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________________ ४६७ विशं पर्व प्रोक्ताः सिद्धगुणा ह्यष्टौ ध्येयाः सिद्धिमीप्सुना। 'न्यतः क्षेत्रतः काला भावतच तथा परे॥२२४॥ गुणैदिन मियुको मुक्तः सूक्ष्मो निरम्जनः । स ध्येयो योगिमिव्यक्तो नित्यः शुद्धो मुमुक्षुमिः॥२२५॥ ततो दध्यावनुप्रेक्षा"दिभ्यासुर्धर्म्यमुत्तमम् । पारि कर्ममितास्तस्य शुमा द्वादशभावनाः ॥२२६॥ तासां नामस्वरूपं च पूर्वमेवानुवर्णितम् । ततो धर्नामसौ ध्यानं प्रपेदे धीद शुदिकः ॥२२०॥ आज्ञाविषयमाचं तदपाय विचयं तथा । विपाक विचयं चान्यत् संस्थानविचयं परम् ॥२२८॥ स्वनामव्यक्ततच्या "नि धर्म्यध्यानानि सोऽध्यगात्"। यतो महत्तमं पुण्यं स्वर्गाप्रसुखसाधनम् ॥२२९॥ क्षालितागःपरागस्य विरागस्यास्य योगिनः । प्रमादः क्वाप्यभून्नेत स्तदा'"ज्ञानादिशक्तिभिः॥२३०॥ ज्ञानादिपरिणामेषु परां शुद्धिमुपेयुषः । लेशतोऽप्यस्य नाभूवन् दुलेश्याः क्लेशहेतवः ॥२३१॥ तदा ध्यानमयी शक्तिः स्फुरन्ती दशे विमोः । मोहारिनाशपिशुना महोल्केव"विजृम्भिता ॥२३२॥ तथा भावकी अपेक्षा उनके और भी चार साधारण गुणोंका चिन्तवन करना चाहिए । इस तरह जो ऊपर कहे हुए बारह गुणोंसे युक्त हैं, कर्मबन्धनसे रहित हैं, सूक्ष्म हैं, निरज्जन हैंरागादि भाव कर्मोंसे रहित हैं, व्यक्त हैं, नित्य हैं और शुद्ध हैं ऐसे सिद्ध भगवानका मोक्षाभिलाषी मुनियोंको अवश्य ही ध्यान करना चाहिए ॥२२३-२२५।। पश्चात् उत्तम धर्मभ्यानकी इच्छा करनेवाले भगवान्ने अनुप्रेक्षाओंका चिन्तवन किया क्योंकि अभ बारह अनुप्रेक्षाएँ ध्यानकी परिवार अवस्थाको ही प्राप्त हैं अर्थात् ध्यानका ही अंग कहलाती हैं ।।२२६॥ उन बारह अनुप्रेक्षाओंके नाम और स्वरूपका वर्णन पहले ही किया जा चुका है। तदनन्तर बुद्धिकी अतिशय विशुद्धिको धारण करनेवाले भगवान धर्मध्यानको प्राप्त हुए ॥२२७॥ आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय और संस्थानविचय इस प्रकार धर्मध्यानके चार भेद हैं । जिनका स्वरूप अपने नामसे प्रकट हो रहा है ऐसे ऊपर कहे हुए चारों धर्मध्यान जिनेन्द्रदेवने धारण किये थे क्योंकि उनसे स्वर्ग लोकके श्रेष्ठ सुखोंके कारणस्वरूप बड़े भारी पुण्यकी प्राप्ति होती है ।२२८-२२९॥ जिनका पापरूपी पराग (धूलि) धुल गया है और राग-द्वेष आदि विभाव नष्ट हो गये हैं ऐसे योगिराज वृषभदेवके अन्तःकरणमें उस समय ज्ञान, दर्शन आदि शक्तियोंके कारण किसी भी जगह प्रमाद नहीं रह सका था। भावार्थ-धर्मध्यानके समय जिनेन्द्रदेव प्रामादरहित हो 'अप्रमत्त संयत' नामके सातवें गुणस्थानमें विद्यमान थे॥२३०।। ज्ञान आदि परिणामोंमें परम विशुद्धताको प्राप्त हुए जिनेन्द्रदेवके क्लेश उत्पन्न करनेवाली अशुभ लेश्याएँ अंशमात्र भी नहीं थीं। भावार्थ-उस समय भगवान्के शुक्ल लेश्या ही थी ।।२३१।। उस समय देदीप्यमान हुई भगवानकी ध्यानरूपी शक्ति ऐसी दिखाई देती थी मानो मोहरूपी शत्रुके नाशको सूचित करनेवाली बढ़ी हुई बड़ी भारी उल्का ही हो ।।२३२।। .. १. द्रव्यमाथित्य चेतनत्वादयः । २. क्षेत्रमाथित्य असंख्यातप्रदेशित्वादयः । ३. कालमाश्रित्य त्रिकालं व्यापित्वादयः । ४. भावमाश्रित्य परिणामिकादयः । ५. साधारणगुणाः । ६. सम्यक्त्वाद्यष्टी, द्रव्याश्रयतश्चत्वार . इति द्वादशगुणैः । ७. ध्यातुमिच्छुः । ८. -धर्ममुत्तमम् ल०, म० । धमादपेतम् । ९. परिकरत्वम् । १०. शुद्धा इत्यपि क्वचित् । ११. धियः इद्धा प्रवृद्धा शुद्धिर्यस्य सः । १२. आज्ञा आगमस्तद्गदितवस्तुविचारो विचयः सोऽत्रास्तीति । अायविचयं कर्मणाम् । १३. शुभाशुभकर्मोदयजनितसुखदुःखभेदप्रभेदचिन्ता । १४. स्वस्पाणि । १५. ध्यायति स्म । १६. इतः प्राप्तः । -प्यभून्नान्तस्तदा इ०, ८०, ल०, म०, अ०५०, स० । १७. ज्ञानसम्यनत्वचारित्र । १८. नानपातः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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