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________________ । पञ्चविंशतितमं पर्व ५९५ इत्याकलण्य मनसा 'तुष्टूर्षु मां फलार्थिनम् । विमो प्रसन्नया हव्या त्वं पुनीहि सनातन ॥१२॥ मामुदाकुरुते भक्तिस्त्वद्गुणैः परिचोदिता । ततः स्तुतिपथे तेऽस्मिन् लग्नः संविग्नमानसः ॥१३॥ त्वयि मक्तिः कृताल्पापि महतीं फलसंपदम् । पम्फीति विमो कल्पक्ष्माजसेवेव ऐहिनाम् ॥१४॥ तवारिजयमाचष्टे वपुरस्पृष्टकैतवम् । दोषावेशविकारा हि रागिणां भूषणादयः ॥१५॥ निर्भूषमपि कान्तं ते वपुर्भुवनभूषणम् । दीप्रं हि भूषणं नैव भूषणान्तरमीक्षते ॥१६॥ नमूनि करीबन्धो न शेखरपरिग्रहः। न किरीटादिमारस्ते तथापि रुचिरं शिरः ॥१७॥ न मुखे भृकुटीन्यासो न दष्टो दशनच्छदः । नास्त्रे व्यापारितो हस्तस्तथापि त्वमरीनहन् ॥१८॥ स्वया नातान्त्रिते नेत्रे नीलोत्पलदलायते । मोहारिविजय देव प्रभुशक्तिस्तवाद्भुता ॥१९॥ अपापाजावलोकं ते जिनेन्द्र नयनदयम् । मदनारिजयं वक्ति व्यक्तं नः सौम्यवीक्षितम् ॥२०॥ स्वदशोरमला दोप्तिरास्पृशन्ती शिरस्सु नः । पुनाति पुण्य धारेव जगतामकपावनी ॥२१॥ प्राप्त होना उसका फल है । हे विभो, हे सनातन, इस प्रकार निश्चय कर हृदयसे स्तुति करनेवाले और फलकी इच्छा करनेवाले मुझको आप अपनी प्रसन्न दृष्टिसे पवित्र कीजिए॥११-१२॥ हे भगवन् , आपके गुणोंके द्वारा प्रेरित हुई भक्ति ही मुझे आनन्दित कर रही है इसलिए मैं संसारसे उदासीन होकर भी आपकी इस स्तुतिके मार्गमें लग रहा हूँ-प्रवृत्त हो रहा हूँ ॥१३॥ हे विभो, आपके विषयमें की गयी थोड़ी भी भक्ति कल्पवृक्षकी सेवाकी तरह प्राणियोंके लिए बड़ी-बड़ी सम्पदाएँरूपी फल फलती हैं -प्रदान करती हैं ॥१४॥ हे भगवन, आभूषण आदि उपाधियोंसे रहित आपका शरीर आपके राग-द्वेष आदि शत्रुओंकी विजयको स्पष्ट रूपसे कह रहा है क्योंकि आभूषण वगैरह रागी मनुष्योंके दोष प्रकट करनेवाले विकार हैं। भावार्थ - गी द्वेषी मनुष्य ही आभूषण पहनते हैं परन्तु आपने राग-द्वेष आदि अन्तरंग शत्रुओंपर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली है इसलिए आपको आभूषण आदिके पहननेकी आवश्यकता नहीं है ।।१५।। हे प्रभो, जगत्को सुशोभित करनेवाला आपका यह शरीर भूषणरहित होनेपर भी अत्यन्त सुन्दर है सो ठीक ही है क्योंकि जो आभूषण स्वयं देदीप्यमान होता है वह दूसरे भाभूषणकी प्रतीक्षा नहीं करता ॥१६॥ हे भगवन, यद्यपि आपके मस्तकपर न तो सुन्दर केशपाश है, न शेखरका परिग्रह है और न मुकुटका भार ही है तथापि वह अत्यन्त सुन्दर है॥१७॥ हे नाथ, आपके मुलपर न तो भीही टेड़ी हुई है, न आपने ओठ ही डसा है और न आपने अपना हाथ ही शस्त्रोपर ब्याप्रत किया है-हायसे शस्त्र उठाया है फिर भी आपने घातियाकर्मरूपी शत्रुओंको नष्ट कर दिया है ॥१॥हे देव, आपने मोहरूपी शत्रुके जीतने में अपने नील कमलके दलके समान बड़े-बड़े नेत्रोंको कुछ भी लाल नहीं किया था, इससे मालूम होता है कि आपको प्रभुत्वशक्ति बड़ा आश्चर्य करनेवाली है ॥१९॥ हे जिनेन्द्र, आपके दोनों नेत्र कटाक्षावलोकनसे रहित हैं और सौम्य दृष्टिसे सहित हैं इसलिए वे हम लोगोंको स्पष्ट रीतिसे बतला रहे हैं कि आपने कामदेवरूपी शत्रुको जीत लिया है ॥२०॥ हे नाथ, हम लोगोंके मस्तकका स्पर्श करती हुई और जगत्को एकमात्र पवित्र करती हुई आपके नेत्रोंकी १. स्तोतुमिच्छम् । २. पवित्रीकुरु । ३. प्रोत्साहयति । ४. प्रवृत्तोऽस्मि । ५. धर्माधर्मफलानुरागमानसः । ६. भशं फलति । ७. दीप्तं-ल०, अ०, प०। ८.हंसि स्म । ९. दलायिते- दै०। १०. कटाक्षवीक्षणम् । अनपाङ्गाव-ल० । ११. शान्तिधारा ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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