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________________ एकविंशं पर्व एकत्वेन वितर्कस्य स्याद् यत्राविचरिष्णुता । सवितर्कमवीचारमेकस्वादिपदाभिधाम् ॥१७॥ पृथक्त्वं विद्धि नानास्वं वितर्कः श्रुतमुच्यते । अर्थग्यम्जनयोगानां वीचारः संक्रमो मतः ॥१७२॥ अर्थादर्यान्तरं गच्छन् ग्यम्जनाद् व्यम्जनान्तरम् । योगायोगान्तरं गच्छन् ध्यायतीदं वशी मुनिः॥१७३॥ "त्रियोगः पूर्वविद् यस्माद् ध्यायत्येन मुनीश्वरः । सवितर्क सबीचारमतः स्याच्छुक्लमादिमम् ॥१७॥ ध्येयमस्य श्रुतस्कन्धवाधेर्वागर्थविस्तरः । फलं स्यान्मोहनीयस्य प्रक्षयः प्रशमोऽपि वा ॥१५॥ इदमत्र तु तात्पर्य श्रुतस्कन्धमहार्णवात् । अर्थमेकं समादाय ध्यायनान्तरं ब्रजेत् ॥१७६॥ शब्दाच्छब्दान्तरं यायाद् योग योगान्तरादपि । सवीचारमिदं तस्मात् सवितकं च लक्ष्यते ॥१७७॥ वागर्थरत्नसंपूर्ण नये मङ्गतरङ्गकम् । प्रसृत धानगम्भीर "पदवाक्यमहाजलम् ॥१७॥ १७उत्पादादित्रयोद्वेलं सप्तमजीबृहद्ध्वनिम् । पूर्वपक्षवशायातमतयादःकुलाकुलम् ॥१७९॥ हैं ॥१७०।। जिस ध्यानमें वितर्कके एकरूप होनेके कारण वीचार नहीं होता अर्थात् जिसमें अर्थ व्यंजन और योगोंका संक्रमण नहीं होता उसे एकत्ववितर्कवीचार नामका शुक्लध्यान कहते हैं ॥१७॥ अनेक प्रकारताको प्रथक्त्व समझो, श्रत अर्थात शास्त्रको वितर्क कहते हैं और अर्थ व्यंजन तथा योगोंका संक्रमण (परिवर्तन ) वीचार माना गया है ॥१७२।। इन्द्रियोंको वश करनेवाला मुनि, एक अर्थसे दूसरे अर्थको, एक शब्दसे दूसरे शब्दको और एक योगसे दूसरे योगको प्राप्त होता हुआ इस पहले पृथक्त्ववितर्कवीचार नामके शुक्लध्यानका चिन्तवन करता है ।।१७।। क्योंकि मन, वचन, काय इन तीनों योगोंको धारण करनेवाले और चौद्रह पूर्वोके जाननेवाले मुनिराज ही इस पहले शुक्लध्यानका चिन्तवन करते हैं इसलिए ही यह पहला शक्लध्यान सवितर्क और सवीचार कहा जाता है ।।१७४|| श्रुतस्कन्धरूपी समुद्रके शब्द और अर्थोंका जितना विस्तार है वह सब इस प्रथम शुक्लध्यानका ध्येय अर्थात् ध्यान करने योग्य विषय है और मोहनीय कर्मका क्षय अथवा उपशम होना इसका फल है । भावार्थयह शुक्लध्यान उपशमश्रेणी और अपकश्रेणी दोनों प्रकारकी श्रेणियोंमें होता है। उपशमश्रेणीवाला मुनि इस ध्यानके प्रभावसे मोहनीय कर्मका उपशम करता है और क्षपक श्रेणीमें आरूढ हुआ मुनि इस ध्यानके प्रतापसे मोहनीय कर्मका भय करता है इसलिए सामान्य रूपसे उपशम और क्षय दोनों ही इस ध्यानके फल कहे गये हैं ॥१७५।। यहाँ ऐसा तात्पर्य समझना चाहिए कि भ्यान करनेवाला मुनि श्रुतस्कन्धरूपी महासमुद्रसे कोई एक पदार्थ लेकर उसका ध्यान करता हुआ किसी दूसरे पदार्थको प्राप्त हो जाता है अर्थात् पहले ग्रहण किये हुए पदार्थको छोड़कर दूसरे पदार्थका ध्यान करने लगता है। एक शब्दसे दूसरे शब्दको प्राप्त हो जाता है और इसी प्रकार एक योगसे दूसरे योगको प्राप्त हो जाता है इसीलिए इस ध्यानको सवीचार और सवितर्क कहते हैं ।।१७६-१७७।। जो शब्द और अर्थरूपी रत्नोंसे भरा हुआ है, जिसमें अनेक नयभंगरूपी तरंगें उठ रही हैं, जो विस्तृत ध्यानसे गम्भीर है, जो पद और वाक्यरूपी अगाध जलसे सहित है, जो उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यके द्वारा उद्वेल (ज्वार-भाटाओंसे सहित) हो रहा है, स्यात् अस्ति, स्यात् नास्ति आदि सप्त भंग ही जिसके विशाल शब्द (गर्जना) हैं, १. अविचारशीलता। २. व्यक्ति । ३. मनोवाक्कायकर्म । ४. शब्दाच्छब्दान्तरम् । ५. मनोवाक्कायकर्मवान् । ६. पूर्वश्रुतवेदी। ७. शुक्लध्यानम् । -त्येतन्मुनीश्वराः द०। ८. गच्छेत् । ९. शब्द । १०. नयविकल्प। ११. ऋषिगणमुखप्रसृतशब्देन गम्भीरम् । प्रसृतध्यान-ल०, म०। १२. 'वर्णसमुदायः पदम्' । 'पदकदम्बकं वाक्यम्' । १३. उत्पादव्ययध्रौव्यत्रय-।१४. बौदादिमतजलचरसमूह ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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