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________________ ५९२ आदिपुराणम् रराज राजकन्या सा राजहंसीव सुस्वना । दीक्षा शरमदीशीलपुलिनस्थलशायिनी ॥१६॥ सुन्दरी चात्तनिवेंदा तां ब्राह्मीमन्वदीक्षत । अन्ये चान्याश्च संविग्ना' गुरोः प्रावाजिपुस्तदा ॥१७॥ श्रुति कीर्तिमहाप्राज्ञो गृहीतोपासकव्रतः । देश संयमिनामासीद्धौरेयो गृहमेधिनाम् ॥१७॥ उपात्ताणुव्रता धीरा प्रयतात्मा प्रियव्रता । स्त्रीणां विशुद्धवृत्तीनां बभूवाग्रेसरो सती ॥१७९॥ विभोः कैवल्यसंप्राप्तिक्षण एव महर्द्धयः । योगिनोऽन्येऽपि भूयांसो बभूवुर्भुवनोत्तमाः ॥१८॥ संबुद्धोऽनन्तवीर्यश्च गुरोः संप्राप्तदीक्षणः । सुरैरवाप्तपूजर्द्धिरमयो मोक्षवतामभूत् ॥१८॥------ मरीचिवाः सर्वेऽपि तापसास्तपसि स्थिताः । महारकान्ते संबुदय महाप्रावाज्यमास्थिताः॥१८२॥ ततो भरतराजेन्द्रो गुरुं संपूज्य पुण्यधीः । स्वपुराभिमुखो जज्ञे चक्रपूजाकृतस्वरः ॥१८३॥ - युवा बाहुबली धीमानन्ये च भरतानुजाः । तमन्वीयुः कृतानन्दममिवन्य जगद्गुरुम् ॥१८॥ मालिनीवृत्तम् भरतपतिमथाविर्भूतदिग्यानुभावप्रसरमुदयरागं प्रत्युपात्ता मिमुख्यम् । विजयिनमनुजग्मुतिरस्तं दिनादौ दिनपमिव मयूखा विमुखाक्रान्त माजः ॥१८५॥ राजकन्या ब्राह्मी दीक्षारूपी शरद् ऋतुको नदीके शीलरूपी किनारेपर बैठी हुई और मधुर शब्द करती हुई हंसीके समान सुशोभित हो रही थी ॥१७६॥ वृषभदेवकी दूसरी पुत्री सुन्दरीको भी उस समय वैराग्य उत्पन्न हो गया था जिससे उसने भी ब्राह्मोके बाद दीक्षा धारण कर ली थी। इनके सिवाय उस समय और भी अनेक राजाओं तथा राजकन्याओंने संसारसे भयभीत होकर गुरुदेवके समीप दीक्षा धारण की थी ॥१७७॥ श्रुतकीर्ति नामके किसी अतिशय बुद्धिमान पुरुषने श्रावकके व्रत ग्रहण किये थे, और वह देश व्रतधारण करनेवाले गृहस्थोंमें सबसे श्रेष्ठ हुआ था ॥१७८। इसी प्रकार अतिशय धीर-वीर और पवित्र अन्तःकरणको धारण करनेवाली कोई प्रियत्रता नामकी सती स्त्री श्रावकके व्रत धारण कर, शुद्ध चारित्रको धारण करनेवाली स्त्रियोंमें सबसे श्रेष्ठ हुई थी॥१७९॥ जिस समय भगवानको केवलज्ञान उत्पन्न हुआ था उस समय और भी बहुत-से उत्तमोत्तम राजा लोग दीक्षित होकर बड़ी-बड़ी ऋद्धियोंको धारण करनेवाले मुनिराज हुए थे ॥१८०।। भरतके भाई अनन्तवीर्यने भी सम्बोध पाकर भगवानसे दीक्षा प्राप्त की थी, देवोंने भी उसकी पूजा की थी और वह इस अवसर्पिणी युगमें मोक्ष प्राप्त करनेके लिए सबमें अप्रगार्मी हुआ था। भावार्थ-इस युगमें अनन्तवीयने सबसे पहले मोक्ष प्राप्त किया था॥१८१॥ जो तपस्वी पहले भ्रष्ट हो गये थे उनमें-से मरीचिको छोड़कर बाकी सब तपस्वी लोग भगवान्के समीप सम्बोध पाकर तत्त्वोंका यथार्थ स्वरूप समझकर फिरसे दीक्षित हो तपस्या करने लगे थे ॥१८२॥ .. तदनन्तर जिन्हें चक्ररत्नकी पूजा करनेके लिए कुछ जल्दी हो रही है और जो पवित्र बुद्धिके धारक हैं ऐसे महाराज भरत जगद्गुरुकी पूजाकर अपने नगरके सम्मुख हुए। १८३॥ युवावस्थाको धारण करनेवाला बुद्धिमान बाहुबली तथा और भी भरतके छोटे भाई आनन्दके साथ जगद्गुरुकी वन्दना करके भरतके पीछे-पीछे वापस लौट रहे थे ॥१८४॥ अथानन्तर उस समय महाराज भरत ठीक सूर्यके समान जान पड़ते थे क्योंकि जिस प्रकार सूर्यके दिव्य प्रभावका प्रसार (फैलाव) प्रकट होता है, उसी प्रकार भरतके भी दिव्य-अलौकिक प्रभावका प्रसार प्रकट हो रहा था, सूर्य जिस प्रकार उदय होते समय राग अर्थात् लालिमा धारण १. बैराग्यपरायणाः। २. श्रुतकीर्तिनामा कश्चिच्छावकः । ३. देशतिनाम् । ४. पवित्रस्वरूपा । ५. प्रियव्रतसंज्ञका कापि स्त्री। ६ मोक्तुमिच्छावतामग्रेसरः। आदिनाथादिनामादो मुक्तोऽभूदित्यर्थः । ७. अभ्युदये रागो यस्य स तम्, पक्षे स्वोदये रागवन्तम् । ८. स्वीकृत । ९. दिनान्ते-ल० । १०.आक्रमणम् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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