश्चर्य करनेवाला माहात्म्य है ॥२७॥ हे जिनेन्द्ररूपी सूर्य, तिर्यचोंके भी हृदयगत अन्धकारको नष्ट करनेवाली आपकी वचनरूपी किरणें सब दिशाओं में फैल रही हैं।॥२८॥ हे देव, आपके वचनरूपी अमृतको पीकर आज हम लोग वास्तव में अमर हो गये हैं इसलिए सब रोगोंको हरनेवाला आपका यह वचनरूप अमृत हम लोगोंको बहुत ही इष्ट है-प्रिय है ॥२९॥ हे जिनेन्द्रदेव, जिससे वचनरूपी अमृत झर रहा है और जो भव्य जीवोंका जीवन है ऐसा यह आपका मुखरूपी कमल धर्मके खजानेके समान सुशोभित हो रहा है ॥३०॥ हे देव, आपके मुखरूपी चन्द्रमण्डलसे मिकलती हुई ये वचनरूपी किरण अन्धकारको नष्ट करती हुई सभाको अत्यन्त आनन्दित कर रही हैं ॥३१॥ हे देव, यह भी एक आश्चर्यको बात है कि आपसे अनेक प्रकारकी भाषाओंकी एक साथ उत्पत्ति होती है अथवा आपके तीर्थकर १. मुखाम्बुजसहानुमोदमनुव्रजन्ती। २. पीत्वा । ३. अतृप्तिकरम् । तपोगुणस्य-ल० । ४. सकलदिक्ष । ५. वचनकिरणाः । ६. न म्रियन्त इत्यमराः । ७. तब वारूपममतम् । ८. प्राणनं-ल.। ९. निक्षेपः । १०. प्रभो:-ल.।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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