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________________ चतुर्विंशतितम पर्व त्वं जिनः कामजिज्जेता स्वमर्हन्नरि हारहाः । धर्मध्वजो धर्मपतिः कर्मारातिनिशुम्भनः' ॥४०॥ त्वं ह भव्यान्जिनीबन्धुस्त्वं हवि भुक्त्वमवरः । स्वं मखाङ्ग मखज्येष्ठस्स्वं होता हग्यमेव च ॥४॥ 'यज्वाज्यं च त्वमिज्या च पुण्यो गण्यो गुणाकरः । स्वमपारि रपारश्च स्वममध्योऽपि मध्यमः ॥४२॥ उत्तमोऽनुत्तरो' ज्येष्ठो गरिष्टः स्थेष्ठ एव च । स्वमणीयान् महीयांच"स्थीयान् गरिमास्पदम् ॥ महान् महोयितो"मयो भूष्णुः स्थास्नु नश्वरः। जित्वरोऽनित्वरी'नित्यः शिवः शान्तो भवान्तकः स्वं हि ब्रह्मविदां ध्येयस्वं हि ब्रह्मपदेश्वरः । स्वां नाममालया देवमित्यमिष्टुमहे वयम् ॥१५॥ अष्टोत्तरशतं नाम्नामित्यनुध्याय चेतसा । स्वामीडे नोडमोडानां "प्रातिहार्याष्टकप्रभुम् ॥४६॥ तवायं प्रचलच्छाखस्तुकोऽशोकमहाधिपः । स्वच्छायासंश्रितान् पाति स्वत्तः शिक्षामिवाश्रितः ॥१७॥ अधर्मके शत्रु हैं,धर्मों में प्रथम धर्म हैं और धर्मके नायक हैं।॥३९|| आप जिन हैं, कामको जीतनेवाले हैं, अर्हन्त हैं-पूज्य हैं, मोहरूप शत्रुको नष्ट करनेवाले हैं, अन्तरायरहित हैं, धर्मकीध्वजा हैं, धर्मके अधिपति हैं, और कर्मरूपी शत्रुओंको नष्ट करनेवाले हैं ॥४०॥ आप भव्यजीवरूपी कमलिनियोंके लिए सूर्यके समान हैं, आप ही अग्नि हैं, यज्ञकुण्ड हैं, यज्ञके अंग हैं, श्रेष्ठ यज्ञ हैं, होम करनेवाले हैं और होम करने योग्य द्रव्य हैं ॥४१॥ आप ही यज्वा हैं-यज्ञ करनेवाले हैं, आज्य हैंघृतरूप हैं, पूजारूप हैं, अपरिमित पुण्यस्वरूप हैं, गुणोंकी खान हैं, शत्रुरहित हैं, पाररहित हैं, और मध्यरहित होकर भी मध्यम हैं । भावार्थ-भगवान् निश्चयनयकी अपेक्षा अनादि और अनन्त हैं जिसका आदि और अन्त नहीं होता उसका मध्य भी नहीं होता। इसलिए भगवान के लिए यहाँ कविने अमध्य अर्थात् मध्यरहित कहा है परन्तु साथ ही 'मध्यम' भी कहा है। कविकी इस उक्तिमें यहाँ विरोध आताहे परन्तु जब मध्यम शब्दका 'मध्ये मा अनन्तचतुष्टयलक्ष्मीर्यस्य सः-जिसके बीच में अनन्तचतुष्टयरूप लक्ष्मी है, ऐसाअर्थ किया जाता है तब वह विरोध दूर हो जाता है । यह विरोधाभास अलंकार है ॥४२॥ हे भगवन् , आप उत्तम होकर भी अनुत्तम हैं (परिहार पक्ष में 'नास्ति उत्तमो यस्मात्स:'-जिससे बढ़कर और दूसरा नहीं है) ज्येष्ठ हैं, सबसे बड़े गुरु हैं, अत्यन्त स्थिर हैं, अत्यन्त सूक्ष्म हैं, अत्यन्त बड़े हैं, अत्यन्त स्थूल हैं और गौरवके स्थान हैं ॥४॥ आप बड़े हैं, क्षमा गुणसे पृथिवीके समान आचरण करनेवाले हैं, पूज्य हैं, भवनशील (समर्थ ) हैं, स्थिर स्वभाववाले हैं, अविनाशी हैं, विजयशील हैं, अचल है, नित्य हैं, शिव, शान्त हैं, और संसारका अन्त करनेवाले हैं ॥४४॥ हे देव, आप ब्रह्मविद् अर्थात् आत्मस्वरूपके जाननेवालोंके ध्येय हैं-ध्यान करने योग्य हैं और ब्रह्माबाद-आत्माकी शुद्ध पर्यायके ईश्वर है। इस प्रकार हम लोग अनेक नामोंसे आपकी स्तुति करते हैं ॥४५॥ हे भगवन् , इस प्रकार आपके एक सौ आठ नामोंका हृदयसे स्मरण कर मैं आठ प्रातिहार्योंके स्वामी तथा स्तुतियोंके स्थानभूत आपकी स्तुति करता हूँ ॥४६॥ हे भगवन् , जिसकी शाखाएँ अत्यन्त चलायमान हो रही हैं ऐसा यह ऊँचा अशोक महावृक्ष अपनी १. अरोन् हन्तीति अरिहा । २. रहस्यरहितः । 'रहःशब्देनान्तरायो भण्यते' 'विरहितरहस्कृतेभ्यः' इत्यत्र तथा व्याख्यानात् । ३. घातकः । ४. पादपूरणे । हि-०, स०, ल०, म०, ५०, अ०, इ. ५. वह्निः। ६. यागः । ७. यजनकारणम् । ८. होतव्यद्रव्यम् । ९.पूजकः। १०. अपगतारिः । ११. न विद्यते उत्तरः श्रेष्ठो यस्मात् । १२. अतिशयेन गुरुः । १३. अतिशयेन स्थिरः । १४. अतिशयेन अणुः । १५. अतिशयेन महान् । १६. अतिशयेन स्थूलः । १७. क्षमया महीवाचरितः । १८. पूज्यः । १९. स्थिरतरः । २०. जयशीलः । २१. गमनशीलतारहितः । २२. शिवं सुखमस्यातीति । २३. बारमशालिनाम् । २४. स्तुतीनाम् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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