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________________ एकविंशं प ईर्यादि विषया यस्ना मनोवाक्कायगुप्तयः । परोषहसहिष्णुस्वमिति चारित्रभावनाः ॥ ९८ ॥ विषयेष्वनभिष्वंगः कायतत्त्वानुचिन्तनम् । जगत्स्वभावचिन्त्येति वैराग्यस्थैर्य मावनाः ॥ ९९ ॥ एवं भावयतो ह्यस्य ज्ञान चर्यादिसंपदि । तत्वज्ञस्य विरागस्य भवेदन्यप्रता धियः ॥ १०० ॥ स चतुर्दश पूर्वज्ञो दशपूर्वधरोऽपि वा । नवपूर्वधरो वा स्याद् ध्याता सम्पूर्णलक्षणः ॥ १०१ ॥ श्रुतेन विकलेनापि स्याद् ध्याता मुनिसत्तमः । प्रबुद्धधीरधः श्रेण्या धर्मध्यानस्य सुश्रुतः ॥ १०२ ॥ स एवं लक्षणो ध्याता सामग्रीं प्राप्य पुष्कलाम् । क्षपकोपशमश्रेण्योरुत्कृष्टं ध्यानमृच्छति ॥१०३॥ भांचसंहननेनैव क्षपकश्रेण्य भिश्रितः । त्रिभिराद्यैर्भजेच्छू बीमितरां श्रुततरववित् ॥ १०४ ॥ “किंचिद्दृष्टिमुपावर्त्य ं बहिरर्थकदम्बकात् । स्मृतिमात्मनि संधाय ध्यायेदध्यात्मविन्मुनिः ॥१०५॥ हृषीकाणि तदर्थेभ्यः ं प्रत्याहृत्य ततो मनः । संहृत्य " धियमध्यप्रां धारयेद् ध्येयवस्तुनि ॥ १०६॥ ध्येयमध्यात्मतस्वं स्यात् पुरुषार्थोंपयोगि यत् । पुरुषार्थश्च निर्मोक्षों" मवेत्तत्साधनानि च ॥ १०७ ॥ ४८५ के योग्य हैं ||१७|| चलने आदिके विषय में यन रखना अर्थात् ईर्ष्या, भाषा, एषणा, आदान, निक्षेपण और प्रतिष्ठापन इन पाँच समितियोंका पालन करना, मनोगुप्ति, वचनगुप्ति और कायगुप्तिका पालन करना तथा परीषहोंको सहन करना ये चारित्रकी भावनाएँ जानना चाहिए ||१८|| विषयों में आसक्त न होना, शरीर के स्वरूपका बार-बार चितवन करना, और जगत्के स्वभावका विचार करना ये वैराग्यको स्थिर रखनेवाली भावनाएँ हैं ।। ९९ ।। इस प्रकार ऊपर कही हुई भावनाओंका चिन्तवन करनेवाले, तत्वोंको जाननेवाले और राग-द्वेषसे रहित मुनिकी बुद्धि ज्ञान और चारित्र आदि सम्पदामें स्थिर हो जाती है ॥ १००॥ यदि ध्यान करनेवाला मुनि चौदह पूर्वका जाननेवाला हो, दस पूर्वका जाननेवाला हो अथवा नौ पूर्वका जाननेवाला हो तो वह ध्याता सम्पूर्ण लक्षणोंसे युक्त कहलाता है ॥ १०१ ॥ इसके सिवाय अल्प-श्रुत ज्ञानी अतिशय बुद्धिमान और श्रेणीके पहले-पहले धर्मध्यान धारण करनेवाला उत्कृष्ट मुनि भी उत्तम ध्याता कहलाता है ।। १०२ ।। इस प्रकार ऊपर कहे हुए लक्षणोंसे सहित ध्यान करनेवाला मुनि ध्यानकी बहुत-सी सामग्री प्राप्त कर उपशम अथवा क्षेपक श्रेणीमें उत्कृष्ट ध्यानको प्राप्त होता है। भावार्थ - उत्कृष्ट ध्यान शुक्लध्यान कहलाता है और वह उपशम अथवा क्षपकश्रेणीमें ही होता है || १०३ || श्रुतज्ञानके द्वारा तत्वोंको जाननेवाला मुनि पहले वज्रावृषभनाराच संहननसे सहित होनेपर ही क्षपकश्रेणीपर चढ़ सकता है तथा दूसरी उपशम श्रेणीको पहले के तीन संहननों (वज्रवृषभनाराच, वज्रनाराच और नाराच ) वाला मुनि भी प्राप्त कर सकता है ||१०४|| अध्यात्मको जाननेवाला मुनि बाह्य पदार्थोंके समूहसे अपनी दृष्टिको कुछ हटाकर और अपनी स्मृतिको अपने-आपमें ही लगाकर ध्यान करे ।। १०५ ॥ प्रथम तो स्पर्शन आदि इन्द्रियोंको उनके स्पर्श आदि विषयोंसे हटावे और फिर मनको मनके विषयसे हटाकर स्थिर बुद्धिको ध्यान करने योग्य पदार्थ में धारण करे-लगावे ॥१०६ ॥ पार्थ उपयोगी है ऐसा अध्यात्मतत्त्व ध्यान करने योग्य है । मोक्ष प्राप्त होना पुरुषार्थ कहलाता है और सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र उसके साधन कहलाते १. ईर्ष्या आदयो विषयाः येषां ते यत्नाः । पञ्चसमितय इत्यर्थः । २. चारित्रम् । ३. असम्पूर्ण - श्रुतेनापि युत इत्यर्थः । ४. श्रेणिद्वयादवः । असंयतादिचतुर्गुणस्थानेषु धर्म्यध्यानस्य ध्याता भवतीत्यर्थः । ५. सम्पूर्णाम् । ६. शुक्लध्यानम् । ७. गच्छति । ८. अन्तर्दृष्टिम्, ज्ञानदृष्टिमित्यर्थः । ९. समीपे वर्तयित्वा । १०. इन्द्रियविषयेभ्यः । ११. लयं नीत्वा । १२. आत्मस्वरूपम् । १३. उपकारि । १४. कर्मणां निरवशेषक्षयः । १५. तन्निर्मोक्षसाधनानि सम्यग्दर्शनादीनि च ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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