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________________ ४९४ आदिपुराणम् 'कृतावतारमुद्बोधयानपात्रैमहर्दिमिः । गणाधीशमहा सार्थवाहश्चारित्रकेतनैः ॥१०॥ उनयोपनयसंपातमहावातविर्णितम् । रत्नत्रयमयी पैरवगाढमनेकधा ॥१८॥ श्रुतस्कन्धमहासिन्धुमवगाह्म महामुनिः । ध्यायेत् पृथक्त्वसत्तर्कवीचारं ध्यानमप्रिमम् ॥१८२॥ प्रशान्तक्षीणमोहेषु श्रेण्योः शेषगुणेषु च। यथाम्नायमिदं ध्यानमामनन्ति मनीषिणः ॥१८३॥ द्वितीयमाधवज्ज्ञेयं विशेषस्त्वेकयोगिनः । प्रक्षीणमोहनीयस्य पूर्वज्ञस्यामितयुतेः ॥१८॥ सवितर्कमवीचारमेकत्वं ध्यानमर्जितम् । ध्यायत्यस्तकषायोऽसौ घातिकर्माणि शातयन् ॥१८५॥ फलमस्य भवेद् घातित्रितयप्रक्षयोद्भवम् । कैवश्यं प्रमिताशेषपदार्थ ज्योतिरक्षणम् ॥१८६॥ ततः पूर्वविदामाघे शुक्ले श्रेण्योर्यथायथम् । विज्ञेये त्र्येकयोगाना 'यथोक्तफलयोगिनी ॥१८॥ जो पूर्वपक्ष करने के लिए आये हुए अनेक परमतरूपी जलजन्तुओंसे भरा हुआ है, बड़ी-बड़ी सिद्धियोंके धारण करनेवाले गणधरदेवरूपी मुख्य व्यापारियोंने चारित्ररूपी पताकाओंसे सुशोभित सम्यग्ज्ञानरूपी जहाजोंके द्वारा जिसमें अवतरण किया है, जो नय और उपनयोंके वर्णनरूप महावायुसे क्षोभित हो रहा है और जो रत्नत्रयरूपी अनेक प्रकारके द्वीपोंसे भरा हुआ है, ऐसे श्रुतस्कन्धरूपी महासागरमें अवगाहन कर, महामुनि पृथक्त्ववितर्कवीचार नामके पहले शुक्लध्यानका चिन्तवन करे। भावार्थ-ग्यारह अंग और चौदह पूर्वके जाननेवाले मुनिराज ही प्रथम शुक्लध्यानको धारण कर सकते हैं ॥१७८-१८२॥ यह ध्यान प्रशान्तमोह अर्थात् ग्यारहवें गुणस्थान, झोणमोह अर्थात् बारहवें गुणस्थान और उपशमक तथा क्षपक इन दोनों प्रकारकी श्रेणियोंके शेष आठवें, नौवें तथा दसवें गुणस्थानमें भी हीनाधिक रूपसे होता है ऐसा बुद्धिमान महर्षि लोग मानते हैं ।।१८३।। दूसरा एकत्ववितर्क नामका शुक्लध्यान भी पहले शुक्लध्यानके समान ही जानना चाहिए किन्तु विशेषता इतनी है कि जिसका मोहनीय कर्म नष्ट हो गया हो, जो पूर्वोका जाननेवाला हो, जिसका आत्मतेज अपरिमित हो और जो तीन योगोंमें-से किसी एक योगका धारण करनेवाला हो ऐसे महामुनिका ही यह दूसरा शुक्लध्यान होता है ।।१८४॥ जिसकी कषाय नष्ट हो चुकी है और जो घातिया कर्मोको नष्ट कर रहा है ऐसा मुनि सवितर्क अर्थात् श्रुतज्ञानसहित और अवीचार अर्थात् अर्थ व्यंजन तथा योगोंके संक्रमणसे रहित दूसरे एकत्ववितर्क नामके बलिष्ठ शुक्लध्यानका चिन्तवन करता है ।।१८५॥ ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय इन तीन घातिया कर्मोके क्षयसे उत्पन्न होनेवाला तथा समस्त पदार्थोंको जाननेवाला अविनाशीक ज्योतिःस्वरूप केवलज्ञानका उत्पन्न होना ही इस शुक्लध्यानका फल है ॥१८६।। इस प्रकार ऊपर कहे अनुसार फलको देनेवाले पहलेके दोनों शुक्लध्यान ग्यारह अंग तथा चौदह पूर्वके जाननेवाले और तीन तथा तीनमें से किसी एक योगका अवलम्बन करनेवाले मुनियोंके दोनों प्रकारको श्रेणियों में यथायोग्य रूपसे होते हैं । भावार्थ-पहला शुक्लध्यान उपशम अथवा क्षपक दोनों ही श्रेणियों में होता है परन्तु दूसरा शुक्लध्यान क्षीणमोह नामक बारहवें गुणस्थानमें ही होता है । पहला शुक्लध्यान तीनों योगोंको धारण करनेवालेके होता है परन्तु दूसरा शुक्लध्यान एक योगको धारण करनेवालेके ही होता है, भले ही १. अवतरणम् । २. महासार्थवाहो बहच्छष्ठी एषां महासार्थवाहास्तैः। ३. नयद्रव्याथिकपर्यायाथिक । उपनय नगमादि । संपात संप्राप्ति । ४. बडवाग्निनिवासकुण्डैः । ५. प्रथमम् । ६. अपूर्वकरणानिवृत्तिकरणसूक्ष्मसाम्परायेषु । ७. मनोवाक्कायेष्वेकत्वमयोगतः । ८. पूर्वश्रुतवेदिनः । ९. उपमारहिततेजसः । १०.-मेकत्वध्यान-अ०, १०, स०, इ०, ल०, म०। ११. निपातयन् । १२. त्रियोगानामेकयोगानाम् । पुंसामित्यर्थः । १३. पूर्वोक्तफलस्थयोगो ययोस्ते ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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