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________________ ४५२ आदिपुराणम् मगवञ्चरणोपान्ते तो तदा मजतुः श्रियम् । सौधर्मेशानकल्पेशौ विभु मष्टुमिवागतौ ॥७॥ पर्यन्तवर्तिनोर्मध्ये तयोर्मर्ता स्म राजते । महामेरुरिवोद्भूतो मन्ये निषधनीलयोः ॥७७॥ संप्रेक्ष्य भगवद पं श्रेयाआतिस्मरोऽभवत् । ततो दाने मतिं चक्रे संस्कारः प्राक्तनैर्युतः ॥७॥ श्रीमती वज्रजबादिवृत्तान्तं सर्वमेव तत् । तदा चरणयुग्माय दत्तं दानं च सोऽभ्यगात् ॥७९॥ सती गोचार वेलेयं दानयोग्या मुनीशिनाम् । तेन मन्त्रं ददे दानमिति निश्चित्य पुण्यधीः ॥८॥ श्रद्धादिगुणसंपनः पुण्यनवमिरन्वितः । प्रादाजगवते दानं श्रेयान् दानादि तीर्थकृत् ॥८॥ श्रद्धा शक्तिश्च भक्तिश्व विज्ञानं चाप्यलुब्धता । भमा स्यागश्च सप्तैते प्रोक्ता दानपतेर्गुणाः ॥४२॥ श्रद्धास्तिक्य मनास्तिक्ये प्रदाने स्यादनादरः । मवेच्छक्तिरनालस्यं भक्तिः स्यात्तद्गुणादरः ॥४३॥ विज्ञानं स्यात् क्रमशस्वं "देयासक्किरलुग्धता । क्षमा तितिक्षा ददतस्त्यागः सन्ययशीलता ॥४॥ इति सप्तगुणोपेतो दाता स्यात् पात्रसंपदि । व्यपेतश्च निदानादेदोषान्निश्रेयसोचतः ॥४५॥ प्रतिग्रहण मत्युच्चैः स्थानेऽस्य"विनिवेशनम् । पादप्रधावनं चार्चा" नतिः शुद्धिश्च सा त्रयी ॥८६॥ मूर्तिधारी विनय और शान्ति हो हो ॥५॥ भगवानके चरणोंके समीप वे दोनों ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो भगवान के दर्शन करनेके लिए आये हुए सौधर्म और ऐशान स्वर्गके इन्द्र ही हों ।।७६।। दोनों ओर खड़े हुए सोमप्रभ और श्रेयान्सकुमारके बीच में स्थित भगवान् वृषभदेव ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो निषध और नील पर्वतके बीच में खड़ा हुआ सुमेरुपर्वत ही हो ॥७॥ __ भगवान्का रूप देखकर श्रेयान्सकुमारको जातिस्मरण हो गया जिससे उसने अपने पूर्व पर्यायसम्बन्धी संस्कारोंसे भगवान के लिए आहार देनेकी बुद्धि की ॥७८॥ उसे श्रीमती और वनजंघ आदिका वह समस्त वृत्तान्त याद हो गया तथा उसी भवमें उन्होंने जो चारण ऋद्धिधारी दो मुनियोंके लिए आहार दिया था उसका भी उसे स्मरण हो गया ॥७९॥ यह मुनियोंके लिए दान देने योग्य प्रातःकालका उत्तम समय है ऐसा निश्चय कर पवित्र वुद्धिवाले श्रेयान्सकुमारने भगवान्के लिए आहार दान दिया ।।८०॥ दानके आदि तीर्थकी प्रवृत्ति करनेवाले श्रेयान्सकुमारने श्रद्धा आदि सातों गुणसहित और पुण्यवर्धक नवधा भक्तियोंसे सहित होकर भगवान के लिए दान दिया था।॥८॥ श्रद्धा, शक्ति, भक्ति, विज्ञान, अक्षुब्धता, क्षमा और त्याग ये दानपति अर्थात् दान देनेवालेके सात गुण कहलाते हैं ॥२॥ श्रद्धा आस्तिक्य बुद्धिको कहते हैं, आस्तिक्य बुद्धि अर्थात् श्रद्धाके न होनेपर दान देने में अनादर हो सकता है। दान देने में आलस्य नहीं करना सो शक्ति नामका गुण है, पात्रके गुणोंमें आदर करना सो भक्ति नामका गुण है ।।८।। दान देने आदिके क्रमका ज्ञान होना सो विज्ञान नामका गुण है, दान देनेकी शक्तिको अलुब्धता कहते हैं, सहनशीलता होना भमा गुण है और उत्तम द्रव्य दानमें देना सो त्याग है ।।८।। इस प्रकार जो दाता ऊपर कहे हुए सात गुणोंसे सहित और निदान आदि दोपोंसे रहित होकर पात्ररूपी सम्पदामें दान देता है वह मोक्ष प्राप्त करनेके लिए तत्पर होता है ।।८५।। मुनिराजका पड़गाहन करना, उन्हें ऊँचे स्थानपर विराजमान करना, उनके चरण धोना, उनकी पूजा करना, उन्हें नमस्कार करना, अपने मन, वचन, कामकी शुद्धि और आहार १.जातिस्मरणतः । २. 'इक स्मरणे'। 'गैत्योः इणिको लङिगा भवति' इति गादेशः । अस्मरत् । ३. समीचीना। ४. अशनवेला । ५. कारणेन । ६. ददौ अ०.५० । ७. ददो। ८. प्रथमदानतीर्थकृदित्यर्थः । ९. बस्ति पुण्यपापपरलोकादिकमिति बुद्धिर्यस्याऽसौ आस्तिकः तस्य-भावः आस्तिक्यम् । १०. पात्रगुणप्रीतिः । ११. देयवस्तुपु अनासक्तिः । देयशक्तिः ५०, द.। १२. क्षान्तिः। १३. पात्रसमृद्धयां सत्याम् । १४. स्थापनम् । १५. पात्रस्य । १६. प्रक्षालनम् । १७. अर्चनम् । १८. मनोवाकायसंबन्धिनी।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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