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________________ आदिपुराणम् नवकेवललब्धीस्ता जिनभास्वान् श्रुतीरिव । स भेजे जगदुदुमासी मन्याम्भोजाति बोधयन् ॥ २६६॥ इति ध्यानाग्निनिर्दग्धकर्मेन्धनचयो जिन: । बभावुभूत कैवल्य विभवो' विभवोद्भवः ॥२६७॥ फाल्गुने मासि तामित्रपक्ष स्यैकादशीतिथौ । उत्तराषाढनक्षत्रे कैवल्यमुदभूद् विभोः ॥२६८॥ मालिनीच्छन्दः ४७२ भगवति जितमोहे केवलज्ञानलक्ष्म्या स्फुरति सति सुरेन्द्राः प्राणमम्भक्तिमारात् । नमसि जयनिनादो विश्वदिक्कं जजम्भे सुरकुजकुसुमानां वृष्ठिरापप्तदुच्चै सुरपटहरबैश्चारुद्धमासीत् खरन्धम् ॥ २६९ ॥ भ्रमरमुखरितद्यौः शारयन्ती दिगन्तान् । विरलमवतरद्भिर्नाकभाजां विमान गंगनजलधिरुरिवाभूत् समन्तात् ॥२७०॥ मदकलरुतभृङ्गैरन्वितः स्वः स्रवन्त्याः " धुतसुरभिवनान्तः पद्मकिञ्जल्कबन्धु शिशिरतरतरङ्गानास्पृशन्मातरिश्वा । मृदुतरममितो 'वान् ग्यानशे दिङ्मुखानि ॥२७१॥ कमलोंको प्रफुल्लित करते हुए वे वृषभ-जिनेन्द्ररूपी सूर्य किरणोंके समान अनन्त ज्ञान दर्शन, वीर्य, चारित्र, शुद्ध सम्यक्त्व, दान, लाभ, भोग और उपभोग इन अनन्त नौलब्धियों प्राप्त हुए || २६५ - २६६ ।। इस प्रकार जिन्होंने ध्यानरूपी अग्निके द्वारा कर्मरूपी ईंधन के समूहको जला दिया है, जिनके केवलज्ञानरूपी विभूति उत्पन्न हुई है और जिन्हें समवसरणका वैभव प्राप्त हुआ है ऐसे वे जिनेन्द्र भगवान् बहुत ही सुशोभित हो रहे ॥२६॥ फाल्गुन मास के कृष्ण पक्षकी एकादशीके दिन उत्तराषाढ़ नक्षत्र में भगवान‌को केवलज्ञान उत्पन्न हुआ था || २६८।। मोहनीय कर्मको जीतनेवाले भगवान् वृषभदेव ज्यों ही केवलज्ञानरूपी लक्ष्मीसे देदीप्यमान हुए त्यों ही समस्त देवोंके इन्द्र भक्तिके भारसे नम्रीभूत हो गये अर्थात् उन्होंने भगवान्को सिर झुकाकर नमस्कार किया, आकाशमें सभी ओर जय-जय शब्द बढ़ने लगा और आकाशका विवर देवोंके नगाड़ोंके शब्दोंसे व्याप्त हो गया || २६९ || उसी समय भ्रमरोंके शब्दोंसे आकाशको शब्दायमान करती हुई तथा दिशाओंके अन्तको संकुचित करती हुई कल्पवृक्षके पुष्पोंकी वर्षा बड़े ऊँचेसे होने लगी और विरल- विरल रूपसे उतरते हुए देवोंके विमानोंसे आकाशरूपी समुद्र ऐसा हो गया मानो उसमें चारों ओर नौकाएँ ही तैर रही हों ॥२७०॥ उसी समय मदसे मनोहर शब्द करनेवाले भ्रमरोंसे सहित, गङ्गा नदीको अत्यन्त शीतल तरङ्गोंका स्पर्श करता हुआ और हिलते हुए सुगन्धित बनके मध्य भागमें स्थ कमलोंकी परागसे भरा हुआ वायु चारों ओर धीरे-धीरे बहता हुआ दिशाओंमें व्याप्त हो १. केवलज्ञानसंपत्तिः । २ समवसरणवहिर्भूतीनाम् उद्भवो यस्य । ३. नानावर्णान् कुर्वन्ती । ४. तत्र सत्र व्याप्तं यथा भवति तथा। ५. सुरनिम्नगायाः । ६. वातीति वाम
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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