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________________ त्रयोविंशं पर्व स किल विनृत्यति गायति वल्गत्यपलापति प्रहसत्यपि मूढः । मदनवशो जितमन्मथ ते तु प्रशमसुखं वपुरेव निराह ॥ १३० ॥ नवमालिनीवृत्तम् बिरहितमानमत्सर तवेदं वपुरपराग मस्तक लिपङ्कम् । तव भुवनेश्वरत्वमपरागं प्रकटयति स्फुटं निकृतिहीनम् ॥ १३१ ॥ तब वपुरामिलस्लकलशोमासमुदयमस्तवस्त्रमपि रम्यम् । अतिरुचिरस्य रत्नमणिराशेरपवरणं किमिष्टमुरुदीप्तेः ॥१३२॥ "स्विदिरहितं विहीनमलदोषं सुरभितरं सुलक्ष्मघटितं ते । 'क्षत अवियुक्रमस्त तिमिरौघं व्यपगतधातु वज्रधन संधि ॥१३३॥ समचतुरख मप्रमितवीर्य प्रियहितवाग्निमेषपरिहीनम् । वपुरिदमच्छदिव्यमणिदीप्रं स्वमसि ततोऽधि देवपदमागी ॥ १३४ ॥ इदमतिमानुषं तव शरीरं सकलविकार मोहमदहीनम् । प्रकटयतीश ते भुवनलङ्घि "प्रभुतम वैभवं कनककान्ति ॥१३५॥ प्रमुदितवदनावृत्तम् स्पृशति नहि भवन्तमागश्व यः किमु दिनपमभिद्रवेत्तामसम् । वितिमिर"" समवान् जगत्साधने " ज्वकदुरुमहसा प्रदीपायते ॥१३६॥ ५५९ हे कामदेवको जीतनेवाले जिनेन्द्र, जो मूर्ख पुरुष कामदेवके वश हुआ करता है वह नाचता है, गाता है, इधर-उधर घूमता है, सत्य बातको छिपाता है और जोर-जोर से हँसता है परन्तु आपका शरीर इन सब विकारोंसे रहित है इसलिए यह शरीर ही आपके शान्तिसुखको प्रकट कर रहा है ।। १३०|| हे मान और मात्सर्यभावसे रहित भगवन्, कर्मरूपी धूलिसे रहित, कलहरूपी पंकको नष्ट करनेवाला, रागरहित और छलरहित आपका वह शरीर 'आप तीनों लोकोंके स्वामी हैं' इस बातको स्पष्टरूपसे प्रकट कर रहा है || १३१ || हे नाथ, जिसमें समस्त शोभाओं का समुदाय मिल रहा है ऐसा यह आपका शरीर वस्त्ररहित होनेपर भी अत्यन्त सुन्दर है सो ठीक ही है क्योंकि विशाल कान्तिको धारण करनेवाले अतिशय देदीप्यमान रत्नमनियोंको राशिको वस्त्र आदिसे ढक देना क्या किसीको अच्छा लगता है ? अर्थात् नहीं लगता ॥१३२॥ हे भगवन्, आपका यह शरीर पसीनासे रहित है, मलरूपी दोषोंसे रहित है, अत्यन्त सुगन्धित है, उत्तम लक्षणोंसे सहित है, रक्तरहित है, अन्धकारके समूहको नष्ट करनेवाला है, धातुरहित है, वज्रमयी मजबूत सन्धियोंसे युक्त है, समचतुरससंस्थानवाला है, अपरिमित शक्तिका धारक है, भिम और हितकारी वचनोंसे सहित है, निमेषरहित है, और स्वच्छ दिव्य मणियोंके समान देदीप्यमान है इसलिए आप देवाधिदेव पदको प्राप्त हुए है ॥१३३-२३४॥ हे स्वामिन्, समस्त विकार, मोह और मदसे रहित तथा सुवर्णके समान कान्तिवाला आपका यह लोकोत्तर शरीर संसारको उल्लंघन करनेवाली आपकी अद्वितीय प्रभुताके वैभवको प्रकट कर रहा है || १३५|| हे अन्धकारसे रहित जिनेन्द्र, पापोंका समूह कभी आपको छूता भी नहीं है सो ठीक ही है क्योंकि क्या अन्धकारका समूह भी कभी १. अपलापं करोति । २. नितरामाह । ३. न विद्यते परागो धूलियंत्र अपगतरजसमित्यर्थः । ४. कपट । ५: मायुजत् । ६. आच्छादनम् । ७. स्वेद । ८. रुधिररहितम् । ९. निविड । १०. अधिक । ११. अतिशयप्रयो । १२. बघसमूहः । १३. 'तपनमभि' इति वा पाठः इति 'त' पुस्तके टिप्पण्यां लिखितम् । १४. गच्छेत् । १५. भो विगताज्ञानान्धकार । १६. पूज्यः । १७. जगत्संसिद्धो । 'जगत्सदने' अ०, प०, छन्दोभङ्गादशुद्धः पाठः । जगत्सद्मनि इ० ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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