SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 570
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आदिपुराणम् स्तेयानन्दः परद्रव्यहरणे स्मृतियोजनम् । भत्रेत् संरक्षणानन्दः स्मृतिरर्थार्जनादिषु ॥ ५१ ॥ प्रतीत लिङ्गमे बैतद् रौद्र ध्यानद्वयं भुवि । नारकं दुःखमस्याहुः फलं रौद्रस्य नुस्तरम् ॥ ५२ ॥ बाह्यं तु लिङ्गमस्याहुश्रूं मङ्गं मुखविक्रियाम् । प्रस्वेदमङ्गकं पञ्च नेत्रयोश्चातिताम्रताम् ॥ ५३ ॥ प्रयत्नेन विनैवैतदसद्ध्यानद्वयं भवेत् । अनादिवासनोद्भूतमतस्तद्विसृजेन्मुनिः ॥ ५४ ॥ ध्यानद्वयं विसृज्याद्यमसत्संसारकारणम् । यदोत्तरं द्वयं ध्यानं मुनिनाभ्यसिसिष्यते ॥५५॥ "तदेदं परिक्रमेष्टं देशा वस्था थुपाश्रयम् । बहिः सामग्यूधीनं हि फलमत्र द्वयात्मकम् ॥ ५६ ॥ शुन्यालये स्मशाने वा जरदुद्यानकेऽपि वा । सरित्पुलिन गिर्यप्रगहरे द्रुमकोटरे ॥ ५७ ॥ शुचावन्यतमं देशे चित्तहारिण्यपातके । नात्युष्य शिशिरे नापि प्रवृद्भुतरमारुते ॥ ५८ ॥ विमुक्तवर्ष संबाधे' 'सूक्ष्मजन्स्वनुपद्भुते । "जलसंपात निर्मुक्ते मन्दमन्दनभस्वति ॥ ५९ ॥ पल्यङ्कमासनं बद्ध्वा सुनिविष्टो महीतले । सममृज्वायतं " बिभ्रद्गाश्रमस्तब्ध " वृप्तिकम् ॥ ६०॥ स्वपर्यङ्के करं बामं न्यस्योत्तानतलं पुनः । तस्योपरीतरं पाणिमपि विन्यस्य तत्समम् ॥ ६१॥ ४८० आदि इसके बाह्य चिह्न हैं ||५० || दूसरेके द्रव्यके हरण करने अर्थात् चोरी करनेमें अपना चित्त लगाना - उसीका चिन्तवन करना सो स्तेयानन्द नामका तीसरा रौद्रध्यान है और धनके उपार्जन करने आदिका चिन्तवन करना सो संरक्षणानन्द नामका चौथा रौद्रध्यान है । (संरअणानन्दका दूसरा नाम परिग्रहानन्द भी है ) ।। ५१ ।। स्तेयानन्द और संरक्षणानन्द इन दोनों tatarria बाह्य चिह्न संसारमें प्रसिद्ध हैं । गणधरदेवने इस रौद्रध्यानका फल अतिशय कठिन नरकगति दुःख प्राप्त होना वतलाया है ||१२|| भौंह टेढ़ी हो जाना, मुखका विकृत हो जाना, पसीना आने लगना, शरीर कँपने लगना और नेत्रोंका अतिशय लाल हो जाना आदि ध्यानके बाह्य चिह्न कहलाते हैं ||५३ || अनादिकालकी वासनासे उत्पन्न होनेवाले ये दोनों ( आर्त और रौद्र ) ध्यान बिना प्रयत्नके ही हो जाते हैं इसलिए मुनियोंको इन दोनोंका ही त्याग करना चाहिए ||५४|| संसारके कारणस्वरूप पहले कहे हुए दोनों खोटे ध्यानोंका परित्याग कर मुनि लोग अन्तके जिन दो ध्यानोंका अभ्यास करते हैं वे उत्तम हैं, देश तथा अवस्था आदिकी अपेक्षा रखते हैं, बाह्य सामग्रीके अधीन हैं और इन दोनोंका फल भी गौण तथा मुख्यकी अपेक्षा दो प्रकारका है ।।५५-५६।। अध्यात्मके स्वरूपको जाननेवाला मुनि, सूने घरमें, श्मशानमें, जीर्ण वनमें, नदीके किनारे, पर्वत के शिखरपर, गुफामें, वृक्षकी कोटर में अथवा और भी किसी ऐसे पवित्र तथा मनोहर प्रदेशमें, जहाँ आतप न हो, अतिशय गरमी और सर्दी न हो, तेज वायु न चलता हो, वर्षा न हो रही हो, सूक्ष्म जीवोंका उपद्रव न हो, जलका प्रपात न हो और मन्द मन्द वायु बह रही हो, पर्यंक आसन बाँधकर पृथिवीतलपर विराजमान हो, उस समय अपने शरीरको सम सरल और निश्चल रखे, अपने पर्यकमें बाँया हाथ इस प्रकार रखे कि जिससे उसकी हथेली ऊपरकी ओर हो, इसी प्रकार दाहिने हाथ को भी वाँया हाथपर रखे, आँखोंको न तो अधिक खोले ही और न अधिक बन्द ही रखे, धीरे-धीरे १. विकारम् । २. आतंरौद्रद्वयम् । ३. असाधु । ४, यदुत्तरं ल०, म०, इ०, अ०, स० । ५. अभ्यसितुमिच्छतं । ६. तदिदं ल०, म०, इ० अ०, स० । ७ देश। सनभेदादिवक्ष्यमाणलक्षण । ८. निश्चयव्यवहारात्मकम् । अथवा मुख्या मुख्यात्मकम् । ९. पुराणोद्याने । १०. संबन्धे ल० म० । ११. जनसंपात - द०, इ० । १२. समसृज्वागति अ० इ० । सममुज्वायति प०, ल० म० । १३. प्रयत्नपरवृत्तिकम् । १४. दक्षिणहस्तम् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy