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________________ M ... आदिपुराणम् 'वीच्यन्तवलितोद्वृत्तशफरीकुलसंकुला । सा प्रायोऽभ्यस्थमानेव नाकस्त्रीनेत्रविभ्रमान् ॥११६॥ नूनं सुराङ्गनानेत्रविलासैस्ताः पराजिताः । 'शफर्यो बीचिमालासु हियेवान्त धुर्मुहुः ॥७n तदभ्यन्तरभूमागं पर्यष्कृत लतावनम् । वल्लीगुल्मनुमोद्भूतसर्वर्तुकुसुमाचितम् ॥१८॥ पुष्पवस्त्यो व्यराजन्त यत्र पुष्पस्मितोज्ज्वलाः । स्मितलीलां नारीणां नाटयन्त्य इव स्फुटम् ॥११९॥ भ्रमरमम्जुगुम्जभिरावृतान्ता विरेजिरे । यत्रानिकपटानविप्रहा इव वीरुधः ।।१२०॥ अशोकलतिका यत्र दधुराताम्रपल्लवान् । स्पर्धमाना इवातान्नेरप्सरवरपरकः ॥१२॥ यत्र मन्दानिलोधूत किम्जल्का स्तरमम्बरम् । धत्ते स्म पटवासामा पिम्ञरीकृतविमुखाम् ॥१२२॥ प्रतिप्रसवमासोनम गुञ्जन्मधुनतम् । विडम्बयदिवाभाति "यरसहस्राक्षविभ्रमम् ॥१२३॥ सुमनोमन्जरीपुजात् किजल्कं सान्द्रमाहरन् । यत्र गन्धवहो मन्दं वाति स्मान्दोलयस्लताः ॥२४॥ यत्र क्रीडादयो रम्याः सशय्याश्च लतालयाः । धूतये स्म सुरस्त्रीणां कल्पन्ते शिशिरानिलाः ॥१२५॥ त्सवमें सन्तोषसे नृत्य ही कर रही हो ॥११५।। लहरोंके भीतर घूमते-घूमते जब कभी ऊपर प्रकट होनेवाली मछलियोंके समूहसे भरी हुई वह परिखा ऐसी जान पड़ती थी मानो देवांगनाओंके नेत्रोंके विलासों (कटाक्षों) का अभ्यास ही कर रही हो ॥११६।। जो मछलियाँ उस परिखाकी लहरोंके बीचमें बार-बार दूब रही थीं वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो देवांगनाओंके नेत्रोंके विलासोंसे पराजित होकर ही लज्जावश लहरोंमें छिप रही थीं ॥११७। उस परिखाके भीतरी भू-भागको एक लतावन घेरे हुए था, वह लतावन लताओं; छोटी-छोटी झाड़ियों और वृक्षों में उत्पन्न हुए सब ऋतुओंके फूलोंसे सुशोभित हो रहा था ॥११८। उस लतावनमें पुष्परूपी हास्यसे उज्ज्वल अनेक पुष्पलताएँ सुशोभित हो रही थीं जो कि स्पष्टरूपसे ऐसी जान पड़ती थीं मानो देवांगनाओंके मन्द हास्यका अनुकरण ही कर रही हों ॥११॥ मनोहर गुंजार करते हुए भ्रमरोंसे जिनका अन्त भाग ढका हुआ है ऐसी उस वनको लताएँ इस भाँति सुशोभित हो रही थीं मानो उन्होंने अपना शरीर नील वस्त्रसे ही ढक लिया हो ॥१२०।। उस लतावनकी अशोक लताएँ लाल-लाल नये पते धारण कर रही थीं। और उनसे वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो अप्सराओंके लाल-लाल हाथरूपी पल्लवोंके साथ स्पर्धा ही कर रही हों ॥१२१॥ मन्द-मन्द वायुके द्वारा उड़ी हुई केशरसे व्याप्त हुआ और जिसने समस्त दिशाएँ पीली-पीली कर दी है ऐसा वहाँका आकाश सुगन्धित चूर्ण (अथवा चँदो)की शोभा धारण कर रहा था ।। १२२ ।। उस लतावनमें प्रत्येक फूलपर मधुर शब्द करते हुए भ्रमर बैठे हुए थे जिनसे वह ऐसा जान पड़ता था मानो हजार नेत्रोंको धारण करनेवाले इन्द्र के विलासकी विडम्बना ही कर रहा हो ॥ १२३ ॥ फूलोंकी मंजरियोंके समूहसे सघन परागको ग्रहण करता हुआ और लताओंको हिलाता हुआ वायु उस लतावनमें धीरे-धीरे बह रहा था ॥ १२४ ॥ उस लतावनमें बने हुए मनोहर क्रीड़ा पर्वत, शय्याओंसे सुशोभित लतागृह और ठण्डी-ठण्डी हवा देवांगनाओंको १. वीचिमध्ये वक्रेण वलितोद्वात । २. मत्स्याः । ३. तिरोभूताः । ४. खातिकाभ्यन्तर । ५. अलंकरोति स्म । ६. कुसुमाञ्चितम् ल०, म०। ७. पर्यन्त । ८.-दृतैः किम्जकस्ततमम्बरम् द०,५०, म., स.। ९. केसरव्याप्तम् । १०. शोभाम् । ११. लतावनम् । १२. समर्था भवन्ति ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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