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________________ विशं पर्व ४५३ विशुदिश्चाशनस्यति नवपुण्यानि दानिनाम् । स वानि कुशलो भेजे पूर्वसंस्कारचोदितः ॥८॥ इष्टश्चायं विशिष्टश्चेस्वसौ तुष्टिं परां श्रितः । ददे भगवते दानं प्रासुकाहारकल्पितम् ॥१८॥ संतोषो याचनापायो नैःसंग्यं स्वप्रभागता । इति मत्वा गुणान् पाणिपानेबाहारमिच्छते ॥८९॥ 'तुष्टिविशिष्टपीठादिसंप्राप्तावन्यथा दिषिः । असंयमश्च सत्यैवमिति स्थित्वाशनैषिणे ॥१०॥ कायासुखतितिक्षार्थ सुखासक्तेश्य हामये । धर्मप्रभावनाय च कायक्लेशमुपेयुषे ॥९॥ नैष्किम्वन्यप्रधानं यत् परं निर्वाणकारणम् । हिंसारक्षण"याम्चादिदोषरस्पृष्टमूर्जितम् ॥१२॥ अशक्यं प्रार्थनीयस्वरहितं च "समीयुपे । जातरूपं वधाजातमविकारमविप्लवम् ॥१३॥ तैलादेर्याचनं तस्य लामालाभहये सति । रागद्वेषद्वयां संगः केशजप्राणिहिंसमम् ॥१४॥ इत्यादिदोषसजावादस्नानव्रतधारिणे । हायनान"मनेऽप्यने पुरि दीप्तिं च विभ्रते ॥१५॥ क्षुर क्रियायां तचोग्ब साधनार्जनरक्षणे । तदपाये च चिन्ता स्यात् केशोत्पाटमितीच्छते ॥९६॥ पत्रमिः समिता यास्मै त्रिभिर्गुसाय ताबिने। महावताय महते निर्मोहाय निराशि॥९७॥ की विशुद्धि रखना, इस प्रकार दान देनेवालेके यह नौ प्रकारका पुण्य अथवा नवधा भक्ति कहलाती हैं । अतिशय चतुर श्रेयान्सकुमारने पूर्वपर्यायके संस्कारोंसे प्रेरित होकर वे सभी भक्तियाँ की थीं ।।८६-८७॥ ये भगवान् अतिशय इष्ट तथा विशिष्ट पात्र हैं ऐसा विचार कर परम सन्तोषको प्राप्त हुए श्रेयान्सकुमारने भगवान के लिए प्रासुक आहारका दान दिया था ॥८८ जो भगवान् सन्तोष रखना, याचनाका अभाव होना, परिग्रहका त्याग करना, और अपने आपकी प्रधानता रहना आदि अनेक गुणोंका विचार कर पाणिपात्रसे ही अर्थात् अपने हाथोंसे ही आहार ग्रहण करते थे। उत्तम आसन मिलनेसे सन्तोष होगा, यदि उत्तम आसन नहीं मिला तो द्वेष होगा और ऐसी अवस्थामें असंयम होगा ऐसा विचार कर जो भगवान् खड़े होकर ही भोजन करते थे। शरीरसम्बन्धी दुःख सहन करनेके लिए, सुखकी आसक्ति दूर करनेके लिए और धर्मकी प्रभावनाके लिए जो भगवान कायक्लेशको प्राप्त होते थे। जिसमें अकिंचनताको ही प्रधानता है, जो मोक्षका साक्षात् कारण है, हिंसा, रक्षा और याचना आदि दोष जिसे छू भी नहीं सकते हैं, जो अत्यन्त बलवान हैं, साधारण मनुष्य जिसे धारण नहीं कर सकते, जिसे कोई प्राप्त नहीं करना चाहता, और जो तत्कालमें उत्पन्न हुए बालकके समान निविकार तथा उपद्रवरहित ह ऐसे नग्न-दिगम्बर रूपको जो भगवान् धारण करते थे । तैल आदिको याचना करना, उसके लाभ और अलाभमें राग-द्वेषका उत्पन्न होना, और केशोंमें उत्पन्न होनेवाले जूं आदि जीवोंकी हिंसा होना इत्यादि अनेक दोषोंका विचार कर जो भगवान् अस्नान व्रतको धारण करते थे अर्थात् कभी स्नान नहीं करते थे। एक वर्ष तक भोजन न करनेपर भी जो शरीरमें पुष्टि और दीप्तिको धारण कर रहे थे। यदि भुरा आदिसे बाल बनवाये जायेंगे तो उसके साधन क्षुरा आदि लेने पड़ेंगे, उनकी रक्षा करनी पड़ेगी और उनके खो जानेपर चिन्ता होगी ऐसा विचार कर जो भगवान् हाथसे ही केशलोंच करते थे। जो भगवान् पाँचों इन्द्रियोंको वश कर लेनेसे शान्त थे, तीनों गुप्तियोंसे सुरक्षित थे, सबकी १. एषणाशुधिरित्यर्थः । २. पूर्वभवसंस्कारप्रेरितः । ३. देवः । ४. श्रेयान् । ५. आत्मैव प्रधानत्वम् । १. सन्तोषः । ७. द्वेषः । ८. शरीरसुखसहनार्थम् । ९. गताय । १०. नास्ति किंचन यस्यासावकिंचनः तस्य माया तत् प्रषानं यस्य तत् । ११. याच्या । १२. अन्यरनुष्ठातुमशक्यम् । १३. प्राप्तवते । रहितं च समुपेयुषे प... रहितं च समीयुपे इत्यपि क्वचित् । १४. संयोगः। १५. संवत्सरोपवासेऽपि । १६. तेजः । १७. मुण्डन । १८. शस्त्रादि । १९. शमिता ल०, म०। २०. पालकाय । २१. इच्छारहिताय ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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