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________________ बादिपुराणम् इत्यमीषा पदार्थानां याथात्म्यमविपर्ययात् । यः श्रदते स भव्यात्मा परं ब्रह्माधिगच्छति ॥१५॥ तस्वार्थसंग्रहं कृत्स्नमित्युक्त्वास्मै विदां वरः । कानिचित्तस्वबीजानि पुनरुद्देशतो जगौ ॥१५५॥ पुरुषं पुरुषार्थ च मार्ग मार्गफलं तथा । बन्ध मोक्षं तयोतुंबई मुक्तं च सोऽभ्यधात् ॥१५॥ त्रिजगत्समवस्थानं नरकास्तरानपि । वीपाब्धिहदशैलादीमप्यथास्मा युपाविशत् ॥१५॥ त्रिषष्टिपटलं स्वर्ग देवापुमोगविस्तरम् । ब्रह्मस्थानमपि श्रीमान् लोकनाडी च संजगौ ॥१५॥ तीशानां पुराणानि चक्रियामचक्रियाम् । तस्करयाणानि तदेतूनप्वाचल्यो जगद्गुरुः ॥१५९॥ गतिमागतिमुत्पत्ति व्यवनं शरीरिणाम् । भुक्तिमृदि तं चापि मगवान् व्याजहार सः ॥१६॥ मवनविष्यद्भूतं च यत्सर्व प्रयगोचरम् । तत्सर्व सर्ववित्सों मरतं प्रत्यबुधत् ॥१६॥ श्रुत्वेति तस्वसद्धावं गुरोः परमपूरुषात् । प्रहादं परमं प्रापे मरतो भक्तिनिर्भरः ॥१२॥ ततः सम्यक्स्वशुद्धिं च प्रतशुद्धिं च पुष्क लाम् । निष्कलाबरतो भेजे परमानन्दमुद्वहन् ॥१३॥ प्रबुद्धो मानसी शुदि परमां परमषितः । संप्राप्य भरतो रेजे शरदीवाम्बुजाकरः ॥१६॥ जो भव्य विपरीतता-रहित श्रद्धान करता है वह परब्रह्म अवस्थाको प्राप्त होता है ॥१५४॥ इस प्रकार ज्ञानवानोंमें अतिशय श्रेष्ठ भगवान् वृषभदेव भरतके लिए समस्त पदार्थोंके संग्रहका निरूपण कर फिर भी संक्षेपसे कुछ तत्त्वोंका स्वरूप कहने लगे ॥१५५॥ उन्होंने आत्मा, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चार पुरुषार्थ, मुनि तथा श्रावकोंका मार्ग, स्वर्ग और मोक्षरूप मार्गका फल, बन्ध और बन्धके कारण, मोक्ष और मोक्षके कारण, कर्मरूपी बन्धनसे बँधे हुए संसारी जीव और कर्मबन्धनसे रहित मुक्त जीव आदि विषयोंका निरूपण किया ॥१५६।। इसी प्रकार तीनों लोकोंका आकार, नरकोंके पटल, द्वीप, समुद्र, हद और कुलाचल आदिका भी स्वरूप भरतके लिए कहा ।।१५७॥ अनन्तचतुष्टयरूप लक्ष्मीके धारक भगवान् वृषभदेवने तिरसठ पटलोंसे युक्त स्वर्ग, देवोंके आयु और उनके भोगोंका विस्तार, मोक्षस्थान तथा लोकनाड़ीका भी वर्णन किया ॥१५८॥ जगद्गुरु भगवान् वृषभदेवने तीर्थकर चक्रवर्ती और अर्ध चक्रवर्तियोंके पुराण, तीर्थकरोंके कल्याणक और उनके हेतुस्वरूप सोलह कारण भावनाओंका भी निरूपण किया ॥१५९॥ भगवान्ने, अमुक जीव मरकर कहाँ-कहाँ पैदा होता है ? अमुक जीव कहाँ-कहाँसे आकर पैदा हो सकता है ? जीवोंकी उत्पत्ति, विनाश, भोगसामग्री, विभूतियाँ अथवा मुनियोंकी ऋद्धियाँ, तथा मनुष्योंके करने और न करने योग्य काम आदि सबका निरूपण किया था ॥१६०।। सबको जाननेवाले और सबका कल्याण करनेवाले भगवान वृषभदेवने भूत, भविष्यत् और वर्तमानकालसम्बन्धी सब द्रव्योंका सब स्वरूप भरतके लिए बतलाया था ॥१६१।। इस प्रकार जगद्गुरु-परमपुरुष भगवान् वृषभदेवसे तत्त्वोंका स्वरूप सुनकर भक्तिसे भरे हुए महाराज भरत परम आनन्दको प्राप्त हुए ॥१६२।। तदनन्तर परम आनन्दको धारण करते हुए भरतने निष्फल अर्थात् शरीरानुरागसे रहित भगवान् वृषभदेवसे सम्यग्दर्शनको शुद्धि और अणुव्रतोंकी परम विशुद्धिको प्राप्त किया।॥१६३।। जिस प्रकार शरदऋतुमें प्रबुद्ध अर्थात् खिला हुआ कमलोंका समूह सुशोभित होता है उसी प्रकार महाराज भरत परम भगवान् वृषभदेवसे प्रबुद्ध होकर-तत्त्वोंका ज्ञानप्राप्त कर मनकी परम विशुद्धिको प्राप्त हो १. नामोच्चारणमात्रतः । २. विन्यासम् । ३. पटलान् । ४. अस्मै भत्रे उपदेशं चकार । ५. मुक्तिस्थानम् । ६. व्युतिम् । ७. क्षेत्रम् । शतखण्डादिकं सुखादिकभुक्ति वा । ८. कार्यम् । ९. सम्पूर्णाम् । १०. शरीरबन्धरहितात् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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