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________________ ४६६ आदिपुराणम् कदाचित् प्रान्तपर्यस्त'निर्भरैस्ततशीकरैः । कृतशेये नगोस्सगे सोऽगाद् योगेकतानताम् ॥२१॥ नक्तं नक्त नरैमर्मीमः स्वरमारब्धताण्डवे । विभुः पितृवनोपान्ते ध्यायन् सोऽस्थात् कदाचन ॥२१५॥ कदाचिचिम्नगातीरे शुचिसैकतचारुणि । कदाचिञ्च सरस्तीरे वनोद्देशेषु हारिषु ॥२१॥ मनोज्या क्षेपहीनेषु देशेऽवन्येषु च क्षमी । ध्यानाभ्यासमसौ कुर्वन् विजहार महीमिमाम् ॥२७॥ मौनी ध्यानी स निर्मानो देशान् प्रविहरन् शनैः । पुरं पुरिमतालाल्यं सुधारन्येयुरासदत् ॥२१८॥ नास्यासनविदूरेऽस्मादुधाने शक्टाहये। शुचौ निराकुले रम्ये विपि कोऽस्थाद् विजन्तुके ॥२१९॥ न्यग्रो धपादपस्याधः शिलापहर्षि प्रधुम् । सोऽध्यासीनः समाधानमभाद् ध्यानाय शुद्धधीः ॥२२॥ "तत्र पूर्वमुखं स्थित्वा कृत पबन्धनः । ज्याने प्रणिदधौ चित्तं लेश्याधुदि परां दधत् ॥२२॥ चेतसा सोऽमिस धाय परं "पदमनुत्तरम् । दधौ सिद्धगुणानष्टौ प्रागेव सुविशुद्धधीः ॥२२२॥ सम्यक्त्वं दर्शनं ज्ञानमनन्तं वीर्यमद्भुतम् । सौम्या "वगायो प्याबाधाः सहागुरुलधुत्वकाः ॥२२॥ और एकान्त विषम भूमिपर विराजमान होते थे ।।२१।। कभी-कभी पानीके छींटे उड़ाते हुए समीपमें बहनेवाले निर्झरनोंसे जहाँ बहुत ठण्ड पड़ रही थी ऐसे पर्वतके ऊपरी भागपर वे ध्यानमें तल्लीनताको प्राप्त होते थे ॥२१४। कभी-कभी रातके समय जहाँ अनेक राक्षस अपनी इच्छानुसार नृत्य किया करते थे ऐसी श्मशान भूमिमें वे भगवान् ध्यान करते हुए विराजमान होते थे ॥२१५॥ कभी शुक्ल अथवा पवित्र बालूसे सुन्दर नदीके किनारेपर, कभी सरोवरके किनारे, कभी मनोहर वनके प्रदेशोंमें और कभी मनकी व्याकुलता न करनेवाले अन्य कितने ही देशोंमें ध्यानका अभ्यास करते हुए उन क्षमाधारी भगवान्ने इस समस्त पृथिवीमें विहार किया था ।।२१६-२१७। मौनी, ध्यानी और मानसे रहित वे अतिशय बुद्धिमान् भगवान् धीरे-धीरे अनेक देशोंमें विहार करते हुए किसी दिन पुरिमताल नामके नगरके समीप जा पहुँचे।॥२१८॥ उसी नगरके समीप एक शकट नामका उद्यान था जो कि उस नगरसे न तो अधिक समीप था और न अधिक दूर ही था। उसी पवित्र, आकुलतारहित, रमणीय, एकान्त और जीवरहित वनमें भगवान ठहर गये २१९शुद्ध बुद्धिवाले भगवान्ने वहाँ ध्यानकी सिद्धिके लिए वटवृक्षके नीचे एक पवित्र तथा लम्बी-चौड़ी शिलापर विराजमान होकर चित्तकी एकाग्रता धारण की ।।२२०॥ वहाँ पूर्व दिशाकी ओर मुख कर पद्मासनसे बैठे हुए तथा लेश्याओंकी उत्कृष्ट शुद्धिको धारण करते हुए भगवान्ने ध्यानमें अपना चित्त लगाया ॥२२॥ ___ अतिशय विशुद्ध बुद्धिको धारण करनेवाले भगवाम् वृषभदेवने सबसे पहले सर्वश्रेष्ठ मोक्ष-पदमें अपना चित्त लगाया और सिद्ध परमेष्ठींके आठ गुणोंका चिन्तवन किया २२२॥ अनन्त सम्यक्त्व, अनन्तदर्शन, अनन्तज्ञान, अनन्त और अद्भुत वीर्य, सूक्ष्मत्व, अवगाहनत्व, अन्याबाधत्व और अगुरुलघुत्व ये आठ सिद्धपरमेष्ठीके गुण कहे गये हैं, सिद्धि प्राप्त करनेकी इच्छा करनेवालोंको इन गुणोंका अवश्य ध्यान करना चाहिए । इसी प्रकार द्रव्य, क्षेत्र, काल १. व्याप्त । २. ध्यानैकापतानताम् । ३. रात्री । ४. राक्षसः । ५. व्याकुल । ६. अस्मात् पुरात् । ७. 'पुमांश्चान्यतोऽभ्यणि'ति सूत्रेण पुंबद्भावः। ८. विजने। 'विविक्तौ पतविजनौ' इत्यभिधानात् । ९. वटः । १०. आधात् इति पाठे अकरोत् । अधादिति पाठे धरति स्म । ११. शिलापट्टे । १२.-पर्यङ्क-ल०, म०, द०, स०, अ०। १३. अभिप्रायगतं कृत्वा । १४. अक्षयस्थानम् । १५. सूक्ष्मत्व । ९६. अवगाहित्व ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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