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________________ आदिपुराणम् आज्ञामू हुः खच्चरनरपाः सन्नतैरुत्तमाङ्यूनोः सेवामनुनयपरामनयोराचरन्तः । क्वेमी जाती क्व च पदमिदं न्यक्कृतारातिचक्रं खे खेन्द्राणां घटयति नृणां पुण्यमेवारमनीनम् ॥१८९॥ मालिनी नमिरनमयदुरचर्मोगसंपत्प्रतीतान् गगनचरपुरीन्द्रान् दक्षिणश्रेणिमाजः । विनमिरपि विनम्रानातनोति स्म विश्वान् खचरपुरवरेशानुत्तरश्रेणिमाजः ॥१९॥ शार्दूलविक्रीडितम् । तावित्थं प्रविभज्य राजतनयो वैद्याधरी तां श्रियं भुञ्जानौ विजयार्धपर्वततटे निष्कपटकं तस्थतुः । पुण्यादित्यनयोविभूतिरभवल्लोकेशपादाभितोः पुण्यं तेन कुरुध्वमभ्युदयदा लक्ष्मी समाशंसवः ॥१९॥ नत्वा देवमिमं चराचरगुरुं त्रैलोक्यनाथार्चितं मक्ती ती सुखमापतुः समुचितं विद्याधराधीश्वरी। तस्मादादिगुरुं प्रणम्य शिरसा मक्यार्चयन्वनिनो वान्छन्तः सुखमक्षयं जिनगुणप्राप्तिं च नैश्रेयसीम् ॥१९२॥ इत्यारे भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे नमिविनमिराज्यप्रतिष्ठापन नामैकोनविंशतितमं पर्व ॥१६॥ STI और दूसरे विद्यावृद्ध मनुष्योंके साथ मिलकर वे अपना अभिलषित काय सिद्ध कर लेते थे इसलिए कि मान ही भोगोपभोग भोगते रहते थे ॥१८८।। इन दोनों कुमारोंको प्रसन्न करनेवाली सेवा करते हुए विद्याधर लोग अपना-अपना मस्तक झुकाकर उन दोनोंकी आज्ञा धारण करते थे। गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् , ये नमि और विनमि कहाँ तो उत्पन्न हुए और कहाँ उन्हें समस्त शत्रुओंको तिरस्कृत करनेवाला यह विद्याधरोंके इन्द्रका पद मिला। यथार्थमें मनुष्यका पुण्य ही सुखदायी सामग्रीको मिलाता रहता है ॥१८९॥ नमि कुमारने बड़ी-बड़ी भोगोपभोगकी सम्पदाओंको प्राप्त हुए दक्षिण श्रेणीपर रहनेवाले समस्त विद्याधर नगरियोंके राजाओंको वशमें किया था और विनमिने उत्तरश्रेणीपर रहनेवाले समस्त विद्याधर नगरियोंके राजाओंको नम्रीभूत किया था ॥१९०।। इस प्रकार वे दोनों ही राजकुमार विद्याधरोंकी उस लक्ष्मीको विभक्त कर विजया पर्वतके तटपर निष्कंटक रूपसे रहते थे । हे भव्य जीवो, देखो, भगवान् वृषभदेवके चरणोंका आश्रय लेनेवाले इन दोनों कुमारोंको पुण्यसे हो उस प्रकारको विभूति प्राप्त हुई थी इसलिए जीव स्वर्ग आदिकी लक्ष्मी प्राप्त करना चाहते है वे एक पुण्यका ही संचय करें ॥१९॥ चर और अचर जगत्के गुरु तथा तीन लोकके अधिपतियों-द्वारा पूजित भगवान् वृषभदेवको नमस्कार कर ही दोनों भक्त विद्याधरोंके अधीश्वर होकर उचित सुखको प्राप्त हुए थे इसलिए जो भव्य जीव मोक्षरूपी अविनाशी सुख और परम कल्याणरूप जिनेन्द्र भगवान्के गुण प्राप्त करना चाहते हैं वे आदिगुरु भगवान वृषभदेवको मस्तक झुकाकर प्रणाम करें और उन्हींकी भक्तिपूर्वक पूजा करें ॥१९२॥ इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्य प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण श्री महापुराणसंग्रहमें नमिविनमिकी राज्यप्राप्तिका वर्णन करनेवाला उन्नीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१॥ जो जी १. खचरतनयाः अ०। २. शून्ये खेटेन्द्राणाम् प०, द.। ३. आत्महितं वस्तु । ४. विद्याधरसम्बन्धिनीम् । ५. परमेश्वरचरणाश्रितयोः। ६. कारणेन । ७. इच्छवः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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