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________________ ५९६ -चतुर्विशतितमं पर्व शार्दूलविक्रीडितम् स्वान्त तसमस्तवस्तुविसरां प्रास्तीर्णवर्णोज्ज्वलाम् ___ निर्णिक्तां नयचक्र समिधिगुरुं स्फीतप्रमोदाहृतिम् । विश्वास्यां निखिलाणभृत्परिचितां जैनीमिव न्याहृति प्राविक्षस्परया मुदा निधिपतिः स्वामुत्पताका पुरीम् ॥१८६॥ इत्या भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे भगवदर्मोपदेशनोपवर्णनं नाम चतुर्विशतितम पर्व ॥२४॥ करता है उसी प्रकार भरत भी अपने राज्य-शासनके उदयकालमें प्रजासे राग अर्थात् प्रेम धारण कर रहे थे, सूर्य जिस प्रकार आभिमुख्य अर्थात् प्रधानताको धारण करता है उसी प्रकार भरत भी प्रधानताको धारण कर रहे थे, सूर्य जिस प्रकार विजयी होता है उसी प्रकार भरत भी विजयी थे, और सायंकालके समय जिस प्रकार समस्त दिशाओंको प्रकाशित करनेवाली किरणें सूर्यके पीछे-पीछे जाती हैं ठीक उसी प्रकार समस्त दिशाओंमें आक्रमण करनेवाले भरतके छोटे भाई उनके पीछे-पीछे जा रहे थे॥१८५।। इस प्रकार मिधियोंके अधिपति महाराज भरतने बड़े भारी आनन्दके साथ अपनी अयोध्यापुरीमें प्रवेश किया था। उस समय उसमें अनेक ध्वजाएँ फहरा रही थीं और वह ठीक जिनवाणीके समान सुशोभित हो रही थी क्योंकि जिस प्रकार जिनवाणीके भीतर समस्त पदार्थोंका विस्तार भरा रहता प्रकार उस अयोध्यामें अनेक पदार्थोंका विस्तार भरा हुआ था। जिस प्रकार जिनवाणी फैले हुए वर्णों अर्थात् अक्षरोंसे उज्ज्वल रहती है उसी प्रकार वह अयोध्या भी फैले हुए-जगह-जगह बसे हुए क्षत्रिय आदि वर्णोंसे उज्ज्वल थी। जिस प्रकार जिनवाणी अत्यन्त शुचिरूप-पवित्र होती है उसी प्रकार वह अयोध्या भी शुचिरूप-कर्दम आदिसे रहित-पवित्र थी। जिस प्रकार जिनवाणी समूह के सन्निधानसे श्रेष्ठ होती है उसी प्रकार वह अयोध्या भी नीतिसमूहके सन्निधानसे श्रेष्ठ थी। जिस प्रकार जिनवाणी विस्तृत आनन्दको देनेवाली होती है उसी प्रकार वह अयोध्या भी सबको विस्तृत आनन्दकी देनेवाली थी, जिस प्रकार जिनवाणी विश्वास्य अर्थात् विश्वास करने योग्य होती है अथवा सब ओर मुखवाली अर्थात् समस्त पदार्थोंका निरूपण करनेवाली होती है उसी प्रकार वह अयोध्या भी विश्वास करनेके योग्य अथवा सब ओर हैं आस्य अर्थात् मुख जिसके ऐसी थी-उसके चारों ओर गोपुर बने हुए थे, और जिस. प्रकार जिनवाणी सभी अंग अर्थात् द्वादशांगको धारण करनेवाले मुनियोंके द्वारा परिचितअभ्यस्त रहती है उसी प्रकार वह अयोध्या मी समस्त जीवोंके द्वारा परिचित थी-उसमें प्रत्येक प्रकारके प्राणी रहते थे॥१८६।।। इस प्रकार भगवजिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसं महमें भगवत्कृत। धर्मोपदेशका वर्णन करनेवाला चौबीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥२४॥ - - ---- १. निजाभ्यन्तरमानीतसमस्तद्रव्यसमूहम्, पक्षे निजाभ्यन्तरमानीतसमस्तपदार्थस्वरूपसमहम २. विस्तीर्ण क्षत्रियादिवर्ग, पक्षे विस्तीर्णाक्षर । ३. पोषकाम्, पक्षे शुद्धाम् । णिजिरिङ् शौचपोषयोरिति धातोः संभवात् । ४. नयेन नीत्या उपलक्षितचक्ररत्नसंबन्वेन गुरुम्, पक्षे नयसमूहसंबन्धेन गुरुम् । ५. बहुल. सन्तोषस्याहरणं यस्याः सकाशात जनानाम् । उभयत्र सदशम् । ६. विश्वतोमुखोम् । परितो गोपुरवतीमित्यर्थः । पक्षे विश्वासयोग्याम् । ७. सकलप्राणिगणः परिचिताम् । सप्ताङ्गवद्भिः परिचिताम् वा । पक्षे द्वादशाङगधारिभिः परिचिताम् । ८. भारतीम् । ९. आत्मीयाम्।। ७५
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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