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________________ द्वाविंशं पर्व पद्मध्वजेषु पद्मानि सहस्रदलसंस्तरैः ममःसरसि फुल्लानि सरोजानीव रेजिरे ॥२२५॥ अधः प्रतिमयो तानि संक्रान्तानि महीतले । भ्रमरान् मोहयन्ति स्म पद्मबुद्ध यानुपातिनः ॥२२६॥ तेषां तदातनी शोभा दृष्ट्वा नान्यत्र भाविनीम् । कनान्युत्सृज्य कारस्न्येन कक्ष्मोस्तेषु पदं दधे ॥२२७॥ हंसध्वजेष्व मुहंसाश्चम्चा प्रसितवाससः । निजां प्रस्तारयन्तो वा दम्यलेश्यां तदात्मना ॥२२८॥ गरुत्मध्वजदण्डाग्राण्यध्यासीना विनायकाः रेजुः स्वः पक्षविभेपैलिड्पयिषवो नु खम् ।।२२९॥ बभुर्नीलमणिक्ष्मास्था गरुडाः"प्रतिमागताः । समाक्रप्टुमिवाहीन्द्रान् प्रविशन्तो रसातलम् ॥२३०॥ मृगेन्द्र केतनाग्रेषु मृगेन्द्राः क्रमदित्सबा । कृतयना विरेजुस्ते जेतुं वा सुरसामजान् ॥२३॥ स्थूलमुक्ताफलान्येषां मुखकम्बोनि रजिरे । गजेन्द्रकुम्भसंभेदात् सचितानि यशांसि वा ॥२३२॥ "उक्षाः शृङ्गाप्रसंसक्तलम्बमानध्वजांशुकाः । रेजुर्विपक्षजित्ये।"संलग्धजयकेतनाः ॥२३३॥ उत्पुष्करैः करैरून वजा रेजुर्गजाधिपाः । गिरीन्द्रा इब कूटाग्रनिपतत्पूथुनिराः ॥२३४॥ .. साँपकी काँचली ही निगल रहे हों ।।२२१|| कमलोंके चिह्नवाली ध्वजाओमें जो कमल बने हुए थे वे अपने एक हजार दलोंके विस्तारसे ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो आकाशरूपी सरोवरमें कमल ही फल-रहे हों॥२२५।। रत्नमयी पृथ्वीपर उन ध्वजाओंमें बने हुए कमलोंके जो प्रतिविम्ब पड़ रहे थे वे कमल समझकर उनपर पड़ते हुए भ्रमरोंको भ्रम उत्पन्न करते थे ।२२६।। उन कमलोंकी दूसरी जगह नहीं पायी जानेवाली उस समयकी शोभा देखकर लक्ष्मीने अन्य समस्त कमलोंको छोड़ दिया था और उन्हीमें अपने रहनेका स्थान बनाया था। भावार्थ-वे कमल बहुत ही सुन्दर थे इसलिए ऐसे जान पड़ते थे मानो लक्ष्मी अन्य सब कमलोंको छोड़कर उन्हीं में रहने लगी हो।।२२७॥ हंसोंकी चिलवाली ध्वजाओंमें जो हंसोंके चिह्न बने हुए थे वे अपने चोंचसे वस्त्रको प्रस रहे थे और ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो उसके बहाने अपनी द्रव्यलेश्याका ही प्रसार कर रहे हों ।।२२८।। जिन ध्वजाओंमें गरुड़ोंके चिह्न बने हुए थे उनके दण्डोंके अग्रभागपर बैठे हुए गरुड़ अपने पंखोंके विक्षेपसे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो आकाशको ही उल्लंघन करना चाहते हों ।।२२९।। नीलमणिमयी पृथ्वीमें सन गरूड़ोंके जो प्रतिबिम्ब पड़ रहे थे उनसे वे ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो नागेन्द्रोंको खीचने लिए पाताललोकमें ही प्रवेश कर रहे हों ।।२३०॥ सिंहोंके चिहवाली ध्वजाओंके अग्रभागपर जो सिंह बने हुए थे वे छलांग भरनेकी इच्छासे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो देवोंके हाथियोंको जीतने के लिए ही प्रबल कर रहे हैं ।।२३१॥ उन सिंहोंके मुखोपर जो बड़ेबड़े मोती लटक रहे थे वे ऐसे जान पड़ते थेमानो बड़े-बड़े हाथियोंके मस्तक विदारण करनेसे इकट्ठे हुए यश ही लटक रहे-होरिश्ता बैलोंको चिहवाली ध्वजाओंमें, जिनके सींगोंके अग्रभागमें ध्वजाओंके वस्त्र लटक रहे हैं ऐसे बैल बने हुए थे और वे ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो शत्रुओंको जीत लेनेसे उन्हें विजयपताका ही प्राप्त हुई हो ॥२३।। हाथीको चिह्नवाली ध्वजाओंपर जो हाथी बने हुए थे वे अपनी ऊँची उठी हुई सूड़ोंसे पताकाएँ धारण कर रहे थे और उनसे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो जिनके शिखरके अग्रभागसे बड़े-बड़े निझरने पड़े रहे हैं. ऐसे बड़े पर्वत ही हों ।।२३४॥ और चक्रोंके चिहवाली ध्वजाओंमें जो चक्र बने १. समूहः । २. प्रतिविम्बेन । ३. अनुगच्छतः। ४. पद्मध्वजानाम् । ५. सत्कालभवाम् । ६.बभुः । ७. त्रोट्या। ८. प्रसारयन्तो ल०। ९. वीनां नायकाः गरुडा इत्यर्थः । १..इव। ११. प्रतिविम्बेनागताः । १२. पादविक्षेपेच्छया । १३. इव । १४. षाः १०, अ०, ल., द०, इ० । १५. जयेन । १६. वृत।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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