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________________ ५५७ त्रयोविंशं पर्व प्रमिताक्षरावृत्तम् जिननाथसंस्तवकृतौ भवतो वयमुखताः स्म गुणरबनिधेः । विधियोऽपि मन्दवचसोऽपि ननु स्वयि मक्तिरेव फलतीएफलम् ॥१७॥ मतिशक्तिसारकृतवाग्विमवस्वयि मक्किमेव वयमातनुमः । अमृताम्बुधेर्जलमलं न पुमानिखिलं प्रपातुमिति नि पिवेत् ॥११॥ क्व वयं जगः क्व च गुणाम्बुनिभिस्तव देव पाररहितः परमः । इति जानतोऽपि जिन सम्प्रति नस्त्वयि मक्तिरेव मुखरीकुरुते ॥१९॥ गणभृशिरप्यगविताननणूस्तव सद्गुणान्धयमभीष्टुमहे । किस चित्रमेतदथवा प्रभुतां तव संश्रितः किमिव मेशिशिषुः ॥१०॥ द्रुतविलम्बितवृत्तम् तदियमोडिविषन् विदधाति नस्त्वयि निरूढतरा जिननिश्चला। प्रसूतभक्तिरपारगुणोदया स्तुतिपयेऽय ततो वयमुचताः ॥१२॥ स्वमसि विश्वरगीश्वर विश्वसृट् स्वमसि विश्वगुणाम्बुधिरक्षयः । स्वमसि देव जगडितकासनः स्तुतिमतोऽनुगृहाण जिनेश नः ॥२२॥ स्तुति करने लगे ॥११६।। कि हे जिननाथ, वह निश्चय है कि आपके विषयों की हुई भक्ति ही इष्ट फल देती है इसीलिए हम लोग बुद्धिहीन तथा मन्दवचन होकर भी गुणरूपी रनोंके खजानेस्वरूप आपकी स्तुति करनेके लिए उद्यत हो रहे हैं ।। ११७ ।। हे भगवन् , जिन्हें बुद्धिकी सामर्थ्यसे कुछ वचनोंका वैभव प्राप्त हुआ है ऐसे हम लोग केवल आपकी भक्ति ही कर रहे हैं सो ठीक ही है क्योंकि जो पुरुष अमृतके समुद्रका सम्पूर्ण जल पीनेके लिए समर्थ नहीं है वह क्या अपनी सामर्थ्यके अनुसार थोड़ा भी नहीं पीये ? अर्थात् अवश्य पीये ॥ ११८॥हे देव, कहाँ तो जड़ बुद्धि हम लोग, और कहाँ आपका पापरहित बड़ा भारी गुणल्पी समुद्रोजिनल समुद्र। हेजिनेन्द्र थापि इस बातकोहम लोग भी जानते हैं तथापि इस समय आपकी भक्ति ही हम लोगोंको वाचालित कर रही है।॥११॥ हे देव, यह आश्चर्यकी बात है कि आपके जो बड़े-बड़े उत्तम गुण गणधरोंके द्वारा भी नहीं गिने जा सके हैं उनकी हम स्तुति कर रहे हैं अथवा इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं है क्योंकि जो मनुष्य आपकी प्रभुताको प्राप्त हुआ है वह क्या करनेके लिए समर्थ नहीं है ? अर्थात् सब कुछ करने में समर्थ है ।। १२० ॥ इसलिए हे जिनेन्द्र, आपके विषयमें उत्पन्न हुई अतिशय निगूद, निश्चल और अपरिमित गुणोंका उदय करनेवाली विशाल भक्ति ही हम लोगोंको स्तुति करनेके लिए इच्छुक कर रही है और इसीलिए हम लोग आज आपकी स्तुति करनेके लिए उद्यत हुए हैं ।।१२।। हे ईश्वर, आप समस्त संसारके जाननेवाले हैं, कर्मभूमिरूप संसारकी रचना करनेवाले हैं, समस्त गुणोंके समुद्र हैं, अविनाशी हैं, और हे देव, आपका उपदेश जगत्के समस्त जीवोंका हित करनेवाला है, इसीलिए हे जिनेन्द्र, आप हम सबकी स्तुतिको स्वीकृत १. विगतमतयः । २. मतिशक्त्यनुसार । ३. अन्तरहितः । ४. जानम्तीति जानन्तः तान् । ५. अस्मान् । ६. भृशं समर्था अभूवन् । ७. ईडितुमिच्छन् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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